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वैवाहिक जीवन में प्यार के लिए संत कबीर दास का मंत्र
बाबा तुलसीदास
Updated Tue, 03 Feb 2015 08:32 AM IST
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संत कबीर रोज सत्संग किया करते थे। दूर-दूर से लोग उन्हें सुनने आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने के बाद भी एक आदमी बैठा रहा। कबीर ने इसका कारण पूछा, तो वह बोला, मुझे आपसे कुछ पूछना है। मैं गृहस्थ हूं। घर में सभी लोगों से मेरा झगड़ा होता रहता है। आखिर इसकी वजह क्या है और यह कैसे दूर हो सकता है?
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कबीर थोड़ी देर चुप रहे, फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, दीपक जलाकर लाओ। हालांकि उस समय भरी दोपहरी थी, फिर भी कबीर की पत्नी दीपक जलाकर ले आईं। वह आदमी भौंचक देखता रहा। वह सोचने लगा कि दोपहर में कबीर ने दीपक क्यों मंगवाया? थोड़ी देर बाद कबीर ने फिर पत्नी को पुकारा और बैठे-बैठे ही बोले, कुछ मीठा दे जाना। इस बार उनकी पत्नी मीठे के बजाय नमकीन देकर चली गईं।
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उस आदमी ने सोचा कि यह तो अलबेला घर है। यहां मीठा के बदले नमकीन दिया जा रहा है, और दिन में दीपक जला रहे हैं। वह बोला, कबीर साहब, मैं चलता हूं। कबीर ने पूछा, आपको अपनी समस्या का समाधान मिला या संशय अब भी बाकी है? वह बोला, मेरी समझ में कुछ नहीं आया।
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कबीर ने उसे समझाते हुए कहा, जैसे मैंने भरी दोपहरी में दीपक मंगाया, तो मेरी पत्नी कह सकती थी कि तुम क्या सठिया गए हो। भला दोपहर में दीपक की क्या जरूरत? लेकिन नहीं, उसने सोचा कि जरूर किसी काम के लिए दीपक मंगाया होगा। इसके बाद मैंने मीठा मंगवाया, तो वह नमकीन देकर चली गई। हो सकता है कि घर में कोई मीठी वस्तु न हो- यह सोचकर मैं चुप रहा। इसमें तकरार क्या? आपसी विश्वास बढ़ाने और तकरार में न फंसने से विषम परिस्थिति अपने आप दूर हो गई।