न्याय की दरकार : इस जख्म की भरपाई कैसे हो, समानता के लिए कटघरे में खड़ा ‘आधी दुनिया' का संघर्ष
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विस्तार
समानता के लिए ‘आधी दुनिया' का संघर्ष तब कटघरे में खड़ा हो जाता है, जब उनके लिए बने सुरक्षा के कानूनों का स्वयं उनके द्वारा ही दुरुपयोग होने लगता है। बीते दशकों में दुष्कर्म को रोकने और दुष्कर्मी को सजा देने के लिए बने कानूनों का दुरुपयोग न्यायालय के लिए चिंता का विषय बन चुका है। ये तमाम बातें इसलिए चर्चा में हैं, क्योंकि बीते दिनों राजस्थान में उदयपुर की पॉक्सो अदालत ने दुष्कर्म का झूठा आरोप लगाने और पूर्व में दिए बयान से मुकरने पर एक युवती को तीन महीने की सजा सुनाई है।
न्यायालय का यह निर्णय दुष्कर्म से जुड़ी संवेदनशीलता के तमाम बिंदुओं पर गहनता से विमर्श के मार्ग खोलता है। दुष्कर्म केवल एक शारीरिक हमला नहीं है, यह अक्सर पीड़ित के पूरे व्यक्तित्व के लिए विनाशकारी होता है। दुष्कर्म की घटना में पीड़ित के मानस को झकझोरने की क्षमता होती है और यह आघात वर्षों तक बना रहता है। यही कारण है कि जब भी किसी महिला द्वारा दुष्कर्म की प्राथमिकी दर्ज कराई जाती है, तो पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई होती है।
भारत का कठोर यौन उत्पीड़न कानून इस तरह से तैयार किया गया है, कि अभियोजन पक्ष अधिक प्रभावी ढंग से पैरवी कर सके और पीड़ित की प्रतिष्ठा की पुनर्बहाली हो सके। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस कानून का दुरुपयोग पुरुषों को पीड़ा देने के हथियार के रूप में होने लगा है। 16 अगस्त, 2021 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘विमलेश अग्निहोत्री और अन्य बनाम राज्य एवं अन्य’ मामले पर निर्णय देते हुए कहा था, अपराधी की गंभीर प्रकृति के कारण छेड़छाड़ और दुष्कर्म के मामलों से संबंधित झूठे दावों और आरोपों से सख्ती से निपटने की जरूरत है।
ऐसे आरोप अनैतिक वादकारियों द्वारा इस उम्मीद में लगाए जाते हैं कि दूसरा पक्ष डर या शर्म से उनकी मांगों को स्वीकार कर लेगा। जब तक गलत काम करने वालों को उनके कार्यों का परिणाम नहीं भुगतना पड़ेगा, तब तक ऐसे झूठे मुकदमों को रोकना मुश्किल होगा। न्यायालय की इस कठोर टिप्पणी के मायने बिल्कुल स्पष्ट हैं, परंतु चिंता का विषय है कि ऐसी प्रवृतियां रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। न्यायिक व्यवस्था महिला द्वारा लगाए आरोपों को प्रथम दृष्टया सत्य ही मानती है, मगर सत्य और असत्य की वास्तविक परख कई बार बीस वर्ष का समय भी ले लेती है।
बीते साल 20 वर्षों से कारागार में कैद ललितपुर के विष्णु को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दुष्कर्म के आरोप में निर्दोष पाया। यह सहज कल्पनीय हैं कि विष्णु के घाव कभी नहीं भरने वाले हैं। दिल्ली की एक अदालत में न्यायाधीश निवेदिता अनिल शर्मा ने ‘राज्य बनाम राजू भट्ट' मुकदमे में तीन मार्च, 2016 को निर्णय देते हुए कहा था, 'कोई भी पुरुष के सम्मान और गरिमा की बात नहीं करता। हर कोई महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और गरिमा के लिए संघर्ष कर रहा है।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून बने हैं, जिसका कोई भी महिला दुरुपयोग कर सकती है, लेकिन ऐसी महिलाओं से पुरुषों के बचाव के लिए कानून कहां हैं? शायद अब समय आ गया है कि ऐसे मामलों के भुक्तभोगी पुरुषों के बचाव के लिए कानून बनाए जाएं।' दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुष्कर्म के झूठे आरोपों से मुक्त होने पर पुरुषों की पीड़ा खत्म नहीं होती, क्योंकि दुष्कर्म के आरोप में फंसने पर समाज में काफी शोरगुल होता है, पर उनकी आरोप मुक्ति पर किसी का ध्यान नहीं जाता!
जॉन डेविस ने अपनी पुस्तक फॉल्स एक्यूजेशंस ऑप रेप: लिंचिंग इन द फर्स्ट सेंचुरी में उन मिथकों का वैज्ञानिक खंडन प्रस्तुत किया है कि महिलाएं दुष्कर्म के बारे में झूठ नहीं बोलती हैं। डेविस ने अनेक आंकड़ों के आधार पर अपने विस्तृत शोध में इस तथ्य को गंभीरता से उठाया है कि दुष्कर्म के झूठे आरोपों से पुरुष का पारिवारिक और सामाजिक जीवन तो समाप्त हो ही जाता है, वह अवसाद और मानसिक पीड़ा से भी नहीं उबर पाता।
दुष्कर्म के आरोपों की स्थिति में पुलिस महकमे की संवेदनशीलता और दायित्व कहीं अधिक बढ़ जाते हैं, इसलिए इस संबंध में उन्हें कहीं अधिक गंभीर होने की आवश्यकता है। कानून की पेचीदगियों के बीच पुरुषों के अधिकारों की अवहेलना भविष्य में एक बड़े सामाजिक संकट को उत्पन्न कर सकती है।