ये जो लड्डू बांट रहे हैं

यश्‍ावंत व्यास Updated Fri, 14 Sep 2012 12:32 PM IST
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वे चांदनी चौक में खड़े-खड़े लड्डू बांट रहे थे। सिर से पैर तक बम-बम! कई बच्चों के हाथों से बस्ते छीन कर उनकी पीठ पर मिठाई के डिब्बे लादने को तत्पर। लाल किले के रास्ते पर भरपूर नजर डालकर अपने घर की तरफ ताकने में मगन। हाथों में लड्डू, आंखों में लाल किला, जुबान पर जय-जय! मैंने पूछा, ये दूसरों की जेब से नोट निकाल कर अपनी सिगरेट जलाने वाले आज दोनों हाथों से लड्डू कैसे बांट रहे हैं?

लड्डू खाने वाले एक सज्जन ने कहा, 'बढ़िया हैं, कराची-लाहौर के दिनों की याद दिला दी। हमें इससे क्या मतलब कि ये लड्डू क्यों बांट रहे हैं?' भीड़ में काफी लोग थे, जो मुफ्त के लड्डू के लिए जयकारा भी लगाते थे और कुछ ऐसे भी थे, जो दोनों हाथ में लड्डू लेकर निकल जाते थे। कुछ ऐसे थे, जो लड्डू बांटने वाले के गले लगाना चाहते थे। कुछ ऐसे थे, जो बार-बार एक बैनर उठाते थे, जिस पर उस हलवाई का नाम लिखा था जिसने लड्डू प्रायोजित किए थे।

ऐसे ही एक बैनर पकड़ने वाले को मैंने इशारे से बुलाया और इन्टरव्यू के बहाने कोने में ले गया। 'ये इतने प्रसन्न क्यों हैं? क्या किसी केस में छूट गए?' 'केस में तो ये छूटते ही रहते हैं। आज तक कोई केस इन पर नहीं टिका। आज इनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण केस खुला है। उन्होंने ईमान के गांव में बेईमानी के न्याय के अधिकार का झंडा बुलंद किया है।'

'क्या मतलब? क्या यह और बड़ी बेईमानी नहीं है?' 'ईमानदारी और बेईमानी भले ही दो अलग-अलग चीजें हों। लेकिन आप ईमानदारी से बताइए, मुकाबला हो तो सभी नियम और शर्तें समान होना चाहिए कि नहीं? न्याय का अधिकार सभी को है। या तो ईमानदारी मैदान से हट जाए या बेईमानी से मुकाबले के लिए बेईमानी के स्तर पर आकर लड़े। आप ऐसा नहीं कर सकते कि बेईमानी को खत्म भी कर दें और ईमानदारी को भी बचा लें।'

'आपकी बात समझ में नहीं आ रही है। आखिरकार बेईमानी तो खत्म होना ही चाहिए। ईमानदारी को बचना ही चाहिए। दोनों खत्म और दोनों जीवित कैसे रह सकती हैं?' 'यही तो आप नहीं जानते।' उसने जेब से कुछ तस्वीरें निकालीं। एक नेता, एक स्वामी और तीन चार अद्भुत सौंदर्यशाली चेहरे, जो हर समस्या के वक्त 'हमें तो पता था' के अंदाज में टीवी पर दर्शन देते रहते थे, उसके हाथ में थे। 'आपको याद है मुंबई, बाटला हाउस, भट्टा-पारसौल?'
'मुझे तो रायबरेली-अमेठी में कांग्रेस की गति भी याद है।'

'पर आप नहीं जानते कि इन्हें पहले से पता था कि पब्लिक को न कॉमनवेल्‍थ का भ्रष्टाचार याद रहना चाहिए, न टूजी का घोटाला, न आदर्श सोसाइटी याद रखने की जरूरत है, न महंगाई, न किसानों की आत्महत्याएं। पब्लिक को सिर्फ यह याद रहना चाहिए कि तंत्र रहेगा, तो पब्लिक रहेगी। अगर देश को बचाना है, तो तंत्र को बचाओ। तंत्र को बचाना हो, तो तंत्र चलाने वालों को बचाओ। आज हम सब आनंदित हैं। जो एक आंख वालों के दरबार पर मनमाना कह सकते थे, उन दो आंख वालों पर न्याय का सिद्धांत कायम होने जा रहा है। उनकी एक आंख खत्म करके चीजें बराबर की जा सकती हैं, यह उम्मीद दिख रही है। देश को इस घड़ी में तबियत से लड्डू खाना चाहिए।'

उन्होंने फिर से प्रायोजक का बैनर उठाया और देश की खातिर चौक पर लग गए। अब लड्डू बांटने वाले संत उनके कंधों पर चढ़कर भाषण दे रहे थे। वे ऐसे पुलकित होकर बोल रहे थे, जैसे विरोधी की श्रद्धांजलि सभा में अपने भविष्य का सैद्धांतिक आनंद बिखेर रहे हों। उन्होंने जनपथ का नाम लिया। उन्होंने राजपथ का नाम लिया। उन्होंने लड्डू उछालकर चांदनी चौक की अखंड सत्ता का नारा बुलंद किया। अंततः उन्होंने कारों और सरकारों के अंतर्संबंध पर सांगीतिक नारे उछालते हुए इंडिया गेट की मोमबत्तियों पर जोरदार लतीफा सुनाया।

पूरी भीड़ हंसी पर दो लोग नहीं हंसे। वे भी पब्लिक में से ही आते थे। एक संसद के इलाके में चाय बेचता था। दूसरा एक महीने से एम्स में इलाज के लिए मां को उठाए-उठाए घूम रहा था। पब्लिक चुनाव में वोट देती है, तो देश बनता है। पब्लिक लड्डू खाती है, तो जयघोष होता है। फिर ये दोनों कौन हैं, जिन्हें लड्डू के प्रायोजक का नाम तक पता नहीं और लड्डू वालों के लतीफों पर हंसना भी नहीं आता?

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