कश्मीरियत तो बस एक मुखौटा थी : केंद्र सरकार के फैसले से लद्दाख बच गया

अग्निशेखर, कवि और पनून कश्मीर के संयोजक Published by: Avdhesh Kumar Updated Tue, 06 Aug 2019 12:32 AM IST
जम्मू-कश्मीर से अलग हुआ लद्दाख
जम्मू-कश्मीर से अलग हुआ लद्दाख - फोटो : अमर उजाला
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भारत के राजनीतिक इतिहास में यह एक युगांतरकारी फैसला है। अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम वर्चस्ववाद का स्रोत था, जो अब ढह गया है। धर्मनिरपेक्ष भारत में अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को एक मुस्लिम राज्य में तब्दील कर दिया था। केंद्र सरकार के इस साहसी फैसले से कश्मीरियत की राजनीति का मुखौटा उतर गया है। इससे मुस्लिम संप्रदायवादी, अलगाववादी वर्चस्व खत्म हो गया है। 
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अनुच्छेद 370  भारत-विरोधी था। इसीलिए तो घाटी में आतंकवाद पनपा। इसी कारण तो हिंदू पंडितों को घाटी से बाहर निकाला गया। अगर कश्मीरियत सचमुच सांस्कृतिक बहुलता और सहिष्णुता का पर्याय थी, तो लाखों कश्मीरी पंडितों को धर्म के नाम पर घाटी से निकाल क्यों दिया गया? घाटी से पंडितों को निकाल बाहर करने को विस्थापन कहा जाता है। लेकिन वह विस्थापन नहीं था। विस्थापन तो लोग सामान्यतः आर्थिक कारणों से करते हैं। वह तो निष्कासन था। 


आज कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी कह रही हैं कि अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला मुस्लिम धार्मिक पहचान या अस्तित्व को चोट पहुंचाना है। यह वही सांप्रदायिक सोच है, जिसके कारण कश्मीर पूरा भारत नहीं बन पाया। केंद्र सरकार के फैसले से लद्दाख बच गया। श्रीनगर की नीतियों के कारण लद्दाख पिछले सत्तर साल से उपेक्षित था। बल्कि अब तो रोहिंग्या शरणार्थियों को वहां बसा दिए जाने के कारण आतंकवाद के मामले भी सामने आने लगे थे।  

राज्य सरकार ने सुनियोजित तरीके से रोहिंग्या शरणार्थियों को लद्दाख में न केवल बसाया, बल्कि उन्हें संरक्षण भी दिया। एक तरफ कश्मीर से हिंदू पंडितों को बाहर करना, दूसरी ओर लद्दाख में रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण और संरक्षण देना-इसे आप क्या कहेंगे? इस फैसले को मैं जम्मू-कश्मीर का पुनर्जन्म मानता हूं, क्योंकि 1947 में जब यह भारत का हिस्सा बना था, तब हमारे हिस्से में डर और संशय था। हमारा संविधान अलग था, झंडा अलग था। 

अनुच्छेद 370 के हटने से व्यापक बदलाव होने की उम्मीद है। जहां तक पाक प्रायोजित आतंकवाद के जारी रहने की् बात है, तो मेरा मानना यह है कि कश्मीर के मुसलमान अब इस्लाम के नाम पर आतंकवाद को प्रश्रय देना बंद करेंगे। वे अब सोचेंगे कि धर्म के नाम पर आतंकवाद का समर्थन करके उन्होंने बेकार ही तीस साल बर्बाद कर दिए। वे समझेंगे कि भारत की ताकत के आगे आतंकवाद और उसके शरणदाता पाकिस्तान की कोई हैसियत नहीं है। आने वाले दिनों में घाटी में भारत के पक्ष में नारे लगेंगे, जुलूस निकलेंगे। 

मुझे याद है, जनता पार्टी की सरकार के समय तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब कश्मीर आए थे, तो मुस्लिमों ने जय हिंद के नारे लगाए थे। मैं उम्मीद करता हूं कि कश्मीर फिर उस सुनहरे दौर में लौट जाएगा। जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे के हटने से कश्मीरी पंडित, जम्मू के डोगरे और लद्दाख के लोग खुश हैं, क्योंकि दीवार टूट चुकी है। पनून कश्मीर के बैनर तले हमने तीन दशक तक जो संघर्ष किया, उसका परिणाम सामने है। 

हमारी मांग ही यह थी कि जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन होना चाहिए और इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाना चाहिए। जहां तक 73,000 निर्वासित पंडितों का प्रश्न है, तो घाटी में बसाए जाने का संघर्ष जारी रहेगा, क्योंकि केंद्र सरकार के इस फैसले में हमारे विस्थापन की फिलहाल कोई योजना नहीं है, जबकि हम कश्मीर घाटी के भीतर बसना चाहते हैं।
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