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अपदस्थ हो मृत्यु तो जिएं हम फिर

Sun, 06 Jun 2021 05:16 AM IST
गौतम चटर्जी गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी Published by: गौतम चटर्जी Updated Sun, 06 Jun 2021 05:16 AM IST
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Let death die and we live again
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : amar ujala

आरंभ दुःस्वप्न से हो, तो जागने पर भी जीवन दुरुह लगता है। जैसे मैंने यह सपना देखा कि सारनाथ के धम्मेख स्तूप और संग्रहालय को धराशायी कर दिया गया है कि वहां अब सम्राट अशोक का राजमहल बनेगा। जागने पर मैंने सोचा कि संग्रह दोबारा तो हो सकता है, लेकिन क्या संग्रह को संजोने की विद्या का बुद्धिमतापूर्ण कौशल दोबारा हमें मिल सकता है? क्या हमें चार्ल्स कोरिया दोबारा मिल सकते हैं? ठीक वैसे ही क्या कबीर हमें दोबारा मिल सकते हैं? ठीक वैसे ही, जो अभी-अभी चले गए, क्या वे दोबारा हमें मिल सकते हैं?


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ऐसी महामारियां पहले भी आई हैं, जो दुःस्वप्नों से भरा जीवन हमारी गोद में छोड़ जाए। परिवार समाप्त हो जाते हैं, वंश समाप्त हो जाता है, और इस बार तो पूरा घराना ही समाप्त हो गया। बनारस का संगीत घराना गायन, तबला और कथक के कारण जाना गया है। अन्य कई कारणों से भी जाना जा सकता था। जैसे 20वीं शती में ही उस्ताद आशिक अली खां साहब बनारस आए। वह सेनिया घराने यानी तानसेन के घराने के थे। वह आए, तो घराने की खुशबू भी साथ आई और बनारस में फैलती चली गई। उनके बेटे मुश्ताक अली, अमिय गोपाल भट्टाचार्य, देबू चौधरी, राम चक्रवर्ती जैसे कलाकारों की एक समृद्ध पीढ़ी बनती और बढ़ती चली गई। इनमें सभी सितार और सुरबहार बजाते थे। इस प्रकार सितार का सेनिया-बनारस घराना बनारस के संगीत घराने का अनिवार्य और अविभाज्य अंग बन गया। बीसवीं शती का बनारस इस घराने के प्रति कृतकृत्य हुआ।

राम चक्रवर्ती ने सितार शिल्प को नई उंचाई दी, तो उनकी पत्नी कृष्णा चक्रवर्ती ने अमेरिका में रहकर पंडित रविशंकर के सान्निध्य में इस विधा की उंचाई को एक नया स्वर दिया। इस घराने के दो शेष शिल्पी कृष्णा चक्रवर्ती और देबू चौधरी इस महामारी में पिछले दिनों क्रमशः दिवंगत हुए। और देबू चौधरी के देहांत के अगले हफ्ते उनके बेटे प्रतीक भी नहीं रहे। वह भी सितार शिल्पी थे। कृष्णा चक्रवर्ती के चले जाने से बनारस से राष्ट्रीय स्तर के अब तक के अंतिम कलाकार का भी अवसान हो गया। उनसे पहले तक इस स्तर पर हम बिस्मिल्लाह खां, किशन महाराज और गिरिजा देवी को जानते रहे हैं। बनारस हरिशंकर जी के ध्रुपद गायन के कारण भी प्रसिद्ध हुआ है। उसी बनारस में पल्लव दास देश में अपनी प्रतिष्ठा के साथ ध्रुपद गायन की उस परंपरा को समृद्ध कर रहे थे, जिसमें उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर और उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर का स्पर्श आ मिला था। इस महामारी ने 48 साल के पल्लव को भी अपनी गोद में सुला दिया।

क्या ये हमें दोबारा मिल पाएंगे? इसी स्वर में यह पूछा जा सकता है कि महामारी तो हमारे हाथ में नहीं है, पर यदि हम कुछ नष्ट या धराशायी या विस्थापित कर रहे, तो क्या उसे दोबारा उसी गरिमा में रच पाएंगे। बनारस में ही कबीर कहा करते थे, बल्कि ध्यान दिलाया करते थे कि देखो, कोई तुम्हारा खेत चर जा रहा और तुम इसकी सुधि नहीं ले रहे। इतनी मृत्यु के बाद लोगों में श्मशान वैराग्य की स्थिति थोड़ी बढ़ी हुई है और इस वैराग्य में मृत्यु के प्रति हमारा आदिम भय कुछ अधिक ही जाग उठा है। यह हमारे व्यवहार को मनुष्य, पृथ्वी और इसकी समूची सभ्यता के प्रति विनयशील तो नहीं बना रहा, पर एक सहमे-से प्रायश्चित भाव में जरूर बदल रहा। सभी यह इच्छा रखते हैं कि मृत्यु की मृत्यु हो। मरना कोई नहीं चाहता।

और जीने की तमीज हम इतनी सभ्यताओं के बावजूद सीख नहीं पाए हैं। यदि महामारी से बच गए, तो फिर हम उस जीवन को जीने लगेंगे, जिसका परिचय समाज में बनता है- यानी ईर्ष्या, द्वेष, लालच, भय, फरेब, पाखंड, छल, छद्म, हिंसा और षड्यंत्र। तो फिर मरने में क्या बुराई? क्या ऐसा जीवन जीने के लिए ही हम जीना चाहते हैं? वस्तुतः हम मूर्खता से भरपूर ऐसा सतही जीवन पूरी शिद्दत से जीते हैं और मृत्यु को एक दूरस्थ स्टेशन के तौर पर कहीं प्रक्षेपित किए होते हैं। यदि किसी प्रिय की मृत्यु करीब से देख ली, तो अपनी मृत्यु के प्रति भयभीत होकर या तो कुछ दिनों के लिए अपनी दुनिया सहेजने में लग जाते हैं या फिर ध्यान, योग, प्राणायाम के नाम पर व्यायाम करने में जुट जाते हैं, या फिर किसी शाश्वत जीवन के अनंत घर में रहने की कल्पना से मनोवैज्ञानिक क्षति की पूर्ति कर आध्यात्मिक जीवन को भ्रष्ट करने में जुट जाते हैं। यहां भी हम कुछ प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा लिए लालची बने रहते हैं, जिसे हम कुंडलिनी जागरण, स्वर्ग, मोक्ष आदि का नाम देते रहते हैं।

आसन पर बैठकर और देह को कोई विशेष मुद्रा सौंप थोड़ी देर शांति के भ्रम में रहने से बेहतर है यह प्रश्न करना कि यह सब हम क्या पाने के लिए कर रहे हैं। जिसे हम जीवन समझते हैं और उसमें अथक संघर्ष कर रहे होते हैं, उसका अंत ही मृत्यु है। और प्रत्येक अंत में एक सुंदर आरंभ है। यही वह आरंभ है, जहां मृत्यु की छाया नहीं है। यहां ऐसे राजमहल के निर्माण की जरूरत नहीं, जिसके लिए कुछ विनष्ट करना पड़ता है या जिसके बन जाने पर वह दु:स्वप्न नहीं लगता। वहीं हम देख सकते हैं सत्य का धम्मेख और सुन सकते हैं हमारे लिए उच्चारित हो रही कोई शाश्वत देशना, जिसमें वह सब कुछ है-यानी शुभ, सुंदर और कोमलतम, जो आज पाखंड के सामने अपदस्थ हो रहा है।

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