जरा अपने गिरेबान में...

तवलीन सिंह Updated Sat, 01 Dec 2012 10:19 PM IST
journalist just peep introspect
वह भी जमाना था, जब दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कहा जाता था कि किसी पत्रकार को खरीदने के लिए एक बोतल स्कॉच व्हिस्की काफी है। क्या आज का जमाना है, जब बातें होती हैं 100 करोड़ रुपयों की। कैसे आया यह महा परिवर्तन और क्या वास्तव में आज पत्रकार अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर शक्तिशाली लोगों पर एक किस्म का माफिया राज चला रहे हैं?

अभी तक तो ऐसी बातों को हिंदी फिल्मों में ही दर्शाया गया था और मेरे जैसे लोगों ने इसे यथार्थ कभी नहीं समझा। इतना विश्वास था भारतीय पत्रकारों पर। लेकिन अगर जी टीवी के पत्रकारों पर लगा आरोप सही साबित होता है, तो स्वीकार करना पड़ेगा कि कुछ गंभीर किस्म की खराबी आ गई है पत्रकारिता में।

स्थिति अजीब है। एक तरफ तो निजी टीवी चैनलों के आने के बाद भारत के आम आदमी के जीवन में बदलाव क्रांति की तरह आया है। टीवी के फैलने से पहले ऐसे कई ग्रामीण क्षेत्र थे इस देश में, जहां गांवों में रहनेवाले लोग शहरों के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे और न ही उनके जीवन में 21 वीं सदी का असर दिखता था। सेलफोन और टीवी के आने से सब बदल गया।

दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में दिखता है टीवी का असर लोगों के लिबास में, उनकी बदली हुई आदतों में, उनके रहन-सहन में। आधुनिकता का ग्रामीण भारत में आना अच्छी बात है, लेकिन दूसरी तरफ यह भी सही है कि निजी टीवी चैनलों के आने से एक गहरी खोट आ गई है भारतीय पत्रकारिता में, जिसका परिणाम भविष्य में बहुत बुरा हो सकता है। इसे जड़ों से उखाड़ना है, तो पहले हम पत्रकारों को मानना पड़ेगा कि खोट है। पर जब से जी टीवी के दो पत्रकार गिरफ्तार हुए हैं, ज्यादातर सुर्खियों में आप पढ़ेंगे कि गिरफ्तारियां गलत थीं और नवीन जिंदल ने अपनी दौलत और राजनीतिक ताकत का सहारा लेकर जी टीवी पर झूठे इलजाम लगाए हैं।

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के पक्ष में कहा जा रहा है कि वे जिंदल समूह के गलत कारनामों पर रोशनी डालने की कोशिश कर रहे थे, जब इस कंपनी के अफसरों ने उनको चुप कराने के लिए रिश्वत देने की पेशकश की। सवाल यह है कि अगर जी टीवी के पत्रकार जिंदल के अफसरों को फंसाना ही चाहते थे, तो उन्होंने अपने चैनल पर वह वीडियो क्यों नहीं दिखाया, जिसमें रिश्वत की बातें हुई थीं?

अगर वास्तव में जिंदल साहब की तरफ से कोशिश हो रही थी कोयला घोटाले की खबरें दबाने की, तो जी टीवी को तो बहुत बड़ी स्टोरी हासिल हुई थी। जी टीवी ने उसे दिखाया क्यों नहीं? सवाल और भी हैं, लेकिन उनको पूछना बेमतलब समझती हूं मैं, क्योंकि ज्यादा जरूरी है कि हम उस खोट की बातें करें, जो भारतीय पत्रकारों में रोग की तरह फैल रही है। मुझे इस खोट का अनुभव पहली बार कोई 10 वर्ष पहले हुआ, जब किसी मुख्यमंत्री ने मुझे बताया कि एक मशहूर टीवी पत्रकार ने उनसे रिश्वत मांगी थी।

मुख्यमंत्री के पुराने दोस्त थे पत्रकार महाशय और उनके निजी जीवन के कई अहम राज जानते थे, सो सौदा उन राज को लेकर हुआ था। मुख्यमंत्री ने मुझे बताया कि उनके पूर्व दोस्त ने उनको इन शब्दों में धमकी दी, 'देखो भाई, अगर आप हमें 10 करोड़ रुपये नहीं दे सकते हो, तो हमें मजबूर होकर उन सारी बातों के बारे में स्टोरी करनी होगी, जिनको लेकर हम अभी तक चुप रहे हैं।'

उस समय मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था मुख्यमंत्री की बातों पर यकीन करना, लेकिन फिर इस तरह की कई कहानियां सुनने को मिलने लग गईं। मालूम पड़ा कि कुछ टीवी चैनलों ने राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों के साथ चुनाव के दौरान अच्छी खबरें देने के सौदे कर रखे थे। यह रिश्वत मांगने का रोग टीवी से लेकर अखबारों तक फैल गया तेजी से और इस तरह कि सौदे अखबारों के साथ भी होने लगे। स्थिति आज यह है कि कुछ अखबारों में अब एक घटिया किस्म की नई परंपरा बन गई है, जिसको अंगरेजी में 'पेड न्यूज' कहा जाता है। यानी अगर आपके पास धन-दौलत की कोई कमी न हो, तो आप पैसा देकर अपने बारे में अच्छी खबरें छपवा सकते हैं। पत्रकारों के नाम पर एक किस्म का माफिया राज चल रहा है।

इन सारी बातों को ध्यान में रखकर देखना चाहिए जी के पत्रकारों की गिरफ्तारी को। बेशक, यह मामला अभी अदालत में है और अभी उन्हें दोषी नहीं करार दिया गया है, लेकिन मामला कुछ रहस्यमय जरूर है। स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब दोनों पत्रकार यह स्पष्ट करें कि अगर सिर्फ स्टोरी करने के मकसद से वे जिंदल के अफसरों से मिलने गए थे।

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