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गलियारे से आती रोशनी

Fri, 08 Nov 2019 07:21 PM IST
Raman Singh प्रशांत दीक्षित सामरिक विशेषज्ञ
प्रशांत दीक्षित सामरिक विशेषज्ञ Published by: Raman Singh Updated Fri, 08 Nov 2019 07:21 PM IST
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Light coming from the corridor
प्रशांत दीक्षित सामरिक विशेषज्ञ - फोटो : a

करतारपुर गलियारे के उद्घाटन के बाद क्या भारत और पाकिस्तान के तल्ख रिश्ते में कोई बदलाव आएगा? बड़ी संख्या में लोग गुरु नानक देव जी के आशीर्वाद की कामना कर रहे हैं, जिन्होंने अपने 550 वें प्रकाश पर्व पर उम्मीद की यह रोशनी दिखाई है। पिछली सहस्राब्दी के आखिर में फरवरी, 1999 में भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच हुई शिखर वार्ता के दौरान सिख धार्मिक स्थलों, भारत के पंजाब में स्थित डेरा बाबा नानक साहब और पाकिस्तान के पंजाब में स्थित गुरुद्वारा दरबार साहब को जोड़ने के लिए एक गलियारा बनाने पर सहमति बनी थी। भारत और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित इन दोनों धर्म स्थलों के बीच 4.7 किलोमीटर की दूरी है, जिन्हें जोड़ने के लिए यह गलियारा बनाया गया है। अभी भारत के श्रद्धालुओं को करतारपुर जाने के लिए लाहौर से बस पकड़नी पड़ती है और 125 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद ही वे वहां पहुंच सकते हैं, जबकि भारत की सीमा से पाकिस्तान में स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब नजर आता है।


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भारत की ओर से एक एलिवेटेड गलियारे में खड़े होकर लोग दूरबीन से गुरुद्वारा दरबार साहब का दीदार करते रहे हैं। दरबार साहब का निर्माण उस ऐतिहासिक स्थल पर किया गया, जहां गुरु नानक ने अपनी धार्मिक यात्राओं के बाद अपना ठिकाना बनाया और सिख समुदाय को जोड़ा। यह गुरुद्वारा उस जगह पर स्थित है, जहां गुरु नानक देव जी ने 22 सितंबर, 1539 को अंतिम सांस ली थी। सिख समुदाय के लिए दरबार साहब सबसे पवित्र धर्म स्थल है। इंटरनेट खंगालेंगे तो पता चलेगा कि दुनियाभर में 2.7 करोड़ सिख हैं, जिनकी विश्व की कुल आबादी में 0.40 फीसदी की हिस्सेदारी है और 83 फीसदी सिख भारत में रहते हैं। 76 फीसदी सिख भारत के पंजाब में रहते हैं और देश के हर हिस्से में उनकी मौजूदगी है। पाकिस्तान के दावे के मुताबिक वहां पचास हजार सिख हैं, लेकिन अधिकांशतया वे खैबर पख्तूनख्वा में रहते हैं, जबकि सिंध और पंजाब में उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है। दिलचस्प है कि सिख समुदाय की अच्छी-खासी आबादी ब्रिटेन, अमेरिका, मलयेशिया, पूर्वी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और थाईलैंड में भी रहती है। वैश्विक आबादी के अनुपात में कनाडा में 1.4 फीसदी के साथ सबसे अधिक सिख रहते हैं। समझा जा सकता है कि इस गलियारे के निर्माण से मजबूत वैश्विक संदेश जाएगा और यह भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए लाभदायक है।  

गलियारे का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में स्थित है, लिहाजा इससे उसकी सार्वजनिक छवि को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी; मौजूदा परिदृश्य में जब पाकिस्तान को आतंकवाद के पोषित देश के रूप में देखा जाता है, उसे इससे लाभ हो सकता है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने उद्घाटन के दिन सिख श्रद्धालुओं से कोई शुल्क न लेने और सिर्फ साधारण पहचान पत्र के साथ आने की घोषणा कर इस अवसर का लाभ अपनी छवि सुधारने में किया है।    

लेकिन इस उत्साह के बावजूद देखा जा सकता है कि दोनों देशों की सरकारों के दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की कोशिशों को कुछ ताकतें ध्वस्त करना चाहती हैं। याद कीजिए कि जब वाजपेयी और शरीफ 21 फरवरी, 1999 को लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर रहे थे, उस समय पाकिस्तानी सेना कारगिल की अपनी दुस्साहसी साजिश को अंतिम रूप दे रही थी और बर्फ के पिघलने का इंतजार कर रही थी। उसके बाद दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया जो मई से जुलाई, 1999 तक चला। सौभाग्य से इसने लाहौर बस सेवा को प्रभावित नहीं किया, लेकिन पाकिस्तान पोषित आतंकियों ने जब भारतीय संसद पर हमला किया, तब न केवल यह बस सेवा रोक दी गई, बल्कि उसके बाद दोनों देशों की सरहद पर संभावित युद्ध को लेकर फौजों का जमावड़ा हो गया। यहां तक कि इसकी वजह से दो वर्ष तक समझौता एक्सप्रेस भी बंद रही।

यह मजबूत धारणा है कि आतंकियों और देश के कट्टरपंथियों पर पाकिस्तान की लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार का कभी कोई नियंत्रण रहा ही नहीं। अफगान युद्ध में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को साथ लेने का पाकिस्तान की राजनीति पर गहरा असर पड़ा। पहला, इस्लामिक कट्टरता ने गहरी जड़ें जमा लीं। दूसरा, छोटे और हलके हथियारों की बाढ़ आ गई, जिसे खासतौर से सीमापार से भारत में पहुंचाया गया। यही नहीं, पाकिस्तानी फौज ने आतंकियों और उग्रवादी समूहों को पोषित किया, जिनका वह अपनी रणनीति जरूरतों के अनुसार इस्तेमाल करता आया है। गौर करने वाली बात यह है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने उन्हें मनमाने ढंग से काम करने की छूट दे रखी है। तथ्य यह है कि ये समूह हमेशा सक्रिय रहते हैं और उन्हें पूर्व पाकिस्तानी फौजी नियमित रूप से पेशेवर प्रशिक्षण देते रहते हैं। बालाकोट स्थित जैशे मोहम्मद एक पारंपरिक जेहादी गुट है। अमेरिका में रहने वाली पाकिस्तानी इतिहासकार आयशा जलाल की किताब पार्टिशन्स ऑफ अल्ला-जिहाद इन साऊथ एशिया, कट्टरपंथी इस्लाम और युद्धोमांद के लक्षण को समझने में मददगार हो सकती है। वास्तव में जब पाकिस्तान ने आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू किया तो उसने भी खैबर पख्तूनख्वा से गतिविधि चलाने वाले इन समूहों को हाथ नहीं लगाया।   

हमें करतारपुर गलियारे की सुरक्षा को इस पृष्ठभूमि के साथ देखना चाहिए। नारोवाल जिले में जहां दरबार साहब स्थित है, वहां आतंकियों के प्रशिक्षण से संबंधित कुछ खबरें हाल ही में मीडिया में आई हैं। इसके अलावा भारतीय सीमा में ड्रोन के जरिये हथियार गिराने की कम से कम दस कोशिशों की जानकारी भी मीडिया में आई है। ऐसी भी आशंकाएं जताई गई हैं कि करतारपुर गलियारे का दुरुपयोग दुष्प्रचार और हथियारों की आवाजाही के लिए किया जा सकता है। पाकिस्तान के नियंत्रण वाले हिस्से में भारतीय श्रद्धालुओं की सुरक्षा एक बड़ा प्रश्न है। इस बारे में इमरान खान की क्षमता का आकलन किए जाने की जरूरत है।

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