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पाकिस्तान के लिए आखिरी मौका

Thu, 14 Jan 2016 06:49 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Thu, 14 Jan 2016 06:49 PM IST
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Last chance for Pakistan

पठानकोट एयरबेस को बचाने के दौरान कुर्बान हुए सातों भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को सबको सलाम करना चाहिए। दुनिया भर में हम देखते हैं कि बहादुर मर्द और औरतें अपने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करते हुए जान तक कुर्बान कर देते हैं। पाकिस्तान के लोग उन विधवाओं और बच्चों का दर्द समझते हैं, जिन्हें जीवन भर के लिए शोक में छोड़ दिया जाता है, और वे यह भी समझते हैं कि अपने मुल्क के लिए महज शर्मिंदगी का सबब बनने वाले आतंकवादियों के होने का कोई मतलब नहीं है। अलबत्ता पूरे मुल्क में यह सवाल पूछा जा रहा है कि पाकिस्तान को दहशतगर्दी और कट्टरपंथ से बचाने के लिए दो वर्ष पहले लागू नेशनल ऐक्शन प्लान के बावजूद छह आतंकवादी पड़ोसी मुल्क में इतना नुकसान पहुंचाने में कैसे सफल हो पाए?

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पठानकोट मामले की फिलहाल जांच जारी है, और ये आतंकवादी पाकिस्तान से गए थे, यह अभी तक साबित भी नहीं हुआ है। लेकिन पाकिस्तान के ताने-बाने (ढांचे) में फैले इस कैंसर को देखने और महसूस करने का यह माकूल वक्त है।
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हां, जब से पाकिस्तान के सैन्य एवं असैन्य नेतृत्व ने दहशतगर्दी और कट्टरपंथ को और बर्दाश्त न करने का फैसला किया, तब से मुल्क की आंतरिक सुरक्षा ज्यादा सुनिश्चित हुई है। लेकिन अचानक पठानकोट में हुआ हमला साबित करता है कि यही पर्याप्त नहीं था। हालांकि यह सवाल अब भी जांच का विषय है कि पंजाबी जेहादियों को अब भी खुलेआम घूमने की आजादी क्यों है? उत्तरी वजीरिस्तान में तो सैन्य कार्रवाई जटिल है, क्योंकि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से आतंकवादी पहाड़ों की गुफाओं में छिपने और लंबे तथा अनियंत्रित सरहद को पार कर अफगानिस्तान में घुसने में सक्षम हैं। लेकिन इन पंजाबी जेहादियों का ठिकाना सबको मालूम है। आप दक्षिण या मध्य पंजाब में किसी बच्चे से भी पूछिए, तो वह आपको उनके ठिकाने तक पहुंचा सकता है।
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आज अगर सिर्फ पठानकोट हमले के कारण पाकिस्तान जैश-ए मोहम्मद या लश्कर-ए तैयबा के खिलाफ कार्रवाई करना चाह रहा है, तो यही काफी नहीं है। उनके ढांचे को पूरी तरह से खत्म करना चाहिए, क्योंकि वे पाकिस्तान के लिए भी बड़ा खतरा हैं।

भारत और पाकिस्तान की समस्या जटिल है और उसके समाधान में समय लगेगा, लेकिन यदि पाकिस्तान एकाएक महज छह आतंकवादियों के कारण अपनी नीति में बदलाव करता है, तब सवाल तो उठेंगे ही। सिर्फ पठानकोट हमले की वजह से नहीं, पाकिस्तान को खुद अपनी सुरक्षा के लिए भी इन आतंकी गुटों का पूरी तरह से सफाया करना चाहिए।

पाकिस्तान आज बदल गया है और यहां के लोगों की भावनाएं भी बदली हैं। दहशतगर्दों और कट्टरपंथियों को खत्म करने के मामले में दिखावा करना या कोई कदम न उठाना अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकेगा। क्या पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान यह नहीं जानता कि जब भी भारत के साथ दोतरफा रिश्तों को सुधारने की कोशिश की जाती है, तब सत्ता के भीतर या बाहर के तत्व उसे खत्म करने के लिए भारत पर हमले को अंजाम देते हैं? जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाहौर आए, तब बड़े पैमाने पर सद्भावना का माहौल कायम हुआ, जिस कारण आम पाकिस्तानी भी अपनी सरकार से कहने लगे कि वे भी जब चाहें, भारत जाना चाहते हैं। तो क्या पाकिस्तान सरकार को अपनी सभी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और किसी भी तरह की शरारत को रोकने के लिए अतिरिक्त सतर्कता नहीं बरतनी चाहिए थी? जो कट्टरपंथी आज मुल्क की विदेश नीति को प्रभावित कर सकते हैं, वे कल आसानी से मुल्क को पंगु भी बना सकते हैं और मुल्क के अन्य कामकाज को भी अपने हाथों में ले सकते हैं। क्या सरकार ऐसी स्थिति आने तक इंतजार करती रहेगी?

पाकिस्तान सरकार को यह भी समझना चाहिए कि ये जेहादी न केवल हथियार चलाने की ट्रेनिंग की वजह से, बल्कि गोला बारूद का भारी जखीरा रखने की वजह से भी खतरनाक हैं। अगर उन्हें बेअसर करने की कोशिश की जाएगी, तो उसके जवाब में भी हिंसा होगी। ऐसे शैतानों को पालने का खामियाजा पाकिस्तान को भुगतना होगा। ये वही जेहादी हैं, जिन्होंने शिया समुदाय के सैकड़ों लोगों को मारा और विकलांग बनाया। नतीजतन शिया या तो भाग गए या दहशत में जी रहे हैं। एक अन्य मुद्दे पर भी गौर फरमाने की जरूरत है। दुनिया भर में जहां भी दहशतगर्दी के मामले होते हैं, वहां के हाशिये के लोगों पर इसका बेहद असर पड़ता है। उनमें से ज्यादातर वे बेकुसूर लोग होते हैं, जो एकाएक हमले की जद में आ जाते हैं। फिर भी उनके बारे में कोई नहीं बोलता, जैसे उनकी जान की कोई कीमत न हो। अगर मारे गए लोग सैनिक होते हैं, तो उनकी विधवाओं और बच्चों को थोड़ी-बहुत मदद मिल जाती है। लेकिन जैसा कि हम पाकिस्तान में देखते हैं, दहशतगर्दी की घटनाओं में ज्यादातर आम लोग मारे जाते हैं, जिन्हें आर्थिक मदद मिलना बहुत जटिल होता है और कभी-कभी तो उन्हें कुछ भी नहीं मिलता।


दुनिया भर में दहशतगर्दी के बढ़ते दौर में जरूरी है कि इसे खत्म करने के लिए क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर सहयोग किया जाए। पाकिस्तान में हमें इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी और साफ संदेश देना होगा कि बस, बहुत हो चुका। इस धरती पर आतंकवाद को अब और पनपने नहीं दिया जाएगा। पठानकोट हमले ने पाकिस्तान के असैन्य व सैन्य नेतृत्व को एक आखिरी मौका दिया है कि वे इन जेहादियों पर लगाम लगाएं, क्योंकि पाकिस्तान में पनपे दहशतगर्दों के प्रति न आम पाकिस्तानी में अब धीरज बचा है, न बाकी दुनिया में।

- लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं

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