कबीनी का काला पैंथर...यह इंतजार व्यर्थ नहीं था
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यह तो होना ही था। जब दिल प्रफुल्लित होकर भर आता है, तो आंखें छलक ही जाती हैं। अंततः जब मैंने उस जीव को देखा, जिसका पीछा मैं पांच वर्षों से कर रही थी, तो आंसू बिन बुलाए मेहमान की तरह चले आए। आखिरकार, वह ब्लैकी या जैसा कि स्थानीय लोग उसे कहते हैं, करिया – कर्नाटक के कबीनी वन का विश्वप्रसिद्ध काला पैंथर है। वह हमारी जीप से करीब 15 मीटर दूर, एक पेड़ पर बेपरवाह सुस्ता रहा था। बेंगलुरू लिटरेचर फेस्टिवल (बीएलएफ) में, ‘रोमांसिंग द ब्लैक पैंथर’ (bit.ly/karia) नामक व्याख्यान के साथ सार्वजनिक रूप से बयान देने के ठीक पांच दिन बाद, ब्लैकी ने अपनी उपस्थिति से मुझे अनुग्रहित किया। क्या पल था वह! भगवान को धन्यवाद करते हुए, मैं स्तंभित होकर उसके चमकीले शरीर और लंबी पूंछ को टकटकी लगाए देखती रही। जब उसने हमारी ओर अपना सिर घुमाया, तो उसकी पीली आंखें चमक उठीं; यही वह क्षण था जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी। मेरा लक्ष्य हासिल हो चुका था। अंततः, इतने निष्फल प्रयासों के बाद, विशेषकर महामारी के वर्ष में ब्लैकी मेरे सामने था।
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यह इंतजार व्यर्थ नहीं था। न केवल इसलिए कि ब्लैकी बिल्कुल वैसा था, जैसी मुझे उम्मीद थी, बल्कि इसलिए भी, क्योंकि इस एक काली बिल्ली की तलाश के दौरान मैंने बहुत कुछ पाया। मैंने उससे कई सबक सीखे हैं। इस बिल्ली की एक छोटी-सी झलक की उम्मीद में मैंने एक जगह पर घंटों इंतजार किया, जिससे मैं धैर्य और दृढ़ता में प्रशिक्षित हुई। यह भी सीखा कि कैसे भूत और भविष्य की सुध लिए बिना, वर्तमान में रहते हुए, सचेत रहा जाए। विनम्रतापूर्वक यह जाना कि जब काला पैंथर खोजने की बात आती है, तब धन और विशेषाधिकार बहुत काम नहीं आते। खुशी भौतिक संपत्ति से परे, छोटी चीजों से मिलती है।
हालांकि, सब से बढ़कर ब्लैकी ने मेरी आंखों को जंगल, उसकी शांति और इसके बदलते मौसमों को उत्सुकतापूर्वक निरीक्षण करना सिखाया। मैंने पेड़ों, झाड़ियों और जंगल के फर्श के लिए खतरा, तेजी से फैलने वाली खरपतवारों के बारे में सीखा। उसी जंगल में, जिसमें काली बिल्ली रहती है, बहुत से जानवरों को देखा, उनमें से कुछ शर्मीले, कुछ निर्भीक, कुछ जाने पहचाने तो कुछ नए थे। जैव विविधता के साथ वनस्पति, कीड़ो एवं जानवरों की परस्पर अंतर्संबद्धता के बारे में जानने के बाद मैंने स्वयं को बहुत मामूली पाया। मुझे जंगल को सरंक्षित और पुनर्जीवित करने के लिए किए गए वन विभाग के सफल प्रयासों पर गर्व हुआ। मैं जेनु कुरुबा जैसे आदिवासी लोगों के प्रति आभारी हुई, जो अब भी अपनी बुद्धिमत्ता और ज्ञान से इन जंगली इलाकों और उनके आसपास गुजारा कर रहे हैं।
यह जानवर 2015 में पहली बार देखा गया था और पर्यटकों की रुचि को जीवित रखने के लिए बीच-बीच में दिख जाया करता था, लेकिन इतनी बार भी नहीं कि यह कहा जा सके कि वह नियमित रूप से दिख जाता है। वह सबसे अलग था, सुंदर था, वह नजर नहीं आता था। लोग उसकी एक झलक देखना चाहते थे। 640 वर्ग कि.मी. जंगल के 60 वर्ग कि.मी. के पर्यटन क्षेत्र में इस एक काली बिल्ली को खोजने की कोशिश में, दुनिया भर से लोगों के समूह कबीनी आते रहे थे। वास्तव में, कर्नाटक में कई काले तेंदुए हैं। तो फिर इसे ही क्यों इतना चाहा जा रहा है? शायद इसलिए कि यह ऐसा पैंथर है, जिसके क्षेत्र का नक्शा अच्छी तरह से बनाया गया है, और सौभाग्यवश वह पर्यटन क्षेत्र में भी आता है। और इसलिए भी कि वह अब भी दुर्लभ है, और उसे ढूंढ पाना आसान नहीं है।
महामारी ने भी हमें बहुत कुछ सिखाया है। अब हम जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों के खतरों को जानने लगे हैं। हम जानते हैं कि हमें जानवरों को उनका स्वयं का स्थल, स्वयं का क्षेत्र देना होगा। अब हम स्वीकार करते हैं कि ऐसा करके, हम न केवल उनकी, बल्कि भूमि, जंगल और इंसानों की भी रक्षा करते हैं। हम विनयशील हो गए हैं, और भविष्य में बेहतर संतुलन बहाल करने का अवसर देखते हैं।
(- लेखिका समाजसेवी और अर्घ्यम् संस्था की अध्यक्ष हैं।)