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विरासत: देश में व्यवसाय की सूरत ही बदल दी, उद्योग के नफा-नुकसान से अटूट प्रतिबद्धता पर आंच नहीं

Fri, 11 Oct 2024 06:01 AM IST
निर्मल कांत रवि शर्मा, आईआईटी, नागपुर और उना, हिमाचल प्रदेश के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन
रवि शर्मा, आईआईटी, नागपुर और उना, हिमाचल प्रदेश के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 11 Oct 2024 06:01 AM IST
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सार
रतन टाटा के निर्णय दूरदर्शी और इस विश्वास पर आधारित होते थे कि भारतीय उद्यम वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
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Legacy ratan tata transformed business landscape in india
रतन टाटा - फोटो : x.com: @RNTata2000

विस्तार

दुनिया ने न केवल एक औद्योगिक दिग्गज को खो दिया है, बल्कि एक ऐसे नेता को भी खो दिया है, जिसकी विरासत व्यवसाय से परे थी। वह भारत के औद्योगिक चेहरे से कहीं बढ़कर एक उद्देश्यपूर्ण नेतृत्व का प्रतीक थे। टाटा समूह के शीर्ष पर रतन टाटा का कार्यकाल परिवर्तनकारी था। उन्होंने न केवल टाटा समूह का दुनिया भर में विस्तार किया, बल्कि कॉरपोरेट जिम्मेदारी के मूल तत्वों को पुनर्परिभाषित किया। उनका मानना था कि व्यवसायों को व्यापक भलाई के लिए होना चाहिए, और इसी ने उनके हर निर्णय को आकार दिया। उनके सबसे साहसिक कदमों में से एक था 2004 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को सार्वजनिक करना। इस निर्णय ने न केवल टाटा समूह में क्रांति ला दी, बल्कि वैश्विक प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारत की स्थिति को भी मजबूत किया। आज टीसीएस दुनिया की सबसे बड़ी आईटी सेवा कंपनियों में से एक है, जो रतन टाटा की दूरदर्शिता का प्रमाण है। आईपीओ मात्र एक वित्तीय कदम नहीं था, यह प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत का परिचायक था, जिसने देश को वैश्विक मानचित्र पर स्थान दिलाया।


शायद इससे भी ज्यादा साहसिक निर्णय टाटा का 2008 में जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर) का अधिग्रहण करने का था, जिसने वैश्विक ऑटोमोटिव उद्योग में हलचल मचा दी थी। कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या कोई भारतीय कंपनी ऐसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश ब्रांड का प्रबंधन कर सकती है। लेकिन रतन टाटा की दृष्टि केवल स्वामित्व तक सीमित नहीं थी; उन्होंने इन ब्रांडों को पुनर्जीवित करने और औद्योगिक विनिर्माण में एक वैश्विक खिलाड़ी के रूप में भारत की स्थिति को बढ़ाने का अवसर देखा। टाटा के नेतृत्व में जेएलआर ने अपनी पहुंच का विस्तार किया और वैश्विक स्तर पर सम्मान प्राप्त किया। यह अधिग्रहण केवल व्यावसायिक जीत नहीं थी-यह एक सांस्कृतिक क्षण था, जिसने विश्व मंच पर प्रतिस्पर्धा करने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया।


टाटा के नेतृत्व में एक और महत्वपूर्ण कदम 2007 में कोरस स्टील का अधिग्रहण था। इस सौदे, जो किसी भारतीय कंपनी द्वारा किया गया सबसे बड़ा अधिग्रहण था, ने टाटा स्टील को वैश्विक इस्पात उत्पादकों की शीर्ष श्रेणी में पहुंचा दिया। यह अधिग्रहण सिर्फ कारोबार को लेकर नहीं था; इसने वैश्विक स्तर पर भारतीय उद्यमों की क्षमता को प्रदर्शित किया। 

कोरस स्टील रतन टाटा के इस विश्वास को दर्शाता है कि भारतीय कंपनियां ईमानदारी और सम्मान के अपने मूल्यों को बनाए रखते हुए वैश्विक प्रभुत्व हासिल कर सकती हैं। लेकिन रतन टाटा की महत्वाकांक्षाएं केवल वैश्विक नहीं थीं। अपने देश के साथ उनका गहरा जुड़ाव उनकी सबसे साहसिक परियोजनाओं में से एक-टाटा नैनो, जिसे 2008 में लॉन्च किया गया था, में स्पष्ट दिखाई देता है। यह विचार सरल, लेकिन क्रांतिकारी था-दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाना और इसे लाखों भारतीयों के लिए सुलभ कराना। 

हालांकि नैनो को दीर्घकालिक व्यावसायिक सफलता नहीं मिली, लेकिन यह किफायती नवाचार और आम भारतीयों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने की रतन टाटा की इच्छा का प्रतीक बन गई। रतन टाटा का प्रभाव परोपकार के क्षेत्र में भी गहराई तक फैला हुआ था। उनके नेतृत्व में टाटा ट्रस्ट भारत में सबसे महत्वपूर्ण धर्मार्थ संगठनों में से एक बन गया, जिसने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ग्रामीण विकास और कई परियोजनाओं को वित्तपोषित किया। सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान ने लाखों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

अपनी महान उपलब्धियों के बावजूद रतन टाटा अपनी विनम्रता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने ऐसे सौदे किए, जिन्होंने भारतीय व्यवसाय की सूरत बदल दी। उनकी शांत, विनम्र नेतृत्व शैली ने उन्हें उस दौर में अलग पहचान दिलाई, जब ताकत अक्सर दिखावे के साथ आती थी। उन्होंने सिर्फ एक व्यावसायिक साम्राज्य ही खड़ा नहीं किया, बल्कि एक ऐसी विरासत का निर्माण किया, जो आने वाली पीढ़ियों को बरसों-बरस तक प्रेरित करती रहेगी। उनकी दयालुता, दूरदर्शिता और अटूट प्रतिबद्धता वर्षों तक भारतीय उद्यमियों का मार्गदर्शन करेगी।
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