{"_id":"868e35e0-12f7-11e2-abb2-d4ae52bc57c2","slug":"limits-of-constitutional-institutions","type":"story","status":"publish","title_hn":"सांविधानिक संस्थाओं की लक्ष्मण रेखा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
सांविधानिक संस्थाओं की लक्ष्मण रेखा
शीतला सिंह
Updated Wed, 10 Oct 2012 09:58 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने विभिन्न सांविधानिक संस्थाओं से अपनी सीमा में रहने का आग्रह किया है, तो इसे समझा जा सकता है। विसंगतियों से मुक्ति के लिए ही तो लिखित सांविधानिक व्यवस्था का प्रावधान किया गया। साथ ही, उसके नियमन और नियंत्रण के लिए व्याख्या का अधिकार उच्च और सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया गया, जिससे कि उसके लक्ष्य और उद्देश्यों की रक्षा की जा सके। राजकाज को तीन भागों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित किया गया, लेकिन वे स्वतंत्रतापूर्वक अपने दायित्वों का निर्वाह कर सकें, इसके लिए भी व्यवस्था की गई। जिन शक्तियों का प्रयोग कार्यपालिका के अधिकारी करते थे, उन पर भी अंकुश लगा, केवल उन्हें व्यवस्था में निरोधक और निषेधात्मक कार्रवाइयां करने का ही अधिकार दिया गया, लेकिन वे भी न्यायालय की सीमा और अधिकार परिधि के भीतर ही थे।
मर्यादाओं का निर्धारण तो हो, लेकिन उनके उद्देश्य, उनका होने वाला प्रभाव भी वैयक्तिक सांविधानिक अधिकारों का अतिरेक न करे। न्यायिक सीमाएं भी ऐसी ही बनाई गईं, जो परम स्वतंत्र नहीं थीं, बल्कि उनके लिए भी सभी की भांति सांविधानिक सीमाएं थीं, जिनका उल्लंघन नहीं होना चाहिए। इसीलिए जब प्रश्न उठा कि न्यायपालिका अपने अधिकारों का अतिरेक कर व्यवस्था के निर्माण की ओर बढ़ रही है, तो इसे सांविधानिक रुचि के विपरीत मर्यादा हनन माना गया कि उसका काम शासन करना नहीं और न नीतियों का निर्धारण और अमल ही है, बल्कि उसे केवल यही देखना है कि विधायिका और कार्यपालिका को जो अधिकार मिले हैं, वे उसी के तहत काम कर रही हैं या नहीं। हाल ही पांच न्यायाधीशों की जो संविधान पीठ बनी थी, उसने भी दोहराया कि न्यायपालिका को भी अपनी सीमाओं और मर्यादाओं का सदैव ध्यान रखना चाहिए।
जहां तक सांविधानिक संस्थाओं का संबंध है, तो चुनाव आयोग, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक, निगरानी आयोग आदि इसी प्रकार की संस्थाएं हैं। इसी दिशा में लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं की आवश्यकता और उन्हें अधिकार देने की बात हो रही है। दरअसल लोकतंत्र में जनता को ही सबसे बड़ा अधिकार है। सांविधानिक संस्थाओं को राष्ट्रपति ने जिस लक्ष्मण रेखा की याद दिलाई, वह वास्तव में और कुछ नहीं, मात्र इतना है कि सारी संस्थाओं को अंततः संसद के प्रति जवाबदेह होना होगा। लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग प्रमुख संस्था है, जो पूरी निर्वाचन विधा के साथ ही उसे नियंत्रित और संचालित करती है। लेकिन उसके लिए भी संसद ने जनप्रतिनिधित्व कानून द्वारा विभिन्न व्यवस्थाएं बना रखी है।
विज्ञापन
यही कारण है कि एक बार चुनाव आयोग ने संसद से अपेक्षा की थी कि वह जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन कर जिन व्यक्तियों पर गंभीर आरोपों में मुकदमा चल रहा हो, उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अपात्र बना दे, लेकिन संसद इसके लिए तैयार नहीं हुई, उसका मानना था कि अभियोग जब तक सिद्ध न हो जाए, तब तक किसी को भी दोषसिद्ध अपराधी नहीं माना जा सकता। इसलिए गंभीर आरोपों में भी लोग चुनाव लड़ने के अयोग्य नहीं होते। इसी प्रकार नियंत्रक और महालेखा परीक्षक तथा निगरानी आयोग को भी किसी मामले में अभियोग चलाने के लिए अधिकार नहीं दिए गए हैं। इन संस्थाओं की भूमिका यही है कि वे संसद को उन विसंगतियों के बारे में बताएं, जो उनकी दृष्टि में विधिक मान्यताओं एवं निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन है, कार्रवाई का अधिकार तो सरकार को ही देना होगा। संविधान पीठ ने भी यही कहा कि प्राकृतिक संपदा के संबंध में मूल्य और नीलामी प्रक्रिया या टेंडर परंपरा-कौन-सी विधि अपनाई जाए, इसे सरकार को ही तय करना है।
लोकतंत्र में सर्वोच्च शक्ति जनता ही है, जो संविधान के स्वरूप निर्धारण के लिए प्रतिनिधियों का चयन करके उन्हें अधिकार देती है। इसलिए उसे विभिन्न सांविधानिक संस्थानों में भी कार्य करना पड़ेगा। उसकी इच्छा शक्ति और निर्णायक क्षमता बने रहना ही लोकतंत्र का गुण है, इसलिए किन्हीं संस्थाओं को उससे ऊपर नहीं माना जा सकता। उनका कर्तव्य यही है कि जब तक निर्धारित प्रक्रिया और स्वरूप में परिवर्तन न हो, तब तक उसके प्रति निष्ठावान बने रहें।
विज्ञापन
मर्यादाओं का निर्धारण तो हो, लेकिन उनके उद्देश्य, उनका होने वाला प्रभाव भी वैयक्तिक सांविधानिक अधिकारों का अतिरेक न करे। न्यायिक सीमाएं भी ऐसी ही बनाई गईं, जो परम स्वतंत्र नहीं थीं, बल्कि उनके लिए भी सभी की भांति सांविधानिक सीमाएं थीं, जिनका उल्लंघन नहीं होना चाहिए। इसीलिए जब प्रश्न उठा कि न्यायपालिका अपने अधिकारों का अतिरेक कर व्यवस्था के निर्माण की ओर बढ़ रही है, तो इसे सांविधानिक रुचि के विपरीत मर्यादा हनन माना गया कि उसका काम शासन करना नहीं और न नीतियों का निर्धारण और अमल ही है, बल्कि उसे केवल यही देखना है कि विधायिका और कार्यपालिका को जो अधिकार मिले हैं, वे उसी के तहत काम कर रही हैं या नहीं। हाल ही पांच न्यायाधीशों की जो संविधान पीठ बनी थी, उसने भी दोहराया कि न्यायपालिका को भी अपनी सीमाओं और मर्यादाओं का सदैव ध्यान रखना चाहिए।
विज्ञापन
जहां तक सांविधानिक संस्थाओं का संबंध है, तो चुनाव आयोग, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक, निगरानी आयोग आदि इसी प्रकार की संस्थाएं हैं। इसी दिशा में लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं की आवश्यकता और उन्हें अधिकार देने की बात हो रही है। दरअसल लोकतंत्र में जनता को ही सबसे बड़ा अधिकार है। सांविधानिक संस्थाओं को राष्ट्रपति ने जिस लक्ष्मण रेखा की याद दिलाई, वह वास्तव में और कुछ नहीं, मात्र इतना है कि सारी संस्थाओं को अंततः संसद के प्रति जवाबदेह होना होगा। लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग प्रमुख संस्था है, जो पूरी निर्वाचन विधा के साथ ही उसे नियंत्रित और संचालित करती है। लेकिन उसके लिए भी संसद ने जनप्रतिनिधित्व कानून द्वारा विभिन्न व्यवस्थाएं बना रखी है।
विज्ञापन
यही कारण है कि एक बार चुनाव आयोग ने संसद से अपेक्षा की थी कि वह जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन कर जिन व्यक्तियों पर गंभीर आरोपों में मुकदमा चल रहा हो, उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अपात्र बना दे, लेकिन संसद इसके लिए तैयार नहीं हुई, उसका मानना था कि अभियोग जब तक सिद्ध न हो जाए, तब तक किसी को भी दोषसिद्ध अपराधी नहीं माना जा सकता। इसलिए गंभीर आरोपों में भी लोग चुनाव लड़ने के अयोग्य नहीं होते। इसी प्रकार नियंत्रक और महालेखा परीक्षक तथा निगरानी आयोग को भी किसी मामले में अभियोग चलाने के लिए अधिकार नहीं दिए गए हैं। इन संस्थाओं की भूमिका यही है कि वे संसद को उन विसंगतियों के बारे में बताएं, जो उनकी दृष्टि में विधिक मान्यताओं एवं निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन है, कार्रवाई का अधिकार तो सरकार को ही देना होगा। संविधान पीठ ने भी यही कहा कि प्राकृतिक संपदा के संबंध में मूल्य और नीलामी प्रक्रिया या टेंडर परंपरा-कौन-सी विधि अपनाई जाए, इसे सरकार को ही तय करना है।
लोकतंत्र में सर्वोच्च शक्ति जनता ही है, जो संविधान के स्वरूप निर्धारण के लिए प्रतिनिधियों का चयन करके उन्हें अधिकार देती है। इसलिए उसे विभिन्न सांविधानिक संस्थानों में भी कार्य करना पड़ेगा। उसकी इच्छा शक्ति और निर्णायक क्षमता बने रहना ही लोकतंत्र का गुण है, इसलिए किन्हीं संस्थाओं को उससे ऊपर नहीं माना जा सकता। उनका कर्तव्य यही है कि जब तक निर्धारित प्रक्रिया और स्वरूप में परिवर्तन न हो, तब तक उसके प्रति निष्ठावान बने रहें।