फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   kailash vajpayee article

जब अज्ञेय ने स्क्रैबल की चौपड़ बिछा दी

Wed, 05 Feb 2014 01:00 AM IST
कैलाश वाजपेयी/वरिष्ठ कवि और चिंतक
कैलाश वाजपेयी/वरिष्ठ कवि और चिंतक Updated Wed, 05 Feb 2014 01:00 AM IST
विज्ञापन
kailash vajpayee article

मोतीबाग का डी II/75 नंबर वाला फ्लैट। यहीं रहते थे हिंदी के शिखर पुरुष श्री अज्ञेय। सन् 1961 में हमें, अज्ञेय जी से मिलवाने ले गए थे श्री रघुवीर सहाय। अज्ञेय जी की पत्नी डॉ. कपिला वात्स्यायन को जब यह पता चला कि हमारे पास दिल्ली में रहने की जगह नहीं तब अगले दो दिनों में ही उन्होंने हमारे लिए रहने का प्रबंध कर दिया। जो कमरा कपिला जी ने दिलवाया वह कुछ ही कदमों की दूरी पर दक्षिण मोतीबाग में था। अब हम कभी भी अज्ञेय जी के यहां आने-जाने लगे। ये हमारे बेकारी के दिन थे।

विज्ञापन


हम आकाशवाणी के गलियारे में कभी मोहनसिंह सेंगर, कभी सागर निजामी तो कभी पंडित नरेन्द्रशर्मा के कमरे में जा बैठते। नया कुछ सीखने की गरज से स्कूल ब्रॉडकास्ट के नाम से दूरदर्शन की शुरुआत हो चुकी थी, जिसके कर्ताधर्ता थे श्री गंगाधर सुकुल। एक दिन जब हम पंडित नरेन्द्र शर्मा के पास बैठे थे, तभी वहां गंगाधर सुकुल आए। उन्हें अपने कार्यक्रम के लिए एक ऐसे जीव की तलाश थी जो कालिदास बनकर उसके रचे श्लोकों का सस्वर पाठ कर सके। हमें वहां देखकर श्री गंगाधर जी ने कहा-"कैलाश जी आपको ही कालिदास बनकर श्लोक-पाठ करना होगा। आप परसों हमें स्टूडियो में मिलें," यह कहकर शुक्ल जी गायब हो गए।
विज्ञापन


शाम को हम अज्ञेय जी के यहां गए। वहां उनसे अपनी समस्या बताई। अज्ञेयजी ने कहा-'इसमें व्यग्र होने की जरूरत क्या है?' अज्ञेय जी उठे और अपने ग्रंथागार से संस्कृत साहित्य के इतिहास की एक प्रति दी। कहा-'इसे ले जाएं और अपेक्षित श्लोक कंठस्थ कर लें।' निर्धारित दिन हमने कालिदास की वेषभूषा में कैमरे के सामने आकर श्लोक पाठ का रिहर्सल कर ओके के बाद पाठ किया। कार्यक्रम रिकॉर्ड हो गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


जिस शाम वह कार्यक्रम प्रसारित हुआ, उसके बाद से कई दिनों तक सभी छेड़ते हुए हमें कैलाश की जगह कालिदास बुलाने लगे। शोध के दिनों में लखनऊ में हमने अज्ञेय के संदर्भ में मानवेंद्रनाथ राय का नाम सुन रखा था। एक शाम अज्ञेय जी ने राय पर विस्तृत बातें कीं। बंगाल के 24 परगना में जन्में मानवेंद्र जी का असली नाम नरेन्द्र भट्टाचार्य था। प्रथम महायुद्ध की शुरुआत के बाद वे वेष बदलकर, विदेशी शासन को उलट फेंकने की गरज से जापान हिंदचीन होते हुए अमेरिका जा पहुंचे, जहां उन्हें कैद कर लिया गया।

रिहा होने के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर मानवेंद्रनाथ राय रख लिया और सीमापार कर मेक्सिको पहुंच गए। यहीं उनकी मुलाकात 'मिखेल बोरोदिन' से हुई जिनकी मदद से वे सोवियत यूनियन पहुंचे। वहां कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उनकी भेंट लेनिन से हुई। लेनिन ने उन्हें पूर्वी प्रकोष्ठ का प्रभारी बनाकर भारत लौटने का आदेश दिया। भारत में जब ये संगठन कार्य कर रहे थे, तभी लेनिन नहीं रहे।

लेनिन के बाद स्टालिन की निरंकुशता से झल्लाकर मानवेंद्रनाथ राय ने उसे एक बड़ी सख्त चिट्ठी लिखी। मार्क्स की सशक्त क्रांति की अवधारणा भी उन्हें इन्हीं दिनों दुस्तर लगी इसलिए उन्होंने सन 1940  में रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की। वह शायद मार्क्स के चितंन में एक नया पन्ना जोड़ना चाह रहे थे, शायद इसलिए साम्यवाद को नत्थीकर एम.एन.राय ने उग्र मानववाद (रेडिकल ह्यूमेनिज्म) का सिद्धांत पारित किया, जो बहुतों की प्रेरणा का केंद्र बना। अज्ञेयजी उन्हीं में से एक थे।

रविवार के दिन हम जब अज्ञेयजी के यहां जाते तो कई बार अज्ञेय जी कपिला जी के साथ 'स्क्रैबल' खेलते मिलते थे। लखनऊ में हमने भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, इलाचंद्र जोशी और सुरेन्द्र तिवारी को ताश खेलते देखा था। 'स्क्रैबल' सिर्फ दो ही लोगों के बीच खेला जाता है। इसमें अंग्रेजी के अक्षरों के सहारे शब्दों की वर्तनी सोच-समझकर गढ़नी होती है।


एक बार हम अपराह्र में अज्ञेय जी के पास चले गए। अज्ञेयजी को शायद 'स्क्रैबल' खेलने की तलब लगी रही होगी। उन्होंने हमसे अंग्रेजी ज्ञान के विषय में पूछा। हमने कहा 'ऑनर्स तक जितनी अंग्रेजी आती है, बस उतनी ही आती है' अज्ञेय जी ने स्क्रैबल की चौपड़ बिछा दी। हम दोनों अपनी सूझबूझ के अनुसार शब्द गढ़ने की युक्ति का इस्तेमाल कर रहे थे। काफी सोच-समझकर हमने अंग्रेजी की क्वेरी शब्द की वर्तनी जोड़नी शुरू की। हमें सिर्फ अंतिम अक्षर 'वाई' भर जोड़ना था। अज्ञेयजी ने झट से वहां पर 'एन' अक्षर जोड़ दिया। हमें तब तक पता नहीं था कि हिंदी के चक्की शब्द को अंग्रेजी में 'क्वर्न' कहा जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed