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दुनिया की परवाह नहीं जुंटा को : लोकतंत्र में अपने हक की लड़ाई और भू-राजनीतिक समीकरण

Sat, 27 Aug 2022 03:14 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Sat, 27 Aug 2022 03:14 AM IST
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सार
अमेरिका ने सेना को आंग सान सू की सहित वरिष्ठ नेताओं को रिहा करने के अलावा सत्ता छोड़ने और लोकतंत्र बहाल करने की चेतावनी दी है। कई देशों ने फांसी की निंदा की और लोकतंत्र को बचाने के लिए तानाशाह को अलग-थलग करने का समर्थन किया।
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Junta does not care about the world: fight for its rights in democracy and geopolitical equation
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : social media

विस्तार

म्यांमार की कंगारू कोर्ट ने नोबेल विजेता और लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू की को छह साल की जेल की सजा सुनाई है, जो उन्हें दी गई 11 साल की सजा में जुड़ जाएगी, जोमानवाधिकार के उल्लंघन का सबूत है। अदालत ने उन्हें 'दाव खिन की' फाउंडेशन नामक एक स्वास्थ्य और शिक्षा संगठन के धन के दुरुपयोग का दोषी पाया है, जिसे उन्होंने अपनी दिवंगत मां की याद में स्थापित किया था। कोर्ट ने सरकारी जमीन को रियायती दर पर पट्टे पर देने का भी संज्ञान लिया। 



उन्हें राजधानी नाएप्यीडॉ में एकांत कारावास में रखा गया है। अमेरिका और पश्चिमी राष्ट्र यूक्रेन युद्ध और ताइवान को चीन की धमकी वाले मामलों में व्यस्त हैं, जिसने म्यांमार के सैन्य शासकों को दमन जारी रखने का अवसर दिया है, जैसा कि हाल ही में चार लोकतंत्र कार्यकर्ताओं की फांसी के समय देखा गया। देर से जारी प्रतिक्रिया में भारत ने अपने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा और कूटनीतिक रूप से म्यांमार की घटनाओं (फांसी) पर अपनी चिंता व्यक्त की और वहां हालात सुधारने के निरंतर प्रयासों की सख्त आवश्यकता पर बल दिया। 


भारत ने भू-राजनीतिक समीकरणों और सुरक्षा जोखिमों के मद्देनजर ऐसी प्रतिक्रिया दी है, ताकि सैन्य जनरल को नाराज न किया जा सके, क्योंकि ऐसा करने पर उसका झुकाव चीन की तरफ हो सकता है, जो हमारे खिलाफ इस मौके का फायदा उठा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के दूत नोलीन हेजर की हालिया अपील के बीच चार लोकतंत्र कार्यकर्ताओं को फांसी दिए जाने की दुनिया भर में निंदा की गई है और भविष्य में फांसी पर रोक लगाने की मांग की गई है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने हमेशा से इस मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत को रेखांकित किया है और वह कानून के राज और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पक्षधर रहा है। भारत ने म्यांमार में शांति एवं स्थिरता लाने के दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के एसोसिएशन के प्रयासों का समर्थन किया है, जहां फरवरी 2021 में चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करके सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद से अशांति और संघर्ष छिड़ा है। 

भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है, इसलिए दुनिया भर के देशों की भारत से अपेक्षा थी कि वह फांसी की निंदा करेगा, लेकिन भारत ने अपनी सामरिक आवश्यकता को ध्यान में रखा है। फांसी को जघन्य अपराध बताने में अमेरिका सबसे आगे रहा है और उसने पहले ही सैन्य शासन के खिलाफ प्रतिबंध लगा दिए हैं, जो म्यांमार के जनरलों को अमेरिका में जमा की गई एक अरब डॉलर की राशि तक पहुंच को बाधित करेगा। 

अमेरिका ने सेना को आंग सान सू की सहित वरिष्ठ नेताओं को रिहा करने के अलावा सत्ता छोड़ने और लोकतंत्र बहाल करने की चेतावनी दी है। कई देशों ने फांसी की निंदा की और लोकतंत्र को बचाने के लिए तानाशाह को अलग-थलग करने का समर्थन किया। सैन्य शासकों के निरंकुश होने की मुख्य वजह चीन है, क्योंकि म्यांमार को चीन से हथियार मिलते हैं, और उसे 19 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश मिला है। दूसरी बात यह है कि चीन म्यांमार का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 

तीसरी बात यह है कि म्यांमार-चीन चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ने मुख्य रूप से कपड़ों के कारोबार में 340 से अधिक कंपनियों को पंजीकृत किया है, जो दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों के महत्व को प्रदर्शित करता है। विश्लेषकों का कहना है कि रणनीतिक मजबूरियों के कारण भारत ने कड़े शब्दों में फांसी की निंदा नहीं की है, क्योंकि वह सैन्य कमांडरों को नाराज नहीं करना चाहता, जो म्यांमार-भारत सीमाओं पर समस्याएं पैदा करने के लिए बीजिंग को प्रोत्साहित करेगा। 

भारत क्वाड का प्रभावी सदस्य है, जिसका उद्देश्य विश्व राजनीति में बड़ी भूमिका निभाना है, इसलिए चुप रहने से काम नहीं चलने वाला। लेकिन भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने का जोखिम नहीं उठा सकता, क्योंकि पूर्वोत्तर क्षेत्र से यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) और नेशनल फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) जैसे आतंकवादी समूह म्यांमार में शरण लेते हैं और सैन्य शासन उन्हें प्रोत्साहित कर सकता है। भारत ने म्यांमार में काफी निवेश किया है, जो शत्रुतापूर्ण शासन के चलते असुरक्षित हो जाएगा। 

भारत कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भी सहायता कर रहा है। सैन्य शासन लैंड बॉर्डर क्रॉसिंग एग्रीमेंट, 2018 को भंग कर सकता है, जिसका भविष्य में दो अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभाव पड़ेगा। लोकतंत्र की बहाली के लिए काम करने के अलावा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जुंटा के साथ जुड़ने की नई दिल्ली की दोहरी नीति काम नहीं करेगी, क्योंकि यह तर्कसंगत नहीं है। म्यांमार में लोकतांत्रिक परिवर्तन की प्रक्रिया के दौरान अलोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ भारत हमेशा अडिग रहा है। 

लेकिन इसने सीधे तौर पर तख्तापलट की निंदा करने से परहेज किया और कानून के शासन का समर्थन किया, जिससे भारत को लाभ हुआ। उसी तरह से भारत ने फांसी की निंदा करने से परहेज किया है, जिसने दुनिया को निराश किया है, लेकिन देश के हितों की रक्षा करना तर्कसंगत है। चीन ने भी संभलकर प्रतिक्रिया दी है, जिससे सैन्य शासन द्वारा दी गई फांसी की मौन स्वीकृति की बू आती है, जो मुख्य रूप से इस क्षेत्र में भारत के प्रभाव की जांच करने के निहित रणनीतिक हितों द्वारा निर्देशित है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने जानबूझकर फांसी के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है, क्योंकि वह लंबे समय से म्यांमार को भारत से दूर करना चाहता है। 

फांसी ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है और म्यांमार की अस्थिरता भविष्य में और बढ़ सकती है। अमेरिका और यूरोपीय संघ जुंटा को अलग-थलग करने के लिए सख्त नीति अपना सकते हैं, जिसका संभवतः चीन विरोध करेगा। इस जटिल और निराशाजनक परिदृश्य में सैन्य शासकों ने दिखाया है कि वे लोकतंत्र कार्यकर्ताओं की फांसी के जघन्य अपराधों के बारे में दुनिया की परवाह नहीं करते हैं और मानवाधिकारों का उल्लंघन करते रहेंगे। चीन जैसे देशों के निहित स्वार्थ उन्हें म्यांमार में हत्या और अत्याचार करने के लिए बढ़ावा दे सकते हैं, जो भविष्य में लोकतंत्र बहाली की आशा को निराशावाद की ओर ले जाएगा।

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