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गुरु की याद कुछ यूं आई
कैलाश वाजपेयी
Updated Sat, 26 Oct 2013 07:43 PM IST
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लखनऊ विश्वविद्यालय में हमारे कुलपति रहे आचार्य नरेंद्रदेव को मन ही मन नमन करते हुए यह सोचकर अच्छा लग रहा है कि हमें भी लखनऊ में उनका सान्निध्य मिला। यह शायद उन्हीं की प्रेरणा रही होगी कि हम सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बने।
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उन दिनों लखनऊ विश्वविद्यालय विद्यार्थी परिषद के प्रेसीडेंट श्री चंद्रमाल त्रिपाठी हुआ करते थे। त्रिपाठी जी ही हमें पहले पहल आचार्य नरेंद्र देव से मिलवाने ले गए थे। प्रेसिडेंट शब्द से याद आया कि वर्षों बाद भारत के राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा से मिलने का सुयोग आचार्य श्री के सुपुत्र हर्षवर्धन के माध्यम से हुआ।
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डॉ. शंकर दयाल शर्मा राजनीति में आने से पूर्व लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि विभाग में कानून पढ़ाते थे, उन्हें भी आचार्य नरेंद्र देव का सान्निध्य प्राप्त था। लखनऊ विश्वविद्यालय के खुलने और बंद होने की तिथियां उन दिनों तय थीं। डॉ. शंकर दयाल शर्मा, इन्हीं छुट्टियों में से किसी अवकाश के खत्म होने के बाद अपने प्रदेश से लखनऊ आने के लिए अपना छोटा सूटकेस लिए भोपाल रेलवे स्टेशन की ओर आ रहे थे। रास्ते में भोपाल के नवाबी शासन के विरोध में एक जुलूस नारे लगाता हुआ आगे बढ़ रहा था।
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जुलूस से डॉ. शंकर दयाल शर्मा का कुछ लेना-देना नहीं था। वे तो रेलगाड़ी पकड़ने की धुन में जुलूस से अलग पटरी पर चले जा रहे थे। पुलिस ने जब प्रदर्शनकारियों को पकड़ना शुरू किया तो लपेट में शंकर दयाल जी भी आ गए। उन्होंने प्रतिवाद किया कि मेरा प्रदर्शनकारियों से कुछ लेना-देना नहीं है। मैं तो लखनऊ विश्वविद्यालय का एक अदना सा प्राध्यापक हूं। मगर पुलिसवालों ने उनकी एक न सुनी और उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन अखबार में जो रपट छपी उसमें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्नातक (डॉ. शंकर दयाल शर्मा) का भी जिक्र था। हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को जब यह पता चला तब उन्होंने हस्तक्षेप कर उन्हें छुड़ा ही नहीं लिया बल्कि उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कर लिया।
क्योंकि यह आचार्य नरेंद्र देव का 125वां जन्मशती वर्ष है इसलिए हम यहां यह तथ्य रेखांकित करना चाह रहे हैं कि सही अर्थों में समाजवादी विचारधारा के प्रवर्तक नरेंद्र देव जी ही थे। हालांकि इसी के साथ हम सबको श्री राम मनोहर लोहिया की ‘व्हील ऑफ हिस्ट्री’ को भी नहीं भूलना चाहिए। जिन दिनों नरेंद्र देव जी के आवास पर जाना होता था, उन दिनों वह बौद्ध धर्म का मर्म समझने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि तब तक वह अभिधर्मकोश का फ्रेंच भाषा से अनुवाद कर चुके थे। वर्षों के परिश्रम से लिखी गई आचार्य नरेंद्र देव की कृति ‘बौद्ध धर्म दर्शन’ सचमुच अतुलनीय है, जिसके विषय में कविराज गोपीनाथ ने लिखा है, ‘ऐसा ग्रंथ हिंदी भाषा में तो नहीं है, किसी भारतीय भाषा में भी नहीं है। मैं समझता हूं कि किसी विदेशी भाषा में भी नहीं है।'
दिल्ली स्थित प्रकाशक मोतीलाल बनारसी दास द्वारा जब बौद्ध धर्म दर्शन का प्रकाशन हुआ तब आचार्य जी के सुपुत्र हर्षवर्धन ने हमें वह पुस्तक उपलब्ध कराते हुए बताया कि फलां तिथि को भारत के राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा इस पुस्तक का लोकार्पण करेंगे। जिसमें आपसे आशा की जाती है कि आचार्य नरेंद्र देव द्वारा ग्रहण किए गए ज्ञान और उनकी याद में दस-पंद्रह मिनट तक कुछ बोलें। राष्ट्रपति भवन में हम क्या बोले, इसकी बड़ी धुंधली सी याद है।
“हम सबकी एक ही व्यथा है हमें चुनने नहीं दिया जाता। हमारे अंतस की कोराई पर अभिभावक अपनी मान्यताएं हमारे ऊपर थोप देते हैं। बुद्ध इस प्रपंच से दूर हैं। अन्य सभी महापुरुषों की तरह बुद्ध ने यह नहीं कहा कि श्रद्धा हो तो मेरे निकट आओ। नहीं, उन्होंने ठीक इसके विपरीत सिर्फ इतना भर कहा कि मेरे शब्द सुनकर उन पर विचार करना, विश्लेषण करना और अगर तुम्हें लगे कि मेरी बात सही है और तुम्हारे अनुभव पर खरी उतरती है, सिर्फ तब तुम्हें मुझ पर अपने आप यकीन आएगा।
आचार्य नरेंद्र देव ने अपने ग्रंथ में हीनयान से महायान की उत्पत्ति, स्थविरवाद का समाधिमार्ग निर्वाण, अनात्मवाद, अनीश्वरवाद, क्षणभंगवाद सभी पर विमर्श करते हुए बौद्ध साहित्य में जन्मे सर्वास्तिवाद वद्रयान सौत्रांतिक आदि का भी निर्वचन किया है।
उनका अदना सा शिष्य होने के नाते हम इतना भर कह सकते हैं कि जिंदगी के अंतिम वर्षों में शायद आचार्य नरेंद्र देव अपनी हस्ती से सामना करने की प्रक्रिया में आत्मसाक्षात्कार कर शून्य हो गए थे।''