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एक शाम नोबल पुरस्कार विजेता के साथ

Tue, 19 Nov 2013 05:13 PM IST
कैलाश वाजपेयी/वरिष्ठ कवि, चिंतक
कैलाश वाजपेयी/वरिष्ठ कवि, चिंतक Updated Tue, 19 Nov 2013 05:13 PM IST
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नोबल पुरस्कार विजेता सैमुअल बेकेट से हुई मुलाकात के विषय में एक लंबा आलेख पहले कभी हमने संडे टाइम्स में छपवाया था।

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बेकेट से मिलने की कहानी कुछ-कुछ अनियारी है। फ्रांस की सांस्कृतिक सचिव से जब हमने अनुरोध किया कि हमें बेकेट से मिलवाया जाए तो सचिव हेनेरीता ने मना करते हुए कहा कि बेकेट ने हमें लिखकर मना किया है कि हर दिन होने वाले फालतू के कार्यक्रमों के विषय में उन्हें न बुलाया जाए और न ही उनसे संबंधित आमंत्रण उन्हें भेजे जाएं। इसी के साथ यह भी कि बेकेट पेरिस से दूर किसी अरण्य में रहते हैं।

हमने कहा कम से कम इतना तो करें कि बेकेट को एक पत्र, यह स्पष्ट करते हुए लिखें कि एक हिंदी का कवि इन दिनों फ्रांसिसी सरकार का मेहमान है, जिसने उनकी सारी कृतियां पढ़ी हैं और वह आपसे मिलना चाहता है। हमारे इसरार करने पर हेनेरीता ने एक पत्र बेकेट को लिखा।
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चार-छह दिन बाद जवाब आया, ′कैलाश को कहें कि फलां दिन मैं अपने पेरिस वाले फ्लैट पर उसका इंतजार करुंगा। अगर वह उस शाम तक पेरिस में हैं तब तो ठीक वरना मुझे यह भी सूचित करने की जरूरत नहीं कि वह नहीं आ रहा।′ हेनेरीता ने हमें बेकेट के उत्तर का सार फोन पर बताते हुए यह भी कहा कि, ′कैलाश के साथ दुभाषिनी भेजने की भी जरूरत नहीं, कुछ ऐसा इशारा भी बेकेट ने किया है।′
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बेकेट को पढ़ने के साथ-साथ अगर द्वितीय महायुद्ध और उससे जुड़ी समस्याओं और उसके दुष्परिणामों के बारे में सोचा जाए तो यह स्पष्ट होगा कि क्यों बेकेट के पात्र इतने असहज और विरल हैं। बेकेट का पहला पात्र बेलाकुआ एक निहायत आलसी, अधसोया जागा इंसान है, जिसे औरों को युगनद्ध देखने में मजा आता है। बेलाकुआ उन मोहमग्न लोगों में है जो जानता है कि लोग रति दो वजहों से करते हैं या तो अपने अहं की तुष्टि के लिए या फिर संतानोत्पत्ति के लिए ताकि मृत्युभय से मुक्त हो सकें।

बेकेट का दूसरा पात्र मर्फी जिंदगी को एक शानदार कब्र से अधिक नहीं मानता। उसके पास एक यंत्रजड़ी कुर्सी है। मर्फी उस पर बैठकर यंत्र चला देता है। परिणाम यह है कि मर्फी का दिमाग घूमने लगता है। मर्फी यह सब इसलिए करता है कि उसे सोचने से छुटकारा मिल जाए। बेकेट का तीसरा पात्र इंसान नहीं मात्र छाया है। वह चुप रहता है। उसे अक्सर आवाजें सुनाई देती हैं। यही हाल उसके तीसरे पात्र मोलोए का भी है। मार्क्स की तरह बेकेट ने भी अपनी यात्रा कविता से शुरू की थी। कालांतर में बेकेट ने आयरलैंड छोड़कर पेरिस में आबसे और फ्रेंच में लिखना शुरू किया।

हमने कहा, ′कवींद्र रवींद्र को नोबेल पुरस्कार दिलवाने में जिन विलियम बटलर यीट्स का हाथ था वे भी तो आयरलैंड के ही थे।′ हमारी टिप्पणी सुनकर बेकेट ने हाथ से इशारा कर दीवार पर लगे यीट्स के चित्र को हमें दिखाते हुए उत्तर दिया, ‘मैं भी उसी परिवार का हूं और रवींद्र मुझे भी अच्छे लगते हैं।′ तमाम तरह की साहित्यिक गतिविधियों पर विमर्श करते हुए हमने पूछा, ′आपकी नाट्यकृति ‘वेटिंग फॉर गोदो’ जब पहली बार पेरिस के नाटकघर ′थियेटर ऑफ बैबीलोन′ में प्रदर्शित हुई थी तब तो उस पर बड़ी असुविधाजनक टिप्पणियां पेरिस के पत्रों में छपी थीं। ऐसा कैसे हुआ कि आपकी इसी कृति पर नोबल पुरस्कार की घोषणा हुई?′

बेकेट कुछ देर चुप रहकर बोले, ‘यह नाटक झूठी आशावादिता के सहारे जिंदगी जीते चले जाने वालों पर एक इतनी गहरी व्यंग्योक्ति है कि कोई भी इसे स्वीकार नहीं करना चाहता। शायद इसीलिए अखबार वालों ने इसकी भर्त्सना की।′

हमने बेकेट से फिर पूछा, ′इस नाटक को लिखने की प्रेरणा आपको कहां और कैसे मिली?′ बेकेट ने अपने माथे पर बल डालते हुए कहा, ‘कैलाश तुम्हें विश्वास नहीं होगा कि एबसर्ड (अनर्गल) की यह प्रतीति मुझे क्यों और कैसे हुई। हुआ यह कि एक शाम मैं अपने इसी फ्लैट से उतरकर सामने वाली सर्विस लेन में टहल रहा था। मैंने सामने से आते हुए एक नौजवान को देखा। मेरी बगल से गुजरने के क्षण में उसने एक चाकू निकाला और मेरी कमर में घुसेड़ दिया चाकू घुसता हुआ मेरी निचली पसली तक पहुंच चुका था। मैं वहीं पर गिर पड़ा मुझे उसी हालत में छटपटाता छोड़कर वह नवयुवक भाग खड़ा हुआ। मुझे उठाकर पुलिसवालों ने अस्पताल पहुंचाया। दो दिन बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वह नवयुवक पकड़ लिया गया है और अब जेल में बंद हैं, उस पर मुकदमा चलेगा।

कई सप्ताह अस्पताल में रहकर जब मेरा घाव भर गया और मैं अपने इसी फ्लैट में दोबारा लौट आया। तब मुझे हैरानी इस बात की थी कि मैं उस नवयुवक को जानता भी नहीं था और उससे मेरी कोई दुश्मनी भी नहीं थी। तब फिर उसने मुझ पर घातक वार क्यों किया। इसी उलझन में पड़ा मैं अंतत: उस नवयुवक से मिलने, जेलखाने तक गया। उससे मैंने जब पूछा कि तुमने मुझे क्यों मारा? तब गुमसुम बैठे उस नवयुवक ने उत्तर दिया


यही सोच-सोचकर तो मैं भी परेशान हूं कि मैंने तुम्हें क्यों मारा।′ बेकेट ने कहा, ′उसी दिन मुझे बोध हुआ कि यहां सभी कुछ एबसर्ड है यानी मनमाना पहले तो हाड़मांस से बने किसी ईश्वर, अल्लाह या कि गॉड के होने का विचार ही अनर्गल है फिर उसके आने की प्रतीक्षा और भी एबसर्ड या अनर्गल।′

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