{"_id":"5f5bfdd2026b683b0c17e890","slug":"know-how-acharya-vinoba-bhave-was-a-first-freedom-fighter","type":"story","status":"publish","title_hn":"आजादी के पहले सत्याग्रही थे आचार्य विनोबा भावे","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
आजादी के पहले सत्याग्रही थे आचार्य विनोबा भावे
Sat, 12 Sep 2020 04:14 AM IST
Amit Mandal
अनिल त्रिवेदी
अनिल त्रिवेदी
Published by: Amit Mandal
Updated Sat, 12 Sep 2020 04:14 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
vinoba bhave
आचार्य विनोबा भावे को, 11 सितंबर को जिनकी 125 वीं जयंती थी, महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन का 'पहला’ और ‘पूर्ण सत्याग्रही’ माना था। आध्यात्मिक वृत्ति के विनोबा युवावस्था में हिमालय में जाने की सोच रहे थे। पर गांधी की ऊर्जामयी वैचारिक प्रेरणा और सान्निध्य से उनके सामने सर्वोदय की साधना का पथ हमेशा के लिए स्पष्ट हो गया। आजादी के आंदोलन का सत्याग्रही स्वरूप और आजादी के बाद भूदान के प्रणेता, उनके ये दोनों रूप एक ही हैं।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
वह एक ऐसी विभूति के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने सत्य, प्रेम और करुणा को आधार मानकर समूची मनुष्यता को अपनी वैचारिक ऊर्जा के योग से शांत और सेवामय जीवन जीने की राह दिखाई। विनोबा के अध्ययन की गहराई पढ़े-लिखे लोगों के साथ-साथ निरक्षरों के दिल-दिमाग में भी स्वतःस्फूर्त रूप से बैठ जाती थी। उन्होंने सहज-सरल भाषा शैली में गीताई ग्रंथ की रचना की, ताकि गांवों की निरक्षर महिलाएं भी गीता जैसे जीवन के भाष्य को आसानी से समझ सकें। सच्चा और सरल विद्वान ही लोक समाज को उसकी भाषा में जीवन का मर्म और अर्थ समझा सकता है। विनोबा ने अपने जीवन से यह सिखाया कि जीवन का अर्थ लोगों के साथ एक रूप हो जाना है।
आजादी के बाद विनोबा ने निरंतर चौदह वर्ष तक पदयात्रा की। देश के हर हिस्से और पड़ोस के देशों में भी वह पैदल ही घूमे। विनोबा की पदयात्रा यानी हर दिन नई जमीन और हर दिन नए आसमान तले जीने का प्रत्यक्ष अनुभव। हर दिन नए-नए लोगों के साथ सहजीवन। सुबह चार बजे लालटेन लेकर विनोबा की पदयात्रा टोली नए पड़ाव की ओर निकल पड़ती थी। हमारे देश में पदयात्रा लोक-संपर्क और अध्ययन का बहुत पुराना तरीका है। आदि शंकराचार्य ने पैदल भ्रमण कर ही भारत की आत्मा और प्रज्ञा को आत्मसात किया था। दुनिया के सारे धर्मों का गहन अध्ययन कर प्रत्येक धर्म का सार लिख देना मनुष्यता को विनोबा की साकार देन है। उन्होंने सारे धर्मों के समन्वयक की भूमिका निभाई।
उनका कहना था कि हम बच्चों को जो कहानियां कहते हैं, वे एक ही धर्म की न होकर अनेक धर्म की होनी चाहए। बच्चे हिंदू,
मुसलमान या ईसाई नहीं होते, वे परमात्मा के बच्चे होते हैं। उन्होंने ‘जय जगत’ कहा, यानी मनुष्य का समग्र चिंतन जागतिक और समूचा कृतित्व स्थानीय होगा, तो यह जीवन का मूल आधार बनेगा। गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को विनोबा ने 'सबै भूमि गोपाल की' के जरिये समझाया। जीवन जीने की शिक्षा के बारे में समझाते हुए विनोबा जी ने कहा था, अर्जुन के सामने प्रत्यक्ष कर्तव्य करते हुए सवाल पैदा हुआ था। उसका उत्तर देने के लए भगवद्गीता निर्मित हुई। इसी का नाम शिक्षा है। बच्चे को खेत में काम करने दो। वहां कोई सवाल पैदा हो, तो उसका उत्तर देने के लिए सृष्टि शास्त्र अथवा पदार्थ-विज्ञान या दूसरी जिस चीज की जरूरत हो, उसका ज्ञान दो। यह सच्चा शिक्षण होगा। बच्चों को रसोई बनाने दो। उसमें जहां जरूरत हो, रसायन शास्त्र सिखाओ। असली बात यह है कि उन्हें जीवन जीने दो।
'शिक्षक' नाम के किसी स्वतंत्र धंधे की जरूरत नहीं है, न विद्यार्थी नाम के मनुष्य-कोटि से बाहर के किसी प्राणी की। 'क्या करते हो' पूछने पर, 'पढ़ता हूं' या 'पढ़ाता हूं' जैसे जवाब की जरूरत नहीं है। 'खेती करता हूं' अथवा 'बुनता हूं', ऐसा उत्तर जीवन के भीतर से आना चाहिए। विनोबा ने बार-बार अध्ययन के विषय में चिंता प्रगट की। अध्ययन अगर क्रांति का वाहक और विचारों का परिचायक न हो, तो कैसे चलेगा? कार्य का अपना महत्व है, लेकिन कार्यकर्ता के लिए ज्ञान का महत्व उससे भी अधिक है। विचार की छानबीन तो होनी ही चाहिए। विविध विचारों का अध्ययन भी विचार-सफाई के लिए जरूरी है।
विनोबा कहा करते थे कि शरीर में जो स्थान सांस का है, समाज में वही स्थान विश्वास का है, लेकिन यह सारा सेवाकार्य, विचार-प्रचार आदि किसलिए? इस सारे सेवायोग को विनोबा ने भक्ति-मार्ग ही माना है। अर्थात इस सेवायोग द्वारा चित्तशुद्धि प्राप्त कर आत्म-साक्षात्कार कर लेना है-ऐसी विनोबा की विराट दृष्टि है। विनोबा ने सेवा कार्य और आध्यात्मिक साधना को कभी अलग-अलग नहीं माना।
(सप्रेस)