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सैन्यकर्मियों की कानूनी सुरक्षा
हर्ष कक्कड़, पूर्व मेजर जनरल
Updated Thu, 06 Sep 2018 06:06 PM IST
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भारतीय सेना
भारतीय इतिहास में यह पहली बार है कि 383 सैन्यकर्मियों ने सर्वोच्च न्यायालय की ही एक पीठ द्वारा सीबीआई को दिए गए निर्देश के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सीबीआई ने मणिपुर के कथित गैर-न्यायिक हत्या (फर्जी एनकाउंटर) मामले को समय से पूर्व बंद करने की इजाजत मांगी थी। सैन्यकर्मियों ने शीर्ष अदालत से अपने ऑपरेशन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने का आग्रह किया है, जिसमें उनके काम करने का माहौल, सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्स्पा) के तहत मुकदमों से संरक्षण और उत्पीड़न भी शामिल है। इस समय पीठ मणिपुर में सेना के खिलाफ दर्ज मामले की निगरानी कर रही है, जो उनकी अपील पर आने वाले हफ्तों में सुनवाई करेगी।
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नगालैंड में बढ़ते विद्रोह पर काबू पाने के लिए भारत ने 1958 में अफ्स्पा को लागू किया था, जिसे बाद में मणिपुर तक बढ़ा दिया गया, जब सेना को विद्रोह को नियंत्रित करने के लिए तैनात किया गया। इस कानून की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि सरकार पुलिस बल के जरिये विद्रोही गुटों की हिंसा को नियंत्रित करने में विफल साबित हो रही थी, सरकार को इसके लिए सेना को तैनात करने के लिए बाध्य होना पड़ा। पारंपरिक रूप से देश के आंतरिक हिस्सों में सेना को गिरफ्तार करने, हिरासत में लेने या गोली चलाने का अधिकार नहीं है, जब तक कि उन्हें विशेष अधिकार नहीं दिए जाते। विद्रोही गुटों की सभा या हिंसा के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार पुलिस के पास है। मणिपुर में हालात लगभग सामान्य होने के बाद स्वयंसेवी संगठनों ने सेना द्वारा स्थानीय लोगों की कथित गैर-न्यायिक हत्या से संबंधित जानकारियां इकट्ठा कीं। और फिर उन्होंने मुकदमा दर्ज किया, जो अभी शीर्ष अदालत में विचाराधीन है।
सेना का ऑपरेशन मणिपुर और जम्मू-कश्मीर में चलाया गया, लेकिन दोनों राज्यों में अंतर है। जम्मू-कश्मीर में अब भी सेना का ऑपरेशन जारी है और वहां आतंकवाद भारतीय धरती पर पाकिस्तान द्वारा छेड़ा गया परोक्ष युद्ध है। जम्मू-कश्मीर में ज्यादातर आतंकवादी पाकिस्तानी या पाकिस्तान द्वारा वित्तपोषित हैं। लेकिन मणिपुर में विद्रोह स्थानीय लोगों द्वारा शुरू किया गया और जारी रखा गया। कोई भी विद्रोह केवल तभी जीवित रह सकता है, जब उसे स्थानीय आबादी का समर्थन मिले। यहां सुरक्षा बलों को विद्रोहियों को उनके समर्थन आधार से अलग करने, स्थानीय लोगों में विद्रोहियों के प्रति गुस्सा और नाराजगी पैदा करने की जरूरत है।
सेना को सरकार ने अशांत क्षेत्रों में तैनात किया और विद्रोही समूहों द्वारा स्वतंत्र घोषित किए गए क्षेत्र को वापस पाने का काम सौंपा गया। नतीजतन विद्रोहियों से लड़ रही सेना और अन्य एजेंसियों के बहुत से जवान हताहत हुए। सेना के बलिदानों, उनके नुकसानों और जिन आघातों से वे अब भी जूझ रहे हैं, उन पर विचार किए बिना आज अदालत में उन्हें अपनी कार्रवाई को न्यायोचित ठहराने के लिए कहा जा रहा है। वह सरकार आज मूक दर्शक बनी हुई है, जिसने सेना को विद्रोह से निपटने का काम सौंपा, अफ्स्पा लगाकर उन्हें कार्रवाई में सक्षम बनाया, जबकि इन क्षेत्रों में ऑपरेशन चलाकर हालात सामान्य बनाने वाले लोगों को अदालत द्वारा सजा दी जा रही है। दिल्ली स्थित सैन्य मुख्यालय भी, जिसे अपने सैनिकों की रक्षा के लिए सबसे आगे होना चाहिए था, चुप है, क्योंकि सरकार की मंजूरी नहीं मिलने वाली। अफ्स्पा के तहत सैन्यकर्मियों को दी गई सुरक्षा की अनदेखी करके अगर अदालत द्वारा फैसला सुनाया गया, तो भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा पर हानिकारक प्रभाव पड़ेगा।
मणिपुर लगातार एक अशांत क्षेत्र बना हुआ है, क्योंकि वहां म्यांमार के विद्रोही गुट भी सक्रिय हैं। नगालैंड में एक नाजुक संघर्ष विराम है, क्योंकि शांति के लिए वार्ता जारी है। वार्ता का विरोध करने वाले विद्रोही गुट समय-समय पर सेना पर आक्रमण करते हैं। कश्मीर में सेना सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझ रही है। अफ्स्पा को हटाने या उसकी सुविधाओं पर सवाल उठाने से सेना के ऑपरेशन के तरीकों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और देशद्रोही तत्वों व उनके समर्थकों को सेना की क्रियाशीलता को प्रभावित करने का औजार मिल जाएगा। 'एक भारत' का विचार खुद सवालों में घिर जाएगा।
दुनिया के सभी देश अपने सुरक्षा बलों की रक्षा करना चाहते हैं, जब उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। वर्ष 1972 में ब्लैक संडे को ब्रिटेन में सेना द्वारा 28 बेगुनाह लोगों की हत्या की गई थी। लेकिन कई जांच किए जाने के बावजूद किसी सैनिक पर मुकदमा नहीं चलाया गया। सरकार ने आधिकारिक रूप से 2011 में उस घटना पर माफी मांगी। उसी सरकार ने आतंक या उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाले सैनिकों को मानवाधिकार उल्लंघन मामलों में सुरक्षा प्रदान की। अधिकांश देशों में, असाधारण मामलों को छोड़कर, कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले सशस्त्र बल के जवानों को कानून द्वारा संरक्षित किया जाता है।
विगत फरवरी में सशस्त्र बल के जवानों के बच्चे उन सैनिकों के मानवाधिकार की रक्षा करने की मांग के साथ मानवाधिकार आयोग पहुंचे, जिन्हें पत्थरबाजों द्वारा रोज निशाना बनाया जा रहा है। इस अपील का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों को भी संदेश देना था, जो लगातार भारतीय सेना की उसकी कार्रवाई के लिए आलोचना करते हैं। यह अपील तब की गई, जब सैन्यकर्मियों को भीड़ की हिंसा से खुद को बचाने के लिए आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व के आदेश पर उनके खिलाफ मुकदमा दायर किया गया।
एक राष्ट्र के रूप में भारत अब भी आंतरिक रूप से सुरक्षित नहीं है। यहां कई राष्ट्र-विरोधी ताकतें हैं, जो देश के ताने-बाने को तोड़ना चाहती हैं। जब भी इस तरह की स्थिति पैदा होती है, तब हालात सामान्य करने के लिए सेना को पहुंचना पड़ता है। सेना के अधिकारों और उनके कानूनी सुरक्षा कवचों की रक्षा करने से राष्ट्र की एकजुटता और आतंकवादी ताकतों के खिलाफ उनकी मजबूती सुनिश्चित होगी। इस दुविधा को अदालत को जरूर सुलझाना चाहिए।