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शहरी भारत में कृषि संकट की दस्तक

Thu, 06 Dec 2018 06:43 PM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Thu, 06 Dec 2018 06:43 PM IST
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Knock of agricultural crisis in urban India
पत्रलेखा चटर्जी

पिछले हफ्ते राजधानी दिल्ली में देश भर से आए हजारों किसानों ने रामलीला मैदान में रैली की और फिर संसद की ओर मार्च किया था। दो दिन के इस किसान मुक्ति मार्च का आयोजन ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी ने किया था, जिसमें दो सौ से अधिक छोटे-बड़े किसान संगठन शामिल हैं। राजधानी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पहुंचे किसानों ने कृषि क्षेत्र के बढ़ते संकट पर चर्चा के लिए संसद का 21 दिन का विशेष सत्र बुलाने की मांग की।


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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित विपक्षी दलों के तमाम नेताओं ने किसानों के साथ एकजुटता दिखाई और उन्हें संबोधित किया। इससे थोड़े दिन पहले ही किसानों ने मुंबई में भी रैली निकाली थी। लेकिन क्या सत्ता में बैठे लोग किसानों की आवाज सुन रहे हैं? इसके साथ ही इतना ही महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या शहरी भारत को किसानों की फिक्र है, जोकि अपने भोजन के लिए उन पर निर्भर है?

मैं यह समझने के लिए रामलीला मैदान गई थी कि आखिर इतने सारे किसानों ने राजधानी में दस्तक क्यों दी? उनके जीवन से जुड़े असली मुद्दे क्या हैं? वहां मुझे बेहद कष्टप्रद कहानियां सुनने मिलीं। ये सब कहानियां मानो एक सूत्र से बंधी हुई हैं और वह यह कि किसान गहरे कर्ज में फंसे हुए हैं; बहुत से किसानों की जमीन ढांचागत परियोजनाओं की भेंट चढ़ गईं और उन्हें इसके एवज में पर्याप्त मुआवजे भी नहीं मिले। उन्हें अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिलता। इस बीच, खाद और कीटनाशक के दाम बढ़ने से लागत बढ़ती जा रही है। उनका कहना था कि जलवायु परिवर्तन के कारण उन्हें और अधिक  कीटनाशकों की जरूरत है। वहां बिजनौर के गंज दारानगर से आई मुन्नी ने अपनी दुखभरी कहानी बयान की। वह एक विधवा है। नहर के निर्माण में उसकी जमीन भेंट चढ़ गई। वह पूछती है, बड़े प्रोजेक्ट के लिए जिन लोगों की जमीन गई, उन्हें अधिक पैसा मिलता है। मुझ गरीब को उसी दर से पैसा क्यों नहीं मिलना चाहिए? उसके साथ वहां मौजूद किसानों में से एक मुल्कराज ने कहा, हम चाहते हैं कि हमारी आवाज सुनी जाए। जब सरकार हमारी आवाज नहीं सुन रही है, तो भगवान राम कैसे सुनेंगे?

तेलंगाना से आए महिलाओं के एक समूह में सभी विधवाएं ही थीं। उन सबके पतियों ने कर्ज से परेशान होकर खुदकुशी कर ली थी और अब वे अपनी ही जमीन पर खेतिहर मजदूर हो गई हैं, क्योंकि पति की मौत के बाद जमीन का मालिकाना हक उन्हें न मिलकर उनके ससुर को स्थानांतरित कर दिया गया।
 
भारत गहरे कृषि संकट से जूझ रहा है, यह कोई छिपा रहस्य नहीं है। लेकिन लगता है कि भारत के शहरी मध्य वर्ग के बहुत कम लोगों को इसकी फिक्र है। जबकि कृषि संकट की मार अंततः हम सब पर पड़ेगी। कृषि उत्पादों की पैदावार बढ़ने के बावजूद छोटे और मझोले किसानों की आय सिमटती जा रही है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उल्लेखनीय तरीके से वृद्धि करने के बावजूद लोगों को ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल रहा है। जबकि कृषि क्षेत्र रोजगार का सबसे बड़ा जरिया है, जो रोजगार पैदा करने की अपनी क्षमता खोता जा रहा है। खेती छोड़कर जीवनयापन के लिए दूसरे तरीके अपनाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। मांग के अनुरूप रोजगार सृजन करने की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की क्षमता नकारात्मक दिशा में है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र के गैर खेतिहर क्षेत्र उन लोगों को रोजगार देने में सक्षम नहीं हैं, जो लोग खेती छोड़ रहे हैं। कृषि क्षेत्र के इस संकट के कारण जल्द ही शहरी भारत पर भी दबाव पड़ेगा। इसका हम सबको मिलकर मुकाबला करना होगा। 

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