लालू ने सुनी वक्त की पुकार
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बिहार में महागठबंधन में मुख्यमंत्री पद के लिए बतौर प्रत्याशी नीतीश कुमार का समर्थन कर नीतीश के साथ लालू प्रसाद यादव भी हीरो बनकर उभरे हैं। लालू अब तक नीतीश का विरोध कर रहे थे, मगर यह भी सच है कि ऐसा हुए बगैर इस गठबंधन की संभावनाएं धूमिल ही रहतीं। ऐसे में, बिहार की लड़ाई अब 'कांटे की टक्कर' में तब्दील होती दिख रही है। हालांकि लालू के लिए यह फैसला करना कतई आसान नहीं था। दोनों नेताओं के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है। पिछले पच्चीस वर्षों से दोनों एक-दूसरे का विरोध ही करते आए हैं। जैसा कि लालू खुद कह रहे हैं कि भाजपा से टक्कर लेने के लिए उन्हें 'विष' पीना पड़ रहा है।
लालू मंजे हुए नेता हैं। वह अच्छे-से समझ गए थे कि नीतीश को समर्थन न देकर वह अलग-थलग पड़ सकते हैं। मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर कांग्रेस पहले ही नीतीश कुमार के नाम पर मुहर का संकेत दे चुकी है। फिर, सोनिया गांधी का लालू से मुलाकात से इन्कार बताता है कि वह पार्टी की नीति में कोई बदलाव करने नहीं वालीं। इसके अलावा नीतीश से अलगाव के कारण उनका एमवाई (मुस्लिम-यादव) आधार भी खिसक जाता। ऐसा होने पर यह बिल्कुल मुमकिन था, कि मुसलमानों के वोट बंट जाते और यादवों का एक धड़ा अपनी सरकार बनने की कोई संभावना न देखने पर भाजपा की ओर पलट जाता, जैसा कि लोकसभा चुनाव के दौरान हुआ था।
लोकसभा चुनाव के बाद होने वाले तमाम चुनाव, इसके गवाह रहे हैं कि लालू को सीटें बेशक कितनी ही मिली हों, मगर उनका वोट प्रतिशत 20 फीसदी के नीचे नहीं गया। यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी, जबकि उन्हें महज चार सीटें मिली थीं, उनका वोट प्रतिशत 21 फीसदी के आसपास रहा। इन हालात में लालू ने कड़वा घूंट पीने का और अपनी लड़ाई को आगे के लिए मुल्तवी करने का फैसला किया। फिलहाल तय है कि वह नीतीश कुमार की जद (यू) से ज्यादा सीटें पाने की भरसक कोशिश करेंगे। फिर यह देखना भी दिलचस्प होगा कि चुनाव के बाद कैसे हालत पैदा होंगे, जिनमें वह अपने राजनीतिक चातुर्य का प्रदर्शन कर सकें।
वैसे, जिस बात ने लालू के लिए फैसला लेना आसान बनाया उसका उल्लेख वह पहले ही कर चुके हैं। वह कह चुके हैं कि न तो वह, न उनके परिवार का और न उनकी पार्टी का कोई सदस्य अभी मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने की स्थिति में है। राबड़ी देवी को स्वीकार कर पाना मुश्किल है और बच्चों की न तो वह उम्र है, न तजुर्बा कि वे इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल सकें, हालांकि इन सभी को टिकट दिलवाने की लालू पूरी कोशिश करेंगे। परिवार के अलावा किसी दूसरे शख्स को पार्टी की जिम्मेदारी लालू नहीं सौंपने वाले। यही देखते हुए पप्पू यादव उनसे अलग हो गए, और अब वह खुद अपनी पार्टी के गठन को तैयार हैं। पूरी संभावना है कि जीतन राम मांझी की तरह उनकी पार्टी भी भाजपा के साथ गठजोड़ कर ले।
गौरतलब है कि लालू यादव पहले शख्स थे, जिन्होंने 2014 के चुनावी नतीजों के तुरंत बाद नीतीश कुमार के साथ 'संघर्ष विराम' की पहल की। उस वक्त आलम यह था कि लालू को चार, उनकी गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को दो और खुद नीतीश कुमार को दो सीटें ही मिल पाई थीं। बिहार में मोदी की ऐसी लहर चली थी, जिसमें एनडीए को 31 सीटें मिल गईं। लालू और नीतीश कुमार, दोनों के लिए संदेश स्पष्ट था। जहां एनडीए को 38.8 फीसदी वोट मिले, वहीं लालू, नीतीश और कांग्रेस को कुल मिलाकर 45.6 फीसदी वोट मिले थे। संदेश साफ था, एक हो जाओ या फिर खत्म हो जाओ।
लोकसभा चुनाव के कुछ हफ्तों बाद हुए दस विधानसभा उपचुनावों में यह संदेश ज्यादा साफ तौर पर सामने आया। लालू और नीतीश ने मिलकर छह सीटें जीतकर भाजपा को चक्कर में डाल दिया। लोकसभा चुनाव के बाद हालत बेशक दोनों की खराब थी, मगर नीतीश एक ऐसा ब्रांड जरूर हैं, जो अपने प्रशासन और बेहतर कानून-व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं। लोकसभा चुनाव में मोदी को वोट देने वालों में यह कहने वालों की बड़ी तादाद थी, कि विधानसभा चुनाव में वे नीतीश को वोट देंगे। इसके अलावा यह भी तय था कि अगर नीतीश को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी न घोषित किया जाता, तो संभावित समर्थकों के बीच संदेह का माहौल फैलने लगता। खासकर यह देखते हुए कि जनता परिवार के गठन की औपचारिक घोषणा किए जाने के बाद भी इसके नेताओं के बीच इतने विवाद पैदा हुए। नीतीश के समर्थकों को डर था कि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के तौर पर लालू किसी और का नाम सामने ला सकते हैं। इससे लालू के शासन के 15 साल पुरानी स्थिति में राज्य के पहुंचने का खतरा बना हुआ था, जिसे लोग अब तक भूल नहीं पाए हैं।
राहुल गांधी की पहले की अकेले चलने की नीति से उलट क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन करने की इच्छा जताकर कांग्रेस ने बेहतर रणनीति अपनाई है। वह एक बार फिर से बिहार में खुद को खड़ा करना चाहती है। दूसरी ओर नीतीश कुमार के कड़े विरोधी रहे लालू प्रसाद के जातिभाई 'यादव' हैं, जो सत्ता को नजदीक देखकर, अब उनका पहले जैसा विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्हें इस महागठबंधन में लालू की ताकत का अंदाजा है। पर यह ध्यान रखना होगा कि अगर इस गठबंधन में गंभीरता नहीं दिखी, तो यह भाजपा के लिए फायदेमंद होगा।
जाहिर है कि बिहार के इस चुनाव में काफी कुछ दांव पर लगा है। यदि भाजपा जीतती है, तो यह न सिर्फ मोदी के जादू पर फिर से मुहर होगी, बल्कि इससे भाजपा को अपने विधायी एजेंडे को जारी रखने के लिए राज्यसभा में जरूरी आंकड़े जुटाने में भी मदद मिलेगी। दूसरी ओर भाजपा की हार पार्टी की गिरावट को दर्शाएगी। यदि नीतीश-लालू-कांग्रेस मिलकर बिहार में भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं, तो इसका असर 2017 में उत्तर प्रदेश के चुनाव पर भी दिखेगा।