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सिर्फ कोयले से नहीं होगी रोशनी

Sun, 14 Apr 2013 10:17 PM IST
सीमा जावेद
सीमा जावेद Updated Sun, 14 Apr 2013 10:17 PM IST
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light will not get only coal

तापमान बढ़ते ही बिजली का संकट मंडराने लगा है। आए दिन बिजली कटौती की गाज जब देश की राजधानी दिल्ली पर गिर रही हो, तब अन्य जगहों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मई-जून आते-आते छोटे-मोटे शहरों में तो दो-चार घंटे भी बिजली नसीब होने के लाले पड़ जाते हैं।

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ऊर्जा किसी भी देश या राज्य के आर्थिक विकास की पहली जरूरत होती है। आजादी के बाद से अब तक अपनी ऊर्जा जरूरतों को थर्मल पावर उत्पादन के सहारे पूरा करने के कोशिशों में हमें नाकामयाबी हाथ लगी है। पिछले साल ही ग्रिड फेल होने की घटनाओं ने संकेत दे दिया था कि जीवाश्म ईंधन और कोयले पर आधारित बिजली बहुत भरोसे लायक नहीं है और यह कभी भी धोखा दे सकती है। गौरतलब है कि करीब 210 गीगावाट क्षमता के साथ भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा बिजली उत्पादक देश है और इसकी 66 फीसदी बिजली का उत्पादन कोयला दहन से होता है।
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जाहिर है कि बिजली संकट का समाधान दिन-ब-दिन महंगी होती जा रही कोयला दहन वाली प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता बढ़ाकर संभव नहीं है। बिजली संकट के टिकाऊ और दीर्घकालिक हल के लिए हमें अक्षय ऊर्जा के स्रोतों जैसे सौर और बायोमास में निवेश बढ़ाकर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का एक ठोस बुनियादी ढांचा बनाने की दिशा में तत्पर होना होगा।
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कोयला आधारित बिजली उत्पादन कितना घातक है, इसका पता एक नई रिपोर्ट से चलता है, जो बताती है कि 2011-12 में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से उत्सर्जन के कारण देश में एक लाख लोगों की असमय मृत्यु हो गई। इनमें से 8,800 लोग दिल्ली और हरियाणा के हैं।

रिपोर्ट ने यह भी खुलासा किया है कि कोयला विद्युत संयंत्रों से होने वाले इस उत्सर्जन से अन्य करोड़ों भारतीयों के जीवन की गुणवत्ता और  स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। अध्ययन से पता चलता है कि कोयला आधारित बिजली स्टेशनों से उत्सर्जन के कारण दमा, श्वसन समस्या और हृदय रोग के लाखों मामले सामने आए हैं।

बिजली संयंत्र की स्थापना हवा के रुख और जनसंख्या घनत्व पर केंद्रित होती है, इसलिए दिल्ली-हरियाणा और पश्चिम बंगाल-झारखंड क्षेत्र में समस्या सबसे गंभीर है। मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़-झारखंड-ओडिशा क्षेत्र (कोरबा, सिंगरौली और तालचेर का इलाका) भी खतरनाक जोन में आता है। इसके अलावा मुंबई और पश्चिमी महाराष्ट्र, पूर्वी आंध्र प्रदेश और चंद्रपुर-नागपुर विदर्भ क्षेत्र में भी मृत्यु दर अधिक है।

गौरतलब है कि पिछले पांच साल में देश में नई कोयला खदानों और कोयले पर आधारित ताप बिजली घरों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। अगर 2007 से पहले की स्थिति और 2007 से 2011 के बीच कोयला खदान लीज एरिया और कोयला उत्पादन क्षमता पर नजर डालें, तो वह करीब-करीब दोगुना हो चुका है।

इन सभी नई कोयला खदानों और प्रस्तावित बिजली घरों में ज्यादातर मध्य भारत के उसी क्षेत्र में हैं, जहां घने जंगल है। यानी ये वन क्षेत्रों और उनमें बसे आदिवासियों की आजीविका के लिए खतरा हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी वन संसाधनों का विनाश किया गया, तब इन समुदायों को विस्थापन और दरिद्रता के दलदल में धकेल दिया गया।

ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को देखते हुए भी कोयला आधारित बिजली घरों का समर्थन नहीं किया जा सकता। दुनिया में सालाना लगभग 11 अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड कोयला दहन से पैदा होती है। यह सच है कि कोयला बाजार में उपलब्ध सबसे सस्ता जीवाश्म ईंधन है, लेकिन इसकी वास्तविक कीमत बहुत अधिक है। मानव और पर्यावरण को यह भीषण नुकसान पहुंचाता है, लिहाजा कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर अंकुश लगाकर ही हम जलवायु परिवर्तन को रोक सकते हैं।

अगर राजधानी दिल्ली की ही बात करें, तो यहां तीन-चौथाई बिजली अन्य राज्यों में स्थित कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट से आती है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कोयले का दाम बढ़ने के कारण पिछले साल 32 मुख्य पावर प्लांट और दिल्ली को बिजली की आपूर्ति करने वाले पांच पावर प्लांटों ने कोयले की कमी का सामना किया। इसके चलते आठ सौ मेगावाट बिजली के उत्पादन में कमी आई।

दूसरी ओर ठीक इसी वक्त सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र ने अनुमान से अधिक बिजली उत्पादन किया। कोयले की कमी के चलते एनटीपीसी की उपयोगिता क्षमता में 7.8 अरब किलोवाट की गिरावट आई है। कोयले की कमी के कारण इस समय एनटीपीसी द्वारा चालित थर्मल पावर प्लांट के उत्पादन में बीस प्रतिशत गिरावट आई है। मतलब साफ है कि आने वाली भीषण गर्मी में भरोसेमंद और टिकाऊ बिजली के लिए सिर्फ कोयला जलाकर बिजली उत्पादन से काम नहीं चलने वाला। लेकिन विडंबना यह भी है कि दिल्ली देश के उन राज्यों में से है, जिनके पास पवन व सौर ऊर्जा तथा बायोमास जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने की कोई नीति नहीं है।


यह हमारे योजनाकारों के लिए चेतावनी की तरह है। कोयला खनन देश के जंगलों, आदिवासी समुदायों और लुप्तप्राय प्रजातियों को नष्ट कर ही रहा है, कोयला जलाने से हो रहा प्रदूषण हजारों लोगों को असमय काल के गाल में धकेल रहा है। इसके बावजूद वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की दिशा में हम कोई काम नहीं कर रहे। जबकि अपने देश में पवन और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। जरूरत सिर्फ वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को प्रोत्साहित करने की नीति की है।

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