फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   journey of kailash

उजाले की गरिमा, अंधेरे का मौन और पहाड़ की प्रतीक्षा तक

Sat, 06 Jul 2013 09:35 PM IST
देव प्रकाश चौधरी
देव प्रकाश चौधरी Updated Sat, 06 Jul 2013 09:35 PM IST
विज्ञापन
journey of kailash

भारतीय जनमानस कभी अकेले नहीं जीता। हमारे यहां मिथक और यथार्थ, इतिहास और वर्तमान, देवता और मनुष्य आज भी साथ-साथ रहते हैं। कई तरह के विश्वासों, आस्थाओं, स्मृतियों और संस्कारों का यह संगम हमें एक ऐसी ताकत देता है कि सिर्फ राजनीति और संस्कृति ही नहीं, हमारा भूगोल भी हमारी पौराणिक स्मृतियों में धड़कता रहता है। तभी तो गंगा हमारे लिए महज एक नदी भर नहीं रह जाती। काशी सिर्फ एक नगरी नहीं होती। कैलास सिर्फ एक खूबसूरत पहाड़ भर नहीं होता और ऐसी जगह की कोई यात्रा भी सिर्फ सफर भर नहीं रह जाती। ऐसी यात्रा में हम जितना दूर जाते हैं उतना ही खुद के करीब भी आते हैं। यह अतीत, वर्तमान और भविष्य की ओर जाने का एक आयोजन भी होता है।

विज्ञापन


ऐसी ही एक यात्रा पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा अपने दोस्तों के साथ निकले थे-कैलास की ओर। कैलास, जहां सृष्टि की शुरुआत से शिव का वास है। कैलास, जो भौगोलिक रूप से पर्वत भले ही हो, भारतीय जनमानस के लिए स्वप्नलोक से कम नहीं। वैसे आधुनिक साधनों की भरमार के बीच भी कैलास की यात्रा बहुत आसान नहीं। दुर्गम पहाड़ी रास्ता, विदेश में होने की वजह से कई तरह की औपचारिकताएं और फिर यात्रा के लिए वक्त और धन की जरूरत।
विज्ञापन


लेकिन घुमक्कड़ प्रवृत्ति और अनजाने के प्रति लगातार कौतूहल ने पत्रकार हेमंत शर्मा के मन में एक जिद को जन्म दिया-''कैलास जाएंगे।'' परिणाम सुखद है। वहां से लौटे तो सामने आई एक किताब 'द्वितीयोनास्ति,कैलास-पर्वत एक अकेला।' इस खूबसूरत सी किताब में बेहद सरल ढंग से और प्रवाह के साथ कैलास मानसरोवर की यात्रा का वर्णन किया गया। लेखक अब भले ही दिल्ली में बस गए हों, लेकिन बचपन काशी में बीता। इसलिए इस यात्रा में काशी और कैलास के बीच के रिश्ते भी नए ढंग से खुलते चले जाते हैं। काशी को शिव की नगरी भी कहते हैं। कैलास शिव का वास है।
विज्ञापन
विज्ञापन


सवाल यह है कि शिव अगर कैलास पर रहते हैं तो काशी में क्या करते हैं? कैलास यानी साक्षात स्वर्ग और काशी, जहां मात्र मरने से स्वर्ग के दरवाजे खुल जाते हैं। कहते हैं, शिव या तो कैलास में रहते हैं, या फिर श्मशान में और काशी तो महाश्मशान है। दोनों के मूल में यही रिश्ता है। इसी रिश्ते को अपने साथ लेकर, कई तरह की कथाओं को सुनाती, कई तरह के बेहतरीन दृश्यों को साझा कराती और कई तरह के जोखिम से चेताती हुई यह किताब आपको विवश कर देती है कि एक पन्ना उलटाओगे तो पूरा करना ही पड़ेगा। लेखक ने यह यात्रा नेपाल के रास्ते से हेलीकॉप्टर और लेंडक्रूजर गाड़ी के माध्यम से की थी। कैलास पर्वत पर जाने के क्रम में चीन सीमा से भी लंबी यात्रा करनी होती है। किताब का हर एक पन्ना एक नई संस्कृति को आपके सामने रखता है। वहां की संस्कृति और पथरीले वीरान नेपाली-तिब्बती गांवों में 'शिव' की मौजूदगी आपको आश्चर्य से भर देती है।


कई हजार फीट की ऊंचाई पर दो घाटियों के बीच बर्फ की सफेद चादर से ढकी पर्वत श्रृंखला कैलास और फिर मानसरोवर तक की हजारों साल पुरानी इस यात्रा से न जाने कितनी तरह की आस्थाएं, कथाएं, दंतकथाएं, डरावनी चर्चाएं, राजनीतिक बहसें जुड़ी हुई हैं। सबकी सुनी हुई और कही हुई, बाते हैं, फिर भी हर किसी को नया लगता है कैलास और अपने लगते हैं शिव, तो इसके पीछे बहुत महीन और नाजुक धागों में गुंथी हुई अपनी संस्कृति है, जिसमें यदि हम मिथक को यथार्थ से, पौराणिक कथाओं को दैनिक चर्चाओं से जरा भी अलग करके देखते हैं तो समूचा ताना-बाना टूटने लगता है। यही अपनी ताकत भी है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed