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तानाशाह से टकराने वाली कुलसुम

Fri, 14 Sep 2018 07:03 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Fri, 14 Sep 2018 07:03 PM IST
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Kulasoom, who fight against dictator
कुलसुम नवाज

वर्ष 2000 से एक तस्वीर सोशल मीडिया में घूम रही है और फिर से अखबारों में छपी है। तस्वीर में दिखता है कि अट्ठारह साल पहले बेगम कुलसुम नवाज शरीफ एक टोयोटा कार में बैठी हुई हैं और एक क्रेन से उस कार को उठाया जा रहा है, क्योंकि कुलसुम बीबी ने बाहर निकलने से इन्कार कर दिया है और खुद को अंदर बंद कर लिया है। यह तस्वीर राजनीति में कोई अनुभव न रखने वाली एक पंजाबी गृहिणी का सैन्य तानाशाह के खिलाफ प्रतिरोध का चेहरा है। सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने पुलिस को आदेश दिया कि कुलसुम के मॉडल टाउन वाले घर के चारों तरफ पुलिस का घेरा डाल दिया जाए, लेकिन वह एक कार में वहां से भाग गईं, नतीजतन दस घंटे तक उनकी कार का पीछा किया गया, जब तक कि उनकी कार रुकी नहीं।


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इस घटना को 18 साल से ज्यादा समय हो गए हैं। वह परवेज मुशर्रफ के खिलाफ एक रैली का नेतृत्व करने वाली थीं, इसलिए एक दिन पहले ही उनके घर के चारों तरफ घेरा डाला गया था, लेकिन वह पुलिस को चकमा देकर कार में निकल भागी थीं। कुलसुम बीबी तब पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) के एक नए चेहरे और नेता के रूप में उभरी थीं और हर कोई कह रहा था कि पीएमएल में वही एक 'मर्द' हैं। यह एक क्रूर याद है कि कैसे सैन्य तानाशाह एक निहत्थी महिला से भी डर महसूस करते हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को सलाखों के पीछे डाल दिया था और कुलसुम बीबी, जो महज एक गृहिणी थीं, एक सैन्य तानाशाह से लड़ने चौखट से बाहर निकल पड़ी थीं।
 
वह गले के कैंसर से पीड़ित थीं और इसी कारण पिछले हफ्ते लंदन के अस्पताल में उनका देहांत हो गया। बेगम कुलसुम का जन्म 1950 में लाहौर के एक प्रमुख कश्मीरी परिवार में हुआ था और उनकी शादी 47 वर्ष पहले नवाज शरीफ के साथ हुई थी। एक डॉक्टर की बेटी और प्रतिष्ठित पहलवान रुस्तम-ए जमन गामा पहलवान की नातिन कुलसुम ने पंजाब विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री हासिल की। मुल्क की प्रथम महिला के होने के नाते भी शायद ही कभी उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कुछ कहा हो। और उन्होंने तब तक राजनीति से परहेज किया, जब तक कि उन्हें अपने परिवार की रक्षा के लिए सामने नहीं आना पड़ा। वर्ष 1999 का पाकिस्तानी तख्तापलट एक रक्तहीन तख्तापलट था, जिसमें पाकिस्तानी सेना और तत्कालीन चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ तथा जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने जनता द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर 12 अक्तूबर, 1999 को सत्ता पर कब्जा कर लिया। सत्ता पर कब्जा करने के दो दिन बाद 14 अक्तूबर, 1999 को जनरल मुशर्रफ ने एक अस्थायी सांविधानिक आदेश जारी कर पाकिस्तान के संविधान को निलंबित कर दिया।

राजनीति में विभिन्न मौकों पर पाकिस्तानी महिलाओं के उदय का एक इतिहास है, जिसकी शुरुआत फातिमा जिन्ना से होती है, जो जिन्ना की बहन और आजीवन सहयोगी थीं। अपने भाई की मौत के बाद उन्हें भी अपने घर की दहलीज से बाहर निकलकर एक दूसरे सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान का सामना करना पड़ा था। और उन्होंने 1965 के राष्ट्रपति चुनाव में उनका सामना करने का साहस दिखाया था। जब अयूब ने दावा किया कि वह बुनियादी लोकतंत्र को विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्होंने जवाब देते हुए कहा था, 'किस तरह का लोकतंत्र? एक व्यक्ति का लोकतंत्र? पचास लोगों का लोकतंत्र?' जब अयूब ने कहा कि उनके हार जाने के बाद मुल्क में अराजकता आ जाएगी, तो उन्होंने पलटवार किया था, 'आप दबाव, ताकत और डंडे के बल पर देश में स्थिरता नहीं ला सकते।' यह दिखाता है कि पाकिस्तान की महिला राजनीतिज्ञों ने किस तरह से सैन्य तानाशाहों का सामना किया और अपनी सुरक्षा और जीवन की परवाह नहीं की।
 
बाद में बीती सदी के सत्तर के दशक में एक और पाकिस्तानी महिला ने घर की दहलीज लांघी, जब उनके शौहर को मार्शल लॉ तानाशाह ने जेल में डाल दिया था। जनरल जिया उल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो को जेल में डाल दिया था और बाद में उन्हें फांसी दे दी। ऐसे में बेगम नुसरत भुट्टो अपने घर की दहलीज से बाहर निकलीं और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया। एक बार लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में उनके सिर पर पत्थर फेंका गया। बेगम भुट्टो के सिर से बहते खून को कैमरों ने कैद कर लिया। उसी तानाशाह के खिलाफ बेनजीर भुट्टो ने भी घर से निकलकर संघर्ष किया और वर्षों तक लोकतंत्र की लड़ाई लड़ती रहीं। दुखद है कि जब दूसरे तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ सत्ता में थे और जिसने उन्हें पाकिस्तान न लौटने के लिए कहा था, रावलपिंडी में बेनजीर की उस स्थान पर हत्या कर दी गई, जो मुशर्रफ के आधिकारिक आवास से दूर नहीं था।
 
मरियम और उनके पिता नवाज शरीफ को बेगम कुलसुम के दफन में शामिल होने के लिए शनिवार तक पैरोल पर छोड़ दिया गया है।
 
एक अफसोस, जो नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को हमेशा रहेगा कि अंतिम समय में वे बेगम कुलसुम नवाज के पास नहीं रह सके, जब लंदन के अस्पताल में करीब दो महीने जीवन रक्षक उपकरण पर रहने के बाद उनकी अस्थायी चेतना वापस लौटी थी। मरियम ने नवाज शरीफ के एक करीबी सहयोगी को बताया, 'मेरे पिता और मुझे इस बात का गहरा अफसोस है कि जब पिछले महीने मेरी मां की चेतना लौटी थी, तो हम उनके पास नहीं थे। इतना ही नहीं, जेल के प्रतिबंधों के कारण मेरे पिता को सप्ताह में एक बार सीमित समय के लिए उनसे टेलीफोन पर बातचीत करने की इजाजत मिलती थी। एक बार उन्होंने कहा था कि मैं क्यों उनके पास नहीं आती या स्काइप के जरिये उनसे बातचीत क्यों नहीं करती, ताकि वह चेहरा देख सकें। मेरी मां क्या सोच रही होंगी... कि वे (नवाज और मरियम) राजनीति में इतने व्यस्त हो गए कि उनके लिए उनके पास वक्त ही नहीं है। शायद यह अफसोस जिंदगी भर मेरा पीछा करता रहेगा।' बेगम कुलसुम कभी जान नहीं पाईं कि उनका शौहर और बेटी जेल में हैं। 

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