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विश्वविद्यालयों में राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप, सही या गलत!

Sun, 06 Mar 2016 08:28 AM IST
राहुल सांकृत्यायन/ अमर उजाला, नई दिल्ली
राहुल सांकृत्यायन/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 06 Mar 2016 08:28 AM IST
सार

  • हर विश्वविद्यालय बन रहा है राजनीति का केंद्र
  • छात्र संघ केवल नाम के लिए छात्रों का 
  • आखिर छात्रों की राजनीति में सरकारी कर्मकाण्ड क्यो?

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जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय

विस्तार

इन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय गलत कारणों से चर्चा में है। आरोप है कि वहां के कुछ छात्रों ने संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी वाले दिन पर सांस्कृतिक संध्या के नाम पर मुल्क विरोधी नारे लगाए। इस मामले का वीडियो सामने आते ही हर ओर खबर फैल गई। अब तक करीब 3 वीडियो आ चुके हैं और क्या पता लेख के आप तक पहुंचने के दौरान दो-चार और आ जाए।

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आरोप है कि जिन छात्रों ने कथित सांस्कृतिक संध्या में हिस्सा लिया वो वामपंथी विचारधारा और उससे जुड़े हुए दल के थे। इस मामले में जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया को राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर 3 दिन की पुलिस कस्टडी में भेज गया था जिसे पहले 5 दिन किया गया फिर उसे 2 मार्च तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। इन सब के बीच कुछ लोगों ने इस बात की आशंका जाहिर की है कि जिन्होंने उस सांस्कृतिक संध्या में हिस्सा लिया वो जेएनयू के बाहर के थे। इनका यह भी मानना है कि आने वाले बजट सत्र में केंद्र सरकार के पास विपक्ष के खिलाफ, खास तौर से वाम दल के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं था और वो रोहित वेमुला के साथ-साथ अन्य कई मुद्दों पर विपक्ष के निशाने पर आ सकते थे इसलिए ये काम उनके इशारे पर भी हो सकता है। बात यहां तक पहुंच गई कि ट्विटर पर शट डाउन जेएनयू ट्रेंड करने लगा। न्यूज चैनल के स्टूडियो में गरमा गरम बहस शुरु हो गई और अखबारों की लीड खबर भी बन गई।
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खैर, ये तो होना ही था। इसी क्रम में आइए हम कुछ और भी चर्चा कर लेते हैं। एक बात समझ के परे है कि हमारे विश्वविद्यालय राजनीतिक दलों के अखाड़े क्यों बनते चले जा रहे हैं? सत्ता पक्ष और विपक्ष क्यों शिक्षण संस्थानों की ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं? माना कि विश्विविद्यालयों में छात्र राजनीति होती है, तो वो उन्हें करने दीजिए। जब छात्रों के किसी मामले में सरकारें पार्टी बन कर उभरती हैं तो वही होता है जो बीते कुछ दिनों से जेएनयू में हो रहा है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय समेत तमाम उच्च शिक्षा के संस्थानों में। सच कहें तो अब यहां पढ़ाई लिखाई नहीं होती।
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सरकारें फेलोशिप को बंद करने की बात तो करती हैं लेकिन शोध की गुणवत्ता केवल भाषणों में ही बढ़ाती हैं। बीते 10 साल से इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह नहीं हुआ है। छात्र संघ अध्यक्ष ऋचा सिंह को विश्वविद्यालय में महंत आदित्यनाथ का प्रवेश करना गवारा नहीं है और इसी छात्र संघ के उन पदाधिकारियों को सपा नेताओं के प्रवेश पर आपत्ति है जो एबीवीपी से जुड़े हुए हैं। विश्वविद्यालय अमूमन अपना सालाना बजट लैप्स कर देता है, जिसकी वजह से आगे मिलने वाली ग्रांट पर भी खतरा मंडराने लगता है। ऐसा क्यों है कि कभी भी किसी राजनीतिक दल के नेता ने इन सब मुद्दों पर अपनी राय बेबाकी से दर्ज नहीं कराई?

छात्र संघ नेता जिनकी जिम्मेदारी बनती है कि परिसर के माहौल को बदनुमा न होने दें, लेकिन वो अपने पार्टी लाइन वाले नेता के साथ सेल्फी और ठेके- पट्टे की चर्चा में व्यस्त हैं। मुझे याद है कि मेरे एक मित्र को इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री में नाम में छोटा सा बदलाव करना है, उसके लिए वो बीते 3 साल से इंतजार कर रहा है कि कब जून जुलाई आए क्योंकि विश्वविद्यालय के 'बाबू' उसे हर बार जून जुलाई के बाद आने को कहते हैं।

जिस बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बीते दिनों मार्च पास्ट किया वहां की गुणवत्ता भी अब क्षीण होती जा रही है। आप ये सोच रहे होंगे कि मैंने मार्च पास्ट का जिक्र क्यों किया, वो इसलिए क्योंकि यही मार्च पास्ट किसी अन्य विश्वविद्यालय में किसी और ने किया होता तो शायद अब तक भारतीय जनता पार्टी ने अपने हवाई फायर शुरु कर दिए होते और क्या पता कि दो चार अनुशासनहीनता में सस्पेंड भी हो जाते।

बीएचयू से गेस्ट लेक्चरर संदीप पाण्डेय को नक्सली सोच का बता कर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अपने इस कृत्य पर विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर गिरीश चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि उन्होंने देश बांटने वाले लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। लोगों ने चंद दिनों तक इसको चर्चा का विषय बनाए रखा और फिर वही भूल गए, लेकिन किसी ने ये पूछने की जहमत नहीं उठाई कि आप के वीसी बनने के बाद कैंपस में क्या नया हुआ?

समस्या ये है कि हमारी सरकारों को एएमयू और जामिया के अल्पसंख्यक दर्जे पर आपत्ति है लेकिन ये कोई नहीं पूछने वाला है कि लाइब्रेरी में इस साल किताबे नई आई या नहीं? छात्रों को डिग्रियां लेने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है लेकिन इस ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता? अभी हाल ही में एएमयू में किसी पदाधिकारी की गिरफ्तारी पर खासा बवाल हुआ है। आखिर ये सब क्यों और किस लिए? वाकई कभी-कभी ऐसा लगता है कि छात्र विश्वविद्यालयों में पढ़ने नहीं जाते बल्कि आरएएफ और खाकी वर्दी की मार खाने जाते हैं। हमारे आधे से ज्यादा विश्वविद्यालय छावनी बन चुके हैं। आए दिन कुछ न कुछ होता रहता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता जो मिसाल बन सके। 

जेएनयू में जो हुआ वो दुःखद है, जो हो रहा है वो सरकारी कर्मकाण्ड का फल और जो होगा वो तो आप देखिएगा ही। भाजपा और अन्य दल जिस तरह से इस मुद्दे पर लड़ रहे हैं उससे ये साफ जाहिर होता है कि उन्हें विश्वविद्यालय, उसमें पढ़ने वाले छात्र और उसकी गरिमा से कोई लेना देना नहीं है। राहुल, येचुरी, साध्वी प्राची, अमित शाह, अरविंद केजरीवाल सरीखे और भी लीडर केवल राजनीति कर रहे हैं। इन्हीं लीडरो पर लिखा मुनव्वर राणा का एक शेर अर्ज है-


लहू कैसे बहाया जाए ये लीडर बताते हैं,
लहू का जायका कैसा है ये खादी बताती है।

खैर, उम्मीद है कि जेएनयू का ये मामला जल्द सुलझ जाएगा। गंदी राजनीति हमारे विश्वविद्यालयों के परिसर के बाहर होगी और छात्र नेता पार्टी लाइन के बड़े नेताओं के साथ सेल्फी छोड़ हॉस्टलों के बिजली,पानी और मेस पर ध्यान देंगे।

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