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न्याय का संकल्प या संकल्प से न्याय

Narayana Krishnamurti नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Wed, 10 Apr 2019 06:03 PM IST
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Justice of resolution or justice with resolution
मतदान

घोषणा पत्रों का महत्व सिर्फ उसमें निहित सामग्री (वादों) को लेकर नहीं होता है, बल्कि इसलिए भी होता है कि ये राजनीतिक दलों और मतदाताओं के बीच चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। इसी समय राजनीतिक दल अपने वादों (संकल्प) के साथ न्याय करते हैं।


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लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 91 निर्वाचन क्षेत्रों में आज मतदान होने वाले हैं और कई दलों ने पहले चरण का चुनाव प्रचार खत्म होने से पहले आठ अप्रैल को ही अपना घोषणा पत्र जारी किया। यह दृष्टिकोण अपने-आप में घोषणा पत्रों को लेकर गंभीरता या उसकी कमी का संकेत करता है। कुछ क्षेत्रीय दलों को छोड़कर भाजपा, कांग्रेस, राजद, सपा, बसपा जैसे ज्यादातर राष्ट्रीय दलों ने इस महीने की शुरुआत में अपने घोषणा पत्र जारी कर दिए हैं। घोषणा पत्र महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर संबंधित दलों के विचारों को मतदाताओं के लिए उजागर करते हैं, ताकि किसे वोट देना है, इस पर मतदाता अपना मन बना सकें।

लगभग सभी राजनीतिक दलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, किसान, युवा, विदेश नीति, आर्थिक विकास जैसे बड़े-बड़े मुद्दों का अपने घोषणा पत्रों में जिक्र किया है। इन पहलुओं का भावनात्मक और तत्काल वित्तीय प्रभाव मतदाताओं पर पड़ता है। और वास्तव में इसलिए दलों के लिए इनसे खेलना जरूरी था। हालांकि इसका कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है कि घोषणा पत्रों में उल्लेखित वादों को कैसे पूरा किया जाएगा। वास्तव में सभी राजनीतिक दलों ने अपने विरोधियों द्वारा जारी घोषणा पत्र को यह कहकर खारिज कर दिया कि इनमें बड़े-बड़े वादे किए गए हैं, जिन्हें हासिल नहीं किया जा सकता। मुझे 1965 की फिल्म वक्त में राज कुमार का मशहूर संवाद याद आता है-जिनके घर शीशे के हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।

कांग्रेस ने देश के 20 फीसदी अति निर्धन लोगों को सालाना 72,000 रुपये आय सहायता देने का वादा किया है। इस वादे की काट के लिए भाजपा ने कहा कि वह गरीबों को खुद सशक्त बनने के लिए औजार प्रदान करेगा। समाजवादी पार्टी ने इससे आगे बढ़कर नौकरी में आरक्षण और नौकरी की गारंटी का उल्लेख किया है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि लोगों के पास नौकरी और कमाई होगी।

रोजगार के मुद्दे पर भाजपा वास्तव में युवा उद्यमियों को बिना किसी सिक्योरिटी के 50 लाख रुपये का कर्ज, 2024 तक 50 हजार नए स्टार्ट अप और बीस हजार करोड़ रुपये के बीज स्टार्ट अप फंड का उल्लेख करती है। उसके घोषणा पत्र में लोकप्रिय मुद्रा योजना का भी जिक्र है, जिससे अभी 17 करोड़ लोगों ने लाभ उठाया है और आगे 30 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे। राजद भी इनसे पीछे नहीं है, जिसने सरकारी नौकरी और मंडल आयोग की शेष सिफारिशों को लागू करने का वादा किया है।

यहां राष्ट्रवाद की भी भरपूर खुराक है, खासकर आतंकवाद का मुकाबले करने या प्रवासियों द्वारा घुसपैठ के संदर्भ में, जो देश के कई हिस्सों में भारतीयों के संकट को बढ़ा रहा है। कांग्रेस ने सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम की समीक्षा करने और कश्मीर में शांति प्रक्रिया शुरू करने का वादा किया है, जबकि भाजपा ने अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए को खत्म करने के अपने रुख को दोहराया है। इन दो अलग-अलग दृष्टिकोणों ने क्षेत्रीय दलों की प्रतिक्रियाओं को हवा दी है, जो और भी भ्रमित हैं। अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए पर पीडीपी के नजरिये का उदाहरण ले लीजिए, जहां यह महसूस होता है कि ये बदलाव जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग-थलग कर देंगे, मानो उत्तर भारत का यह इलाका भारत का हिस्सा नहीं है।

अब वित्त और अर्थव्यवस्था पर लौटते हैं-भाजपा के घोषणा पत्र में कर दरों को कम करने और उन्हें सरल बनाने, व्यापार सुगमता में सुधार करने और अनुबंधों को लागू करने और विवादों को हल करने की क्षमता का जिक्र है। उसमें अपने पारंपरिक मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए नई औद्योगिक नीति और राष्ट्रीय व्यापार कल्याण बोर्ड का भी उल्लेख है। कांग्रेस ने भी विकास के लिए कर कानूनों में सुधार का जिक्र किया है। उसने भारत में व्यापार शुरू करने वालों को पहले तीन साल तक बिना अनुमति लिए या कर कानूनों का अनुपालन किए व्यवसाय की सुविधा देने का वादा किया है।
दशकों से देश में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति बहुत खराब है। साक्षरता दर के मामले में भारत 234 देशों की सूची में 168वें पायदान पर है और वैश्विक भूख सूचकांक में 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर। इन पैमानों पर हमारे कुछ छोटे पड़ोसियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जो बताता है कि हम नीतियों और इन मुद्दों से निपटने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण पिछड़े हैं। लगभग सभी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा का जिक्र किया गया है कि जीडीपी का कितना हिस्सा वे इन दोनों प्रमुख मुद्दों पर खर्च करेंगे। हालांकि इन दोंनों मुद्दों पर विभिन्न सरकारों का पिछला रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है और स्पष्टता का अभाव है।

इन घोषणा पत्रों में एक सामान्य बात यह है कि इनमें कई कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र है, जैसे गरीबों को पेंशन, कुछ वर्गों को निश्चत आय, सबको बिजली और पानी। ऐसा लगता है कि सबने मतदाताओं की इच्छाओं की सूची तैयार की है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या इन्हें लागू किया जा सकता है। व्यापक रूप से राजनीतिक दल की विचारधारा और सोच उनके घोषणा पत्रों में परिलक्षित होती है, लेकिन दुखद है कि उनमें से किसी ने भी स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया है कि उनके द्वारा सूचीबद्ध कार्यक्रमों को कैसे लागू किया जाएगा।

यही कारण है कि यदि आप किसी के पुराने घोषणा पत्र से नए घोषणा पत्र की तुलना करेंगे, तो पाएंगे कि उन्हें दोहराया गया है। मतदाताओं को इन पार्टियों से पूछना चाहिए कि वे अपने वादों को कैसे पूरा करेंगे। जो इन वादों की व्याख्या कर सकते हैं, वे इन वादों की व्यवहार्यता का आकलन कर सकते हैं और यह तय कर सकते हैं कि कौन-सी पार्टी अपने वादों को पूरा कर सकती है।

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