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सिर्फ रिपोर्ट नहीं, चेतावनी है यह

Fri, 25 Jan 2013 09:52 PM IST
गुंजन कुमार
गुंजन कुमार Updated Fri, 25 Jan 2013 09:52 PM IST
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just do not report its warning

यौन अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए गठित न्यायमूर्ति वर्मा समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। उस समिति के सदस्य पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम से गुंजन कुमार ने बात की -

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जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट से सरकार अंदर नाखुश है। उसका मानना है कि समिति ने अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर सिफारिशें कर दी हैं।
संविधान के अनुच्छेद-21 ने सभी नागरिकों को सम्मान के साथ जीने का मौलिक अधिकार दिया है। लेकिन देश की करीब आधी आबादी का सम्मान दांव पर लगा रहता है। यह स्थिति इसलिए नहीं है कि कानून में कमी है, बल्कि इसलिए है कि पूरा सरकारी तंत्र इस मामले में संवेदनहीन है। यही वजह है कि समिति ने चुनाव प्रक्रिया से लेकर पुलिस सुधार, यहां तक की न्यायिक प्रक्रिया में वैसे बदलावों की सिफारिश की है, जिनका सीधा प्रभाव महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा है। यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, देश के लिए चेतावनी भी है।
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समिति ने जनप्रतिनिधित्व कानून और चुनाव प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की है। इसका महिलाओं की सुरक्षा से क्या संबंध है?
लोगों से मांगी गई राय में जिस तरह की सच्चाई सामने आई, उससे हम लोग दंग थे। इससे हमें अंदाजा लगा कि जनता अपने अन्याय के प्रति कितनी जागरूक हो गई है। वैसे इलाकों से कई शिकायतें और राय आईं, जहां के जनप्रतिनिधि आपराधिक प्रवृति के हैं। उनकी शिकायतों पर गौर करने पर हमने पाया कि जब कोई आपराधिक मनोदशा का व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करता है, तो उस क्षेत्र की महिलाओं के अधिकार पर गहरी चोट पड़ती है। हमने इस बारे में चुनाव आयोग से मशविरा किया और हमारा अंदाज सही निकला।
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समिति ने बलात्कारी को फांसी की सजा की सिफारिश नहीं की और न ही नाबालिग की उम्र घटाने का प्रस्ताव रखा, जबकि जनता यह मांग कर रही थी।
समिति के पास आए करीब 80,000 सुझावों में फांसी की सजा की वकालत करने वाले कम थे। वैसे भी पूरी दुनिया से मृत्युदंड खत्म करने का माहौल बन रहा है। यह एक बड़ा फैसला है, जिसे महीने भर के भीतर नहीं लिया जा सकता। रही बात नाबालिग की उम्र सीमा घटाने की, तो समाज और तंत्र ने बच्चों के साथ सर्वाधिक अन्याय किया है। जब वे कानून के दायरे में आते हैं, तो देश का नाबालिग न्याय कानून रही-सही कसर निकाल देता है। ऐसे में उनके बचपन को संवारे बिना उन्हें दो साल पहले ही बालिग बना देना घोर अन्याय होगा।


समिति ने शिक्षा और सामाजिक न्याय के ऑडिट के लिए कैग जैसी संस्था के गठन की सिफारिश की है।
समिति ने कैग को ही इसकी जिम्मेदारी लेने की सिफारिश की है। ऐसा इसलिए, ताकि लड़कियों की शिक्षा और सुरक्षा में कोताही की जिम्मेदारी तय की जा सके। जब तक सामाजिक स्तर पर मूलभूत बदलाव नहीं होगा, महिलाओं की सुरक्षा पर बात करना बेमानी है। अगर देश, समाज और सरकार अभी नहीं चेती, तो बहुत देर हो जाएगी।

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