कलिकाल की चुनाव लीला
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रामलीला तो अपने इस धार्मिक देश में होती ही रहती है। लेकिन महाभारत सिर्फ एक ही मौसम में दिखाई देता है-चुनाव के मौसम में। इसे तटस्थ होकर सिर्फ दो लोग ही देख सकते हैं-एक संजय और दूसरे कृष्ण। कुछ लोगों ने संजय को द्वापर युग का दूरदर्शी पत्रकार माना था। वह नारद जी से चाल, चरित्र और चिंतन में कुछ अलग थे। एक तो उन्होंने दोनों पक्षों में लगाई-बुझाई कर आग ज्यादा भड़काई नहीं, दूसरे निजी स्वार्थ को उन्होंने खबरों से अलग रखा। कल्पना कीजिए कि उस जमाने में पेड मीडिया होता, तो क्या होता? रावण और दुर्योधन के पक्ष में कितने का सट्टा लगता!
ठीक है कि प्राचीन काल की लीलाओं से आज की लीलाओं की कोई समानता नहीं। लेकिन कलिकाल की चुनाव लीला में पुरानी लीलाओं के दृश्य कई बार दिखाई देते हैं। हजारों वीरों को अपनी शमशीर से प्रकंपित करता हुआ वीर, जरा से शिखंडी के सामने आते ही धराशायी हो जाता है। महाभारत में तो पितामह को उत्तरायण आते ही मुक्ति मिल गई थी। लेकिन आज के पितामहों को तो शरशैय्या ही नहीं छोड़ रही। पता नहीं, उनके प्राण कहां अटके हैं? विभीषण की तरह उनकी नाभि का भेद बताने वाला तक कोई नहीं है। विकिलीक्स, कोबरापोस्ट- सब फेल हो चुके हैं।
बाबा तुलसीदास भी कितने सयाने थे कि उन्होंने बनारस के गली-मुहल्लों के नाम तक रामलीला से जोड़ दिया था। अब रामनगर को कोई नहीं पूछता। रामावतार काशी नरेश के कहने से कोई वोट नहीं देता। काशीनाथ तक खिसियाए हुए घूम रहे हैं-खीसें निपोरते हुए। जैसे त्रिनेत्र अपना त्रिशूल इन्हीं को थमा गए थे।
लब्बोलुआब यह कि जान आफत में है। वानर दल खोंखियाया हुआ घूम रहा है। संकट मोचन को कोई हल नहीं दिख रहा समस्या का। बुरा हो अयोध्या का कि अपना बवाल उसने काशी के मत्थे मढ़ दिया। वोटर माया से भ्रमित है। उसे मार्ग नहीं दिख रहा। बुद्ध की तपस्थली से भी कोई मध्यमार्ग दिखाई नहीं दे रहा। दर्शन, पर्सन-सब फेल हैं। नेटवर्क गायब है। क्या लीला है?