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दोतरफा तनावों के बीच करतारपुर से द्विपक्षीय संबंध बेहतर होने की आस

Fri, 13 Sep 2019 03:09 AM IST
मरिआना बाबर मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Published by: मरिआना बाबर Updated Fri, 13 Sep 2019 03:09 AM IST
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Kartarpur amidst two-way tensions
करतारपुर गुरुद्वारा - फोटो : a

यह संचार, सोशल मीडिया और जागरूकता का युग है, जहां एक ट्वीट आपको बताता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाश्ते में क्या खाया। करतारपुर कॉरिडोर हमेशा से पाकिस्तान में था, लेकिन श्रद्धालुओं को छोड़कर बहुत कम लोग इसके अस्तित्व के बारे में जानते थे। आज पाकिस्तान के बच्चों की जुबान पर भी इसका नाम है और यहां के आम लोग आगामी नवंबर का इंतजार कर रहे हैं, जब हजारों सिख तीर्थयात्रा पर पाकिस्तान आएंगे।


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पाकिस्तान स्थित ज्यादातर गुरुद्वारों और हिंदू मंदिरों का जीर्णोद्धार होने वाला है, जो श्रद्धालुओं को आकर्षित करेगा। प्रधानमंत्री इमरान खान कहते हैं, 'यह कोई एहसान नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य था।' वह पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने कहा है कि 'मैं मानता हूं कि करतारपुर और ननकाना साहिब सिखों के लिए उतने ही पवित्र हैं, जितने कि मुसलमानों के लिए मक्का और मदीना। उन्होंने वादा किया कि जहां तक संभव हो सकेगा, मैं वहां तक सिख तीर्थयात्रियों की पहुंच आसान बनाऊंगा।

इसलिए लाहौर में पाकिस्तान की पहली सिख प्रदर्शनी देखना दिलचस्प था, जहां अब विभिन्न कारक सरकार और समाज को अल्पसंख्यकों के प्रति ज्यादा जागरूक बना रहे हैं और उन्हें अलग-अलग तरीकों से सुविधा प्रदान कर रहे हैं। गुरु नानक देव जी के सम्मान में सिख प्रदर्शनी का आयोजन लाहौर संग्रहालय में किया गया था, जो दुनिया भर के सिखों के आकर्षण का केंद्र बन गया। प्रदर्शनी में श्रद्धालुओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण वस्तु पालकी है, जिसे सिख संगत (गुरुद्वारा प्रबंधक) ने लाहौर संग्रहालय को दान दिया है। संग्रहालय के पदाधिकारियों ने सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ को, जिसे गुरु ग्रंथ साहिब कहा जाता है, गैलरी के बीच में पालकी पर प्रदर्शित किया है। सिख धर्म दुनिया का पांचवां सबसे संगठित धर्म है। प्रदर्शनी में सिख धर्म की महानता के चित्र, सिक्के, शॉल, फर्नीचर, हथियारों और वेशभूषा को भी प्रदर्शित किया गया है।

पंजाब के अलावा बलूचिस्तान और सिंध में भी दिलचस्प घटनाएं हो रही हैं। बलूचिस्तान के लासबेला जिले में मकरान तट पर बसे शहर हिंग्लाई में एक हिंदू मंदिर या हिंग्लाई माता या नानी मंदिर को लेकर बहुत सारी गतिविधियां और मीडिया रिपोर्ट हैं। मंदिर में मौजूद महाराज गोपाल कहते हैं कि हिंग्लाज यात्रा हिंदुओं के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी मुसलमानों के लिए हज यात्रा।

इस मंदिर में बहुत से गैर हिंदू भी इसकी प्रसिद्धि और अच्छी देखभाल से प्रभावित होकर आते हैं, क्योंकि यह हिंगोल नदी के तट पर एक पहाड़ी गुफा में राष्ट्रीय पार्क के भीतर स्थित है। हिंदू धर्म की बहुत-सी बातें पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं, जिनमें से एक कथा यह है कि देवी सती ने खुद को यज्ञ में जीवित जला दिया था, जिससे भगवान शिव नाराज हो गए। उन्होंने सती की देह अपने कंधे पर उठाई और तांडव नृत्य करने लगे। इसने स्वर्ग के सभी देवताओं को भयभीत कर दिया, क्योंकि इससे प्रलय हो सकता था। फिर देवताओं ने भगवान विष्णु से अपना चक्र चलाने के लिए कहा, जिसने सती के शरीर को 51 खंडों में विभक्त कर दिया। सती के शरीर के अंग भारत, श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश समेत पूरे भारतीय उप- महाद्वीप में बिखर गए। कहा जाता है कि सती का सिर हिंग्लाज में गिरा था, इसलिए यह मंदिर इतना महत्वपूर्ण है।

एक स्थानीय पत्रकार गुलाम यासीन बाजिंजो के अनुसार, 'हर साल अप्रैल के महीने में अनेक हिंदू तीर्थयात्री, जिनमें अधिकतर भीतरी सिंध, मकरान तट, लासबेला और कलात के होते हैं, हिंग्लाज मंदिर की तीर्थयात्रा करते हैं और अपने धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।'  पाकिस्तान की आबादी में दो प्रतिशत हिंदू हैं। कुछ वर्ष पहले भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री और भाजपा नेता जसवंत सिंह भी हिंगोल आए थे और उन्होंने नानी मंदिर की तीर्थयात्रा की थी।

लासबेला के डिप्टी कमिश्नर शब्बीर अहमद मेंगल कहते हैं कि मंदिर का भ्रमण करने के लिए अधिक से अधिक हिंदुओं को प्रोत्साहित करने के लिए यहां एक रिसॉर्ट बनाने और सुविधाएं प्रदान करने की योजना है। धार्मिक पर्यटन का मतलब दुनिया भर के, खासकर भारत के हिंदुओं और सिखों को वीजा देना है। लेकिन यहीं पर समस्या है।  निकट में सिख और हिंदू भारत में ही रहते हैं और इन दोनों देशों के नागरिकों के लिए एक-दूसरे देश का वीजा प्राप्त करना लगभग असंभव है। खासकर इन दिनों, जब दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है। करतारपुर कॉरिडोर से आने वाले सिख यात्री भाग्यशाली होंगे, जो बिना वीजा के पाकिस्तान में दाखिल होंगे।

हैरानी की बात है कि भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संबंध बद से बदतर होते चले गए, लेकिन एक सवाल सबकी जुबान पर है कि क्या ऐसे में करतारपुर कॉरिडोर परियोजना बच पाएगी? जब ये दोनों देश राजनीतिक इच्छाशक्ति और थोड़े व्यावहारिक ज्ञान का प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो दूसरों की तुलना में बेहतर करते हैं।

बालाकोट प्रकरण के बाद कश्मीर मसले पर सांविधानिक संशोधन के बाद दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्ते में ठहराव आ गया और व्यापारिक संबंध भी खत्म कर दिया गया। इन सबके बावजूद दोनों देशों के राजनयिक और विशेषज्ञ मिले और अब वे करतारपुर कॉरिडोर पर समझौते के मसौदे को अंतिम रूप दे रहे हैं। दो बिंदुओं पर सहमति बाकी है और मुझे लगता है कि भारत आखिरकार उन पर सहमत हो जाएगा। पहला है, करतारपुर गुरुद्वारे में आने वाले यात्रियों से लिया जाने वाला शुल्क, क्योंकि उन्हें मुफ्त भोजन के साथ शीर्ष स्तरीय सुविधाएं दी जाएंगी। चूंकि उनसे कोई वीजा शुल्क नहीं लिया जा रहा है, इसलिए उनसे एकत्र किए गए धन का उपयोग गुरुद्वारे के रख-रखाव के लिए किया जाएगा। सिख बहुत दिलेर होते हैं और मुझे यकीन है कि वे मान जाएंगे।

दूसरा यह है कि पाकिस्तान नहीं चाहता कि यात्रियों के साथ भारतीय अधिकारी और राजनयिक हों, क्योंकि यह एक धार्मिक यात्रा है, राजनीतिक नहीं। दुनिया भर के तीर्थस्थलों में भी यात्रियों को ही स्थानीय सुरक्षा प्रदान की जाती है,  किसी दूसरे देश के अधिकारियों को साथ जाने की अनुमति नहीं दी जाती।

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