क्या कर्नाटक दिखाएगा 2019 की राह
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मई, 2018 में आने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद सबकी निगाहें अगले लोकसभा चुनाव पर टिक जाएंगी। उस नतीजे से निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति तय होगी कि 2019 में भाजपा आएगी या कांग्रेस। कर्नाटक की चुनावी लड़ाई बेहद कठिन है, क्योंकि यह लड़ाई मुख्यतः दो धड़ों के बीच है। और जो भी पार्टी विधानसभा चुनाव में जीतेगी, उसकी जीत का अंतर बहुत कम रहेगा। कर्नाटक के नतीजे के नजरिये से अगर आप 2019 तक के घटनाक्रम को देखेंगे, तो तीन मजबूत परिदृश्य उभरते हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव असली लड़ाई है। भाजपा लोकसभा चुनाव के लिए तैयार है, पर विपक्ष अभी तैयार नहीं है। तीसरे मोर्चे को जांच-परख लिया गया है और वह विफल रहा है, क्योंकि यह मुल्क मिली-जुली सरकार से तंग आ चुका है।
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ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री पद पर दावा करने का हक है और इसी तरह चंद्रबाबू नायडू को भी। पर यह निश्चित है कि कोई भी क्षेत्रीय पार्टी भाजपा या नरेंद्र मोदी को चुनौती नहीं देने वाली है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 17 से 21 अप्रैल तक पुणे में एक गुप्त सम्मेलन का आयोजन कर रहा है, जिसमें इस पर विचार किया जाएगा कि 2019 में भाजपा कैसे लोकसभा चुनाव जीत सकती है और संघ उसमें क्या योगदान करेगा। कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की सुनवाई को रुकवाने के लिए कई बाधाएं खड़ी कर सकती है। वह माकपा की मदद से प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भी ला सकती है। कपिल सिब्बल तो खुलेआम घोषणा कर रहे हैं कि राम मंदिर का फैसला 2019 के बाद सुनाया जा सकता है, समाज के एक वर्ग के तुष्टीकरण की विपक्ष की इस नीति से खास तौर पर उत्तर भारत में भाजपा पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
नरेंद्र मोदी आश्चर्यचकित करने के लिए जाने जाते हैं। वह 2018 के मध्य में बड़ी रणनीति बना सकते हैं, ताकि मतदाताओं को भाजपा की तरफ आकर्षित किया जा सके। जाहिर है, भाजपा कांग्रेस के लिए 2019 की चुनावी लड़ाई को आसान नहीं छोड़ेगी, क्योंकि मोदी 'कांग्रेस मुक्त भारत' के लिए कुछ भी कर सकते हैं। एक बात याद रखनी चाहिए। 2004 की वाजपेयी वाली भाजपा अलग थी और नरेंद्र मोदी की भाजपा अलग है, जिसे ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता।
सवाल यह है कि 2019 की जंग के प्रमुख खिलाड़ी कौन-कौन हैं। राहुल गांधी 2019 को गंभीरता से क्यों नहीं ले रहे हैं? क्या वह 2024 पर ध्यन केंद्रित करना चाहते हैं? उस समय तक कांग्रेस के बूढ़े लोग राजनीति से बाहर हो जाएंगे। सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, जतिन प्रसाद आदि अशोक गहलौत, सुशील कुमार शिंदे और जनार्दन द्विवेदी का स्थान ले लेंगे। इसी तरह उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, बिहार में तेजस्वी यादव, तमिलनाडु में एम के स्टालिन भी। क्या भाजपा को हटाने के लिए राहुल को और समय चाहिए?
लेकिन 2024 तक अरविंद केजरीवाल और चिराग पासवान जैसे नेता कांग्रेस को चुनौती देने के लिए उभरेंगे। 2019 राहुल गांधी के लिए आसान नहीं है। सोनिया गांधी अब भी यूपीए को नियंत्रित क्यों कर रही हैं? इसका साफ मतलब है कि सोनिया गांधी को अब भी मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी और लालू प्रसाद पर संदेह है कि वे राहुल का साथ देंगे। चंद्रबाबू नायडू राहुल गांधी के साथ ताल्लुक नहीं रखना चाहेंगे। ममता ने भी राहुल से मुलाकात नहीं की। वह सोचती हैं कि वह वरिष्ठ हैं और राहुल को शिष्टाचारवश उनसे मिलना चाहिए। फूलपुर और गोरखपुर के नतीजे के दिन न तो अखिलेश यादव को मायावती के साथ फोटो खिंचवाने का अवसर मिला और न ही ममता को राहुल के साथ। क्या इससे कुछ और भनक नहीं लग रही है?
अब बात भाजपा की करते हैं। भाजपा को झटका लगा है। और अगर भाजपा का जनाधार इसी तरह घटता चला गया, तो यह चिंता की बात है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने निश्चित रूप से बिजली, इन्फ्रॉस्ट्रक्चर और सड़क क्षेत्र में काफी काम किया है, जिसकी यूपीए ने अनदेखी की थी। लेकिन आर्थिक और मौद्रिक क्षेत्र में यह फिसल गई। गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव में भाजपा की हार और समाजवादी पार्टी की जीत का यह मतलब नहीं है कि 2019 में भाजपा को खारिज किया जा सकता है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों को समय से पहले उतावला नहीं होना चाहिए। 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में विपक्ष बंटा हुआ है।
कर्नाटक से ज्यादा हिंदी भाषी क्षेत्र-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में राजनीतिक बदलाव काफी महत्वपूर्ण हैं। निश्चित रूप से इन क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ ढीली पड़ रही है। लेकिन इसका फायदा क्षेत्रीय दलों को होगा, न कि कांग्रेस को। अचानक जनेऊ पहनकर मंदिरों की यात्रा करने की राहुल की राजनीतिक शैली को लोगों ने नकार दिया है। राहुल गांधी ने जिस तरह की राजनीति की शुरुआत गुजरात में की थी, उसी को कर्नाटक में जारी रखा है। इसने अल्पसंख्यकों को निराश किया है और वे दोहरी राजनीति के कारण कांग्रेस से बाहर विकल्प तलाशने के लिए मजबूर हैं।
मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने एक के बाद एक त्रिपुरा तक विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की है। लेकिन मोदी का जादू आखिर कब तक चलेगा? साथ ही कांग्रेस को भी अभी ऊपर उठना बाकी है। क्या कांग्रेस के राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि 2019 में भी दहाई का आंकड़ा पार नहीं करेगी? यह 60 से 70 सीटें जीत सकती है। जाहिर है, लाभ में मायावती, अखिलेश, चंद्रबाबू नायडू जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप होंगे।
कुल मिलाकर 2019 का परिदृश्य शीशे की तरह साफ है। या तो मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनेगी या किसी अन्य के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनेगी या कांग्रेस के समर्थन से तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी। इसके लिए राहुल गांधी को ममता बनर्जी, अखिलेश और मायावती के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे। क्या राहुल झुकेंगे? कर्नाटक की नजर से देखें, तो 2019 की राष्ट्रीय तस्वीर ऐसी ही दिखती है।