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जीवन जीने का नाम है

Mon, 31 Dec 2018 06:48 PM IST
Raman Singh मनोरंजन व्यापारी
मनोरंजन व्यापारी Published by: Raman Singh Updated Mon, 31 Dec 2018 06:48 PM IST
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Life is the name of living
बच्चे

वर्षों पहले कोलकाता में रिक्शे पर बैठी एक भद्र महिला से, जो बाद में साहित्यकार महाश्वेता देवी निकलीं, मैंने जिजीविषा शब्द का अर्थ पूछा था। उन्होंने कहा था, जीने की इच्छा। जीने की वह दुर्निवार इच्छा ही मुझे भूख, भटकाव और संघर्ष से जीवन के इस मोड़ पर ले आई, जहां मैं अपने और दूसरों के जीवन संघर्ष को एक लेखक के रूप में दर्ज कर सकता हूं।


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जिजीविषा बांग्लादेश के बरिशाल से शरणार्थी बनकर भारत आए और जादवपुर में मजदूरी करने के लिए सुबह पांच बजे घर से निकलते मेरे पिता में भी बहुत थी। उन्हें साढ़े तीन रुपये मजदूरी मिलती, जिनमें से पचास पैसे वह दोपहर में खाने के लिए मांग लेते थे। उससे वह ब्रेड, एक प्लेट आलू की सब्जी और बीड़ी खरीदते। रात वह घर लौटते, तो उन रुपयों से चावल खरीदे जाते और देर रात हमें भात खाने को मिलता। बचे हुए भात में पानी डाल दिया जाता, जो हम सबके लिए सुबह का नाश्ता होता। लेकिन जिस दिन पिता को जादवपुर में काम नहीं मिलता, वह भूखे-प्यासे दिन भर रेलवे स्टेशन पर बैठे रहते और रात को ही घर लौटने की गाड़ी पकड़ते, क्योंकि दिन में वह बिना टिकट रेल यात्रा नहीं कर सकते थे। इस बीच मां और मैंने चटाई बुनना शुरू कर दिया था। दिन भर में हम दो चटाई बनाते, तो तीन रुपये मिलते, जिसमें डेढ़ रुपये की तो लागत थी, जो हमारे लिए भारी पड़ती थी। उस जिजीविषा ने ही गैस्ट्रिक अल्सर का इलाज न होने पर भी पिता को सक्रिय रखा। हालांकि कभी-कभी मोहल्ले के होम्योपैथी डॉक्टर से एक रुपये की गोली ली जाती, जिससे इलाज तो क्या होता, हां, यह आश्वस्ति रहती कि पिता का ध्यान रखा जा रहा है। लेकिन जिस दिन होम्योपैथी की गोली आती, उस दिन चटाई बुनने का कच्चा माल हम नहीं खरीद पाते। इस तरह पिता का इलाज कराने का मतलब था हम सब का भूखे रहना।
 
पिता जीना चाहते थे, तभी तो बंगाल में घिसट-घिसटकर जीने के बाद दूसरी बार दंडकारण्य के बीहड़ में जाने को तैयार हो गए थे, ताकि पेट भर खाने के साथ राशन कार्ड भी पा सकें, क्योंकि रिफ्यूजी बनकर कोलकाता आने के बाद दंडकारण्य न जाकर पिता ने सरकारी अधिकारियों की नाराजगी मोल ले ली थी। इसलिए हमें राशन कार्ड नहीं मिला था। शुरू में दंडकारण्य न जाने के पीछे डर था। रामायण में हमने जिस दंडकारण्य का जिक्र सुना था, वह भयानक था और हम जीते-जी खुद को मौत के मुंह में धकेलने को तैयार नहीं थे। किशोर उम्र में एक दिन मुझे कुत्ते ने काट लिया था, लेकिन रैबीज के इंजेक्शन लगवाने के पैसे नहीं थे। इस तरह बिना सुई लगाए भी मैं जिंदा रहा। जबकि उसी दौरान भात के अभाव में मेरी छोटी बहन की मृत्यु हो गई। तभी मैं समझ गया कि आदमी के जीने के लिए भात से जरूरी कोई चीज नहीं है। मेरे मन के अंदर जीने की इच्छा जोर मारती और एक क्रोध भी पनपता। यह अपने होने का क्रोध था, अपनी नाकामी से उपजा क्रोध था, अपने आसपास के लोगों के स्वभाव पर उपजा क्रोध था। सच पूछिए, तो इस क्रोध ने ही मुझे जिंदा रखा। पिता और परिवार दंडकारण्य चले गए, तो थोड़े दिनों तक उनके साथ रहने के बाद मैं पूरी तरह यायावर हो गया। मुझे एक अच्छी नौकरी चाहिए थी, लेकिन मूर्ख लड़के को अच्छी नौकरी कौन देता! ज्यादातर चाय दुकान की नौकरी मिलती। लेकिन रेल पर देश घूमने का लाभ तो हुआ ही। मैं जीवन को संपूर्णता में समझ पाया।

अभाव और दुत्कार के बीच कुछ अच्छे लोग भी मिले, जिनके कारण मैं यहां तक पहुंच पाया। जब कोलकाता में आसपास के बच्चों को नक्सल आंदोलन में अपनी लिप्तता के झूठे आत्मगौरव भरे किस्से सुनाने के कारण माकपा के लोगों ने नक्सल समझकर मेरी पिटाई की, तब सचमुच के कुछ नक्सलियों ने मेरी मदद की, जिस कारण मैं जीवन के विविध अनुभवों से रूबरू हो सका। जादवपुर में रिक्शा चलाते हुए गुस्से में भद्रलोक सवारियों को उन्हीं की भाषा में टेढ़ा जवाब देने के कारण जब मुझे झूठी धाराओं में जेल भेज दिया गया, तब जेल में सचमुच का एक भद्रलोक मेरी मदद करने के लिए तैयार था। उन्होंने कहा कि जेल से बाहर तुम्हारा घर नहीं था, यहां है। बाहर तुम्हारे भोजन की गारंटी नहीं थी, यहां है। यहां तक कि बीमार पड़ने पर दवाओं की व्यवस्था भी है, जो हम जैसों के लिए विलासिता से कम नहीं थी। वह बाबू चाहते थे कि मैं अक्षर ज्ञान हासिल कर लूं, ताकि जेल से निकलने पर सिर उठाकर जी सकूं। मैंने उनकी बात मान ली और अक्षर ज्ञान सीखने लगा।

जेल से निकलने पर मैं दोबारा रिक्शा चलाने लगा, लेकिन पढ़ने का नशा मुझ पर हावी हो चुका था। मैं एक किताब खत्म करता, और दूसरी शुरू कर देता। उसी दौरान महाश्वेता देवी से मिलना हुआ। उनकी पत्रिका वर्तिका के लिए लेख लिखने के बाद मेरा जीवन बदल चुका था, क्योंकि युगांतर में उसकी समीक्षा छपने पर लोगों का मेरी ओर ध्यान गया। रिक्शा स्टैंड में पत्रकार और लेखक मुझे ढूंढने लगे थे।

अब मैं एक लेखक हूं। पहले मेरे अंदर का जो क्रोध दूसरे लोगों पर उतरता था, उसे अब रचनात्मक दिशा मिल गई है। मेरे चार कहानी संग्रह और पंद्रह उपन्यास छप चुके हैं। मैं एक आवासीय स्कूल में रसोइया हूं, जहां सुबह छह से ग्यारह बजे तक, फिर शाम के छह बजे से ग्यारह बजे तक खाना बनाता हूं। जितना वेतन मिल जाता है, वह परिवार के लिए पर्याप्त है, क्योंकि बेटा और बेटी, दोनों आत्मनिर्भर होने की राह पर हैं। साहित्यिक व्यस्तताओं के चलते महीने में औसतन दस दिन मैं काम पर नहीं जाता। लेकिन स्कूल प्रबंधन को मेरी मुश्किलों से कोई लेना-देना नहीं। वह साफ कहता है, हमें रसोइया चाहिए, लेखक नहीं। इस बीच एक प्रसिद्ध अंग्रेजी प्रकाशक मेरी पंद्रह किताबों के अनुवाद कर रहा है। उसने मुझे जो पैसे दिए हैं, वेे काफी हैं। मुझे इस बात की खुशी है कि अब देश के बाहर के लोग भी मेरे साहित्य से परिचित हो सकेंगे। मेरे पाठकों की संख्या बढ़ेगी। पर मैं अपने पाठकों को एक ही बात कहना चाहूंगा कि हमेशा अपने भीतर के क्रोध को जिंदा रखें, क्योंकि इसी से चुनौतियों से निपटा जा सकता है। मैं अपने उदाहरण से कह सकता हूं कि अगर आपमें जिजीविषा हो, तो तमाम मुश्किलें आसान हो जाती हैं।    

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