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जीवन धारा: जिससे बच नहीं सकते, उसकी निंदा नीति के विरुद्ध; जब तक भ्रम है तभी तक संसार है

Tue, 20 Feb 2024 07:38 AM IST
जलज मिश्रा प्रतापनारायण मिश्र
प्रतापनारायण मिश्र Published by: जलज मिश्रा Updated Tue, 20 Feb 2024 07:38 AM IST
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सार

साधारणत: जो धोखा खाता है, वह अपना कुछ न कुछ गंवा बैठता है, और जो धोखा देता है, उसकी एक न एक दिन कलई खुले बिना नहीं रहती है।  हानि सहना व प्रतिष्ठा खोना, दोनों बातें बुरी हैं।

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Jeevan Dhara Illusion in human life inspiration from mythology for peaceful and happy life
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

धोखा-इन दो अक्षरों में भी न जाने कितनी शक्ति है कि इनकी लपेट से बचना यदि निरा असंभव न हो, तो भी महाकठिन तो अवश्य है। जब भगवान रामचंद्र ने मारीच राक्षस को सुवर्णमृग समझ लिया था, तो हमारा आपका क्या सामर्थ्य है, जो धोखा न खाएं। इस रीति से यदि हम कहें कि ईश्वर भी धोखे से अलग नहीं है, तो गलत नहीं होगा, क्योंकि ऐसी दशा में यदि वह धोखा खाता नहीं, तो धोखे से काम अवश्य लेता है, जिसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि माया का प्रपंच फैलाता है।

वेदांती लोग जगत को मिथ्या, भ्रम समझते हैं, यहां तक कि एक महात्मा ने किसी जिज्ञासु को भली-भांति समझा दिया था कि विश्व में जो कुछ है, और जो कुछ होता है, सब भ्रम है। किंतु यह समझाने के कुछ ही दिन उपरांत उनके किसी प्रिय व्यक्ति का प्राणांत हो गया, जिसके शोक में वे फूट-फूटकर रोने लगे। इस पर शिष्य ने आश्चर्य में आकर पूछा कि आप तो सब बातों को भ्रमात्मक मानते हैं, फिर रोते क्यों हैं? इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि रोना भी भ्रम ही है। सच है! भ्रमोत्पादक भ्रमस्वरूप भगवान के बनाए हुए भव (संसार) में जो कुछ है, भ्रम ही है। जब तक भ्रम है, तभी तक संसार है।

लोक और परलोक का मजा भी धोखे ही में पड़े रहने से प्राप्त होता है। बहुत ज्ञान छांटना सत्यानाश की जड़ है! ज्ञान की दृष्टि से देखें, तो आपका शरीर मल-मूत्र-मांस-मज्जादि घृणास्पद पदार्थों का विकार मात्र है, पर हम उसे प्रीति का पात्र समझते हैं और दर्शन-स्पर्श-आदि से आनंदलाभ करते हैं। विचार करके देखिए, तो धन-जन इत्यादि पर किसी का कोई स्वत्व नहीं है, इस क्षण वे हमारे काम आ रहे हैं, क्षण ही भर के उपरांत न जाने किसके हाथ में या किस दशा में पड़कर हमारे पक्ष में कैसे हो जाएं, और मान भी लें कि इनका वियोग कभी न होगा, तो भी हमें क्या? आखिर एक दिन मरना है, पर यदि हम ऐसा समझकर सबसे संबंध तोड़ दें, तो सारी पूंजी गंवाकर निरे मूर्ख कहलाएंगे।

जब तक घड़ी के सब पुर्जे दुरुस्त हैं, और ठीक-ठीक लगे हुए हैं, तभी तक उसमें खट-खट, टन-टन की आवाज आ रही है, जहां उसके पुर्जों का लगाव बिगड़ा, वहीं न उसकी गति है, न शब्द है। ऐसे ही शरीर का क्रम जब तक ठीक-ठीक बना हुआ है, मुख से शब्द और मन से भाव तथा इंद्रियों से कर्म का प्राकट्य होता रहता है, जहां इसके क्रम में व्यतिक्रम हुआ, वहीं सब खेल बिगड़ गया, बस फिर कुछ नहीं, कैसा जीव! कैसी आत्मा! जब सब कुछ धोखा ही धोखा है, और धोखे से अलग रहना ईश्वर के भी सामर्थ्य से दूर है, तथा धोखे ही के कारण संसार का चरखा पिन्न-पिन्न चला जाता है, तो फिर इस शब्द का स्मरण या श्रवण करते ही आपकी नाक-भौंह क्यों सिकुड़ जाती हैं? इसके उत्तर में हम तो यही कहेंगे कि साधारणत: जो धोखा खाता है, वह अपना कुछ न कुछ गंवा बैठता है, और जो धोखा देता है, उसकी एक न एक दिन कलई खुले बिना नहीं रहती है, और हानि सहना व प्रतिष्ठा खोना, दोनों बातें बुरी हैं, जो बहुधा इसके संबंध में हो ही जाती हैं।

भवसागर संसार...
साधारण श्रेणी के लोग धोखे को अच्छा नहीं समझते; यद्यपि उससे बच नहीं सकते, क्योंकि जैसे काजल की कोठरी में रहने वाला बेदाग नहीं रह सकता, वैसे ही भ्रमात्मक भवसागर में रहनेवाले अल्पसामर्थी जीव का भ्रम से सर्वथा बचे रहना असंभव है, और जो जिससे बच नहीं सकता, उसकी निंदा करना नीति विरुद्ध है।

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