लाल लकीर: बस्तर की एक प्रेम कथा
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किताब- लाल लकीर
लेखक- ह्रदयेश जोशी
प्रकाशक- हार्पर कालिन
डेढ़ दशक पहले छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद दो चीजें हुईं। पहला, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस राज्य में निवेश और नए संयंत्रों की स्थापना को लेकर गतिविधियां तेज हुईं और दूसरा इसी के साथ माओवादी हिंसा में भी बढ़ोतरी हुई।
माओवादी या नक्सली इतिहास की सबसे हिंसक घटनाएं छत्तीसगढ़ में इसी दौरान घटित हुई हैं। इसके साथ ही दो और चीजें हुईं, पहला यह कि इस राज्य में पुलिस और सुरक्षा बलों का जमावड़ा बढ़ा और पत्रकारों के साथ ही बुद्धिजीवियों की बस्तर में आवाजाही बढ़ने लगी। इसी दौर में बस्तर पर अनेक किताबें भी आईं, जिनमें फिक्शन और नॉन फिक्शन दोनों तरह की किताबें हैं। टीवी पत्रकार ह्रदयेश जोशी का उपन्यास लाल लकीर इसी की अगली कड़ी है।
आदिवासी लड़की भीमे और आदिवासी युवक रामदेव की प्रेमकथा पर केंद्रित यह उपन्यास 1998 से लेकर 2013 की अवधि को समेटे हुए है, जिसमें कहानी के दृश्य फिल्म के दृश्यों की तरह तेजी से बदलते जाते हैं। यह कहानी नक्सलियों की एक जन अदालत से शुरू होती है, जिसमें भीमे के शिक्षक और गांधीवादी पिता को कथित तौर पर पुलिस की मुखबिरी करने के आरोप में मार दिया जाता है। उस वक्त भीमे अपने प्रेमी के साथ जंगल में होती है और सुनहरे सपने बुन रही होती है। इसके बाद उसकी जिंदगी बदल जाती है और वह शिक्षिका बन जाती है।
इसके साथ ही वह लोगों को जागरूक करने लगती है और यहीं से असली कहानी शुरू होती है। उसे और उसके प्रेमी को नक्सली पुलिस का मुखबिर समझते हैं, तो पुलिस उन्हें नक्सली समझती है! बस्तर में यह खतरनाक स्थिति है, जिससे लाखों आदिवासियों को गुजरना पड़ता है। यही लाल लकीर है, जैसा कि भीमे का एक संवाद है, 'इस लाल लकीर के पीछे रहे तो पुलिस की हिंसा और अगर इस लाल लकीर को पार किया तो क्रांतिकारियों की हिंसा। हम इस लकीर के गुलाम हैं।'
उपन्यास का बड़ा हिस्सा सलवा जुड़ूम के नाम पर गांवों में सशस्त्र अभियान छेड़ने और नक्सलियों के साथ उनके टकराव से जुड़ा हुआ है। इसी बीच, पुलिस की शह पर सलवा जुड़ूम के लोग भीमे और उसके साथियों को सलवा जुड़ूम शिविर में अगवा कर लेते हैं, जहां उसके साथ बलात्कार किया जाता है। नाटकीय तरीके से नक्सली उस शिविर में हमला कर उसे छुड़ा ले जाते हैं। इसके बावजूद भीमे नक्सलियों के साथ जाने के बजाय सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से ही काम करना चाहती है। इस बीच, निजी कंपनी के संयंत्र के लिए जमीन अधिग्रहण का काम शुरू होता है, जिसका वह विरोध करती है। उसकी गिरफ्तारी भी होती है और फिर वह राजनीति में उतरने का फैसला करती है। अंतत: ये कहानी एक दुखद अंत की ओर बढ़ती है।
किताब के कवर पर फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया की टिप्पणी छपी है कि यह कहानी किसी एक्शन मूवी की तरह आंखों के सामने दौड़ती है। वास्तव में बस्तर जिस संघर्ष से गुजर रहा है, यह उपन्यास उसके क्रैश कोर्स की तरह है। ह्रदयेश ने स्थानीयता का प्रभाव लाने के लिए कहीं कहीं गोंडी और तेलुगू भाषा का भी प्रयोग किया है। इसी तरह गादारीस, जगरगुंडा, बासागुड़ा, डोंगरपाल और चिट्टापाड़ा जैसे अनेक गांवों के नाम भी आते जाते हैं।
इसके पात्र बस्तर के कुछ किरदारों से मिलते-जुलते से भी लगते हैं। खासकर इसकी नायिका में पिछला लोकसभा चुनाव लड़ चुकीं सोनी सोरी की झलक मिलती है, जिसे नक्सली और पुलिस दोनों तरह की ज्यादतियां झेलनी पड़ी है। मगर नक्सलियों और माओवादियों की गोलियों के बीच बस्तर का एक लोकरंग और लोक चरित्र भी है, जो इसमें नजर नहीं आता। इसकी तेजी उपन्यास को रोचक बनाती है, तो यही इसकी एक कमजोरी भी है, क्योंकि बस्तर का जीवन दरअसल इतना तेज है नहीं। दरअसल बस्तर तीन घंटे की फिल्म नहीं है। एशिया की सबसे उम्दा लोहे की खदान और हजारों करोड़ रुपये की वनोपज देने वाले घने जंगलों से समृद्ध बस्तर एक लंबे संघर्ष का नाम है।