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ललित मोदी के खुलासों का सबक

Sun, 05 Jul 2015 07:50 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 05 Jul 2015 07:50 PM IST
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Lesson of revealtion of lalit modi

जो बात कहने जा रही हूं मैं आज, आपमें से कइयों को अच्छी नहीं लगेगी, लेकिन न कहना गलत होगा। कहना मैं यह चाहती हूं कि ललित मोदी ने भारत की वह सेवा की है, जो हमारी तमाम खोजी संस्था नहीं कर पाई है। जब भी किसी भारतीय धनवान या बड़े राजनेता का काला धन पाया जाता है किसी गुप्त विदेशी बैंक खाते में, तो कुछ दिनों के लिए सीबीआई जांच की मांग गूंजने लगती है। जांच का फैसला होते ही सारा मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। ललित मोदी ने सोशल मीडिया द्वारा नेताओं के ऐसे पोल खोले हैं कि ढर्रे की जांच की गुंजाइश नहीं छोड़ी है।

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सुषमा स्वराज से लेकर बात शुरू हुई वसुंधरा तक पहुंची और फिर धीरे-धीरे मोदी की पोटली से निकल कर आए हैं इतने नाम, इतने राज कि बोलती बंद कर दी राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं की। इन तमाम चर्चाओं में उस बात पर सबसे कम बहस हुई, जो मेरी राय में सबसे महत्वपूर्ण है। कुछ सवाल इस तरह के होने चाहिए थे- हमारे राजनेताओं का इतना गहरा रिश्ता क्यों है ललित मोदी जैसे धनवानों से और बीसीसीआई जैसी अति धनवान खेल संस्था से? ऐसा क्यों होता है कि ईमानदार राजनेता भी फंस जाते हैं चक्रव्यूह में? ऐसा क्यों होता है कि पाए जाते हैं ये लोग बार-बार उस हमाम में, जिसमें सब नंगे हैं?
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इसके कुछ जवाब मैं पेश करती हूं-इसलिए कि काले धन के बिना चल ही नहीं सकती भारतीय राजनीति की गाड़ी। जो लोग राजनीति से वास्ता नहीं रखते हैं, उन्हें भी मालूम है कि चुनाव के समय अति ईमानदार नेता भी पैसा लेते हैं उद्योगपतियों से और ये पैसा काला होता है। कुछ राजनेता ऐसे हैं, जो बेझिझक मानते हैं कि ऐसा होता है, जबकि कुछ लोग ऐसे हैं, जो पारदर्शिता का केवल ढिंढोरा पीटते फिरते हैं। भारत का ज्यादातर काला धन देश में ही है, पर इसका कुछ हिस्सा विदेशी बैंक खातों में है, जो वहां पहुंचता है हवाला के माध्यम से।
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ललित मोदी ने नाम लिया है एक ऐसे व्यक्ति का, जो हवाला किंग माना जाता है। साथ ही इशारा किया है कि विवेक नागपाल के रिश्ते आला राजनीतिज्ञों और उच्च स्तरीय सरकारी अधिकारियों से भी हैं। शायद अपने खुलासों की अगली किस्त में वह उन सबके नाम बताएंगे, जिन्होंने नागपाल की सेवाएं ली हैं। शायद नागपाल की जांच भी शुरू हो जाएगी, पर यकीन मानिए कि यह सिलसिला खत्म नहीं होगा, क्योंकि सबसे ज्यादा काले धन का प्रयोग राजनीतिज्ञ करते हैं। यही कारण है कि हमारी खोजी संस्था काला धन ढूंढने का सिर्फ ढोंग करती है।


ललित मोदी ने इसी उम्मीद में अपने राजनीतिक दोस्तों की मदद की होगी कि मौका आने पर बदले में उनको भी मदद मिलेगी। लेकिन जब मुसीबत में फंसने पर कोई मदद करने के लिए सामने नहीं आया, तो लगता है कि मोदी को लगा कि समय आ गया है सबकी पोल खोलने का। वह अपने पुराने दोस्तों का नुकसान तो कर ही रहे हैं, लेकिन एक तरह से देश की सेवा भी कर रहे हैं। शायद इन खुलासों का परिणाम यह होगा कि राजनेता समझ जाएंगे कि चोरी-छिपे पैसा लेना खतरे से खाली नहीं है। हो सकता है कि भविष्य में चुनाव के समय जो पैसा इकट्ठा किया जाता है, उसमें थोड़ी पारदर्शिता आ जाए। यह राष्ट्र सेवा नहीं तो क्या है?

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