{"_id":"fde0b0d6-5e66-11e2-b7d8-d4ae52bc57c2","slug":"leadership-crisis-in-congress-party","type":"story","status":"publish","title_hn":"नेतृत्व संकट से जूझती कांग्रेस","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
नेतृत्व संकट से जूझती कांग्रेस
नीरजा चौधरी
Updated Mon, 14 Jan 2013 09:55 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राष्ट्रीय राजधानी में दरिंदगी की बर्बर घटना के बाद जब दिल्ली की सड़कों पर युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा था, तब कइयों को यह सवाल मथ रहा था कि आखिर राहुल गांधी कहां हैं? लोग पूछ रहे थे कि कांग्रेस के सारे युवा सांसद और पार्टी के सारे नेता कहां चले गए? इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर जुटे नेताओं के समर्थन में वे लोग क्यों नहीं आ रहे हैं?
विज्ञापन
यह अलग बात है कि लोगों ने संदीप दीक्षित और उनकी मां मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को वहां जाने नहीं दिया। हम देख सकते हैं कि राजनीतिक वर्ग के प्रति लोगों का भरोसा किस तरह टूट चुका है। यदि वे लोगों के बीच जाते हैं, तो उनका विरोध होता है और नहीं जाने पर उनकी आलोचना की जाती है।
विज्ञापन
मुझे याद है कि 2009 में परिणामों की घोषणा से कुछ दिन पूर्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के कई नेताओं ने मेरे सामने दबी जुबान में स्वीकार किया था कि उनके अपने परिवार के युवाओं ने कांग्रेस को वोट दिया। इसके कारक स्पष्ट तौर पर राहुल गांधी थे, जो उन तीन चेहरों में शामिल थे, जिन्होंने कांग्रेस अभियान का नेतृत्व किया था।
विज्ञापन
बाकी दो चेहरे थे, उनकी मां सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। वर्ष 2012 में बेशक कांग्रेस कई संकटों से बच निकलने में सफल हो गई, लेकिन इस नए साल में भी पार्टी के 'गुम' होते नेतृत्व से संबंधित सवाल अनुत्तरित है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा, बल्कि राज्यों में भी पार्टी नेतृत्व-संकट से बुरी तरह गुजर रही है। क्या किसी को याद है कि बिहार में कांग्रेस का नेता कौन है?
उत्तर प्रदेश में भी पार्टी के पास कोई चेहरा नहीं था, जिसे वह मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर पाती। हालिया गुजरात चुनाव में भी नरेंद्र मोदी के कद का कोई उम्मीदवार खोजने के बजाय वह फिल्मी सितारों की रैलियों तक ही सिमटी रही। वहां ऐसा लगा, मानो मोदी राष्ट्रपति-सरीखा चुनाव लड़ रहे हों और कांग्रेस नगरपालिका चुनाव।
ऐसे दौर में, जब राज्य के क्षत्रप लगातार मजबूत होते दिख रहे हैं, क्षेत्रीय दलों के पास कद्दावर नेता हैं, भाजपा भी शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, वसुंधरा राजे, मनोहर पार्रिकर जैसे नेताओं में भविष्य खोज रही है, और आम चुनाव 'विधानसभा चुनावों के समग्र योग' के रूप में तब्दील हो रहा है, यदि कांग्रेस को एक स्पष्ट नेतृत्व मिलता है, तो यह काफी अलग होगा। पर मुश्किल यह है कि डॉ मनमोहन सिंह थके दिख रहे हैं।
अगर वह चुप रहते हैं, तो आलोचकों की निगाह पर चढ़ते हैं। और जब बोलते हैं (यहां तक कि अगर कोई बयान भी पढ़ते हैं), तो उनकी अधिकाधिक आलोचना होती है। दिल्ली की घटना के बाद आया उनका सामान्य बयान और फिर 'ठीक है' जैसे शब्दों का बना मजाक इसी ओर इशारा करता है। उनका प्रधानमंत्री का कार्यकाल अपने अस्त की ओर है और हर कोई जानता है कि अगले चुनाव में वह कांग्रेस का नेतृत्व नहीं करने जा रहे।
कांग्रेस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रचारित करती रही है। लेकिन कोई नहीं जानता कि राहुल की योजना आखिर है क्या? राहुल को अधिकृत रूप से पार्टी में नंबर 'दो' की कुर्सी दिए जाने संबंधी फेरबदल की भी खूब चर्चा होती है। कहा गया था कि गुजरात चुनाव के बाद कांग्रेस में फेरबदल होगा, लेकिन गुजरात चुनाव बीतने के बाद भी इस तरह की कोई घोषणा नहीं हुई है।
अब यह कहा जा रहा है कि जयपुर में 18 से 20 जनवरी तक होने वाले चिंतन-शिविर के बाद ऐसी घोषणा की जा सकती है। हालांकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता अब ऐसी किसी घोषणा की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि परोक्ष रूप से राहुल गांधी पार्टी में नंबर 'दो' की भूमिका में ही हैं और कोई भी कदम उनकी सहमति के बिना नहीं उठाया जा रहा। चूंकि 2014 के चुनावी अभियान में समन्वय समिति के मुखिया के रूप में वह नामित हैं, इसलिए यह पर्याप्त संकेत है कि चुनावों में वह कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं।
अब जबकि दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और आम चुनाव भी ज्यादा दूर नहीं है, ऐसे में संगठनात्मक फेरबदल का खास महत्व नहीं रहेगा। संगठन को अंदरुनी तौर पर जानने वाले लोग मानते हैं कि राहुल चुनावी अभियान समिति का नेतृत्व करेंगे मगर इसका यह मतलब नहीं है कि वह वाकई प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। अलबत्ता, वह उस भूमिका को स्वीकार करना ज्यादा पसंद करेंगे, जिसका निर्वहन उनकी मां कर रही हैं।
सियासी हलकों में ऐसी भी बातें हैं कि अगर कांग्रेस 2014 में बहुमत में आती है, तो वह एक नए 'मनमोहन सिंह' की तलाश करेगी। चूंकि प्रणब मुखर्जी अब रायसीना हिल्स पहुंच चुके हैं, इसलिए प्रधानमंत्री की दौड़ में वित्त मंत्री पी चिदंबरम सबसे आगे दिख रहे हैं। वह वक्त बीत गया, जब विश्वसनीय होने के कारण सोनिया गांधी द्वारा ए के एंटनी को ताज सौंपने, या फिर वफादारी और दलित होने का ईनाम सुशील कुमार शिंद को मिलने की बातें होती थीं, क्योंकि गृह मंत्री के रूप में शिंदे का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, जबकि एंटनी की उम्मीदवारी राहुल को नागवार लग सकती है।
हालांकि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पी चिदंबरम को पेश करने की शायद ही संभावना है। यदि नरेंद्र मोदी भाजपा के चुनावी अभियान की कमान संभालते हैं, तो कांग्रेस कई कारणों से आम चुनाव को मोदी बनाम राहुल की लड़ाई बनाने से बचना चाहेगी। निश्चय ही, तब पार्टी यह दावा करेगी कि वह सामूहिक रूप से चुनावी मैदान में उतरेगी।
संभव है कि 2014 से पहले सोनिया गांधी पार्टी में बदलाव चाहती हों और उम्मीद करती हों कि राहुल उनकी जगह लेंगे। लेकिन जो परिस्थितियां हैं, वह यही बताती हैं कि सोनिया पर और अधिक निर्भर रहने के अलावा कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं है।