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खाद्य सुरक्षा की छतरी में छेद

Mon, 18 Mar 2013 07:54 AM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 18 Mar 2013 07:54 AM IST
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lacuna in food safety bill

वर्ष 2013-14 के बजट में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने खाद्य सुरक्षा विधेयक के क्रियान्वयन के लिए शुरुआती राशि के तौर पर 10 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इससे साफ होता है कि सरकार इस विधेयक को पारित कराने की तैयारी कर रही है।

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ऐसा होने पर आगामी वित्त वर्ष में खाद्य सुरक्षा के लिए इस समय आवंटित 80 हजार करोड़ रुपये की धनराशि बढ़कर 1.20 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच सकती है।
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यदि खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित होकर कानून बन जाता है, तो यह मनरेगा की तरह यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल का सबसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम होगा।

चूंकि देश में विभिन्न कारणों से करोड़ों लोगों के लिए दो वक्त का भोजन जुटाना कठिन होता जा रहा है, अतः खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम में लोगों की भूख मिटाने का प्रयास होगा।
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इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल रिलेशन का कहना है कि देश में खाद्यान्न की उत्पादकता घटने, ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून की वर्षा कम होने, बायो डीजल के लिए खाद्यान्न का उपयोग होने और मोटे अनाज के इस्तेमाल को बढ़ावा न मिलने के कारण भूख का अभिशाप बढ़ता हुआ दिखाई दे सकता है।

उल्लेखनीय है कि अब भी सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये गरीबी रेखा से नीचे रह रहे देश के 6.52 करोड़ परिवारों को और गरीबी रेखा से ऊपर रह रहे आठ करोड़ परिवारों को रियायती दरों पर खाद्यान्न की आपूर्ति कर रही है।

अब प्रस्तावित विधेयक के नए प्रारूप के मुताबिक, खाद्य सुरक्षा की छतरी में आने वाले हर व्यक्ति को तीन रुपये प्रति किलो चावल, दो रुपये प्रति किलो गेहूं और एक रुपया प्रति किलो मोटा अनाज-इस तरह कुल पांच किलो अनाज प्रतिमाह उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया गया है।

इस विधेयक में ग्रामीण क्षेत्र की 75 फीसदी और शहरी क्षेत्र की 50 फीसदी आबादी को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

खाद्य सुरक्षा के लिए जिस सार्वजनिक वितरण प्रणाली को माध्यम बनाना तय किया गया है, उसके तहत कारगर वितरण व्यवस्था के बारे में कई चिंताएं हैं।

गौरतलब है कि 1951 में जब खाद्यान्न की भारी कमी हुई थी और सरकार को भारी मात्रा में विदेशों से अनाज आयात करना पड़ा था, तब उसने रियायती मूल्यों पर जरूरतमंदों तक खाद्यान्न पहुंचाने के उद्देश्य से पीडीएस की शुरुआत की थी।

इसके पीछे सरकार की एक मंशा जमाखोरों-कालाबाजारियों को नियंत्रित करने की भी रही है। यह दुखद है कि जरूरतमंद तक खाद्यान्न पहुंचाने की यह योजना अब तक भ्रष्टाचार में लिप्त होकर निराशाजनक बनी हुई है।

सर्वेक्षण बताते हैं कि भ्रष्ट अधिकारियों, बेईमान दुकानदारों, धोखेबाज ट्रांसपोर्टरों और लालची दलालों के बीच एक मजबूत गठजोड़ के कारण यह व्यवस्था मृतप्राय हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से पीडीएस की खामियों की जांच के लिए न्यायमूर्ति डीपी वाधवा की अध्यक्षता में गठित एक सदस्यीय आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस व्यवस्था के तहत राशन सामग्री के बाजार में कदम-कदम पर खामियां हैं।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा कराई गई जांच में यह बात सामने आई है कि 40 फीसदी जरूरतमंदों को राशन कार्ड नहीं दिया जाता और राशन कार्ड पाने वालों में 90 फीसदी को खाद्य सामग्री नियमित रूप से नहीं मिलती।

नेशनल सैंपल सर्वे द्वारा जारी एक रिपोर्ट भी कहती है कि सरकार की पीडीएस व्यवस्था में भारी भ्रष्टाचार है। राशन में मिलने वाला 60 फीसदी गेहूं और 20 फीसद चावल गरीबों तक पहुंच ही नहीं पाता। यह स्थिति तब है, जब सिर्फ 35 करोड़ लोगों को पीडीएस के तहत सस्ता अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है।

पर जब सरकार खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने के बाद देश की आबादी के करीब 67 फीसदी यानी 80 करोड़ से अधिक लोगों को सस्ता अनाज इस प्रणाली के जरिये उपलब्ध कराएगी, तो खाद्य सब्सिडी का दुरुपयोग बढ़कर दोगुने से अधिक हो जाने की आशंका रहेगी।

ऐसे में, पीडीएस में आमूलचूल परिवर्तन की कवायद शुरू होनी चाहिए। पीडीएस में व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या से मुक्ति के लिए केंद्र प्राथमिकता के आधार पर कंप्यूटरीकरण करे और सभी राज्यों के लिए एक समान सॉफ्टवेयर विकसित किया जाए।

खासकर आदिवासी बहुल और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में यह प्रणाली अधिक सुदृढ़ बनाई जानी चाहिए। इसके अलावा खाद्यान्न उत्पादकता बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा।

अगर सरकार खाद्यान्न आयात के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में जाती है, तो फिर वैश्विक कीमतों पर खाद्यान्न खरीदना होगा, जिससे लागत बढ़ना तय है। खाद्य सुरक्षा की वर्तमान जरूरतों की दृष्टि से वर्तमान खाद्यान्न भंडार पर्याप्त है, लेकिन भविष्य में खाद्यान्न की बढ़ती जरूरतों के लिए रणनीतिक प्रयास जरूरी हैं।

पीडीएस व्यवस्था को सुधारने से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यूनिक आइडेंटिफिकेशन (यूआईडी) के इस्तेमाल संबंधी सुझाव भी महत्वपूर्ण है। सरकार को चाहिए कि वह खाद्य सब्सिडी को संबंधित लाभार्थी के बैंक खाते में हस्तांतरित करने की डगर पर भी तेजी से आगे बढ़े।


खाद्य सुरक्षा कानून को असरकारी बनाने के लिए यह भी जरूरी होगा कि सार्वजनिक सेवाओं को समयबद्ध तरीके से उपलब्ध कराने संबंधी जवाबदेही विधेयक, 2011 को संसद द्वारा शीघ्र पारित किया जाए और पीडीएस व्यवस्था से जुड़े हुए ऐसे सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए दंड का प्रावधान हो, जिनकी लापरवाही के कारण भूखे लोगों तक खाद्यान्न नहीं पहुंच पाता।

कारगर खाद्य सुरक्षा कानून ही भूखे पेट लोगों को मुस्कराहट देने वाले उपयोगी कानून के रूप में रेखांकित हो सकेगा।

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