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राह से भटकता एक आंदोलन
सत्यजीत चौधरी
Updated Wed, 15 May 2013 03:09 PM IST
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अब यह समझना मुश्किल है कि जाट ज्यादा भोले हैं या आरक्षण के मुद्दे पर उनका कथित नेतृत्व कर रहे नेता और सरकारें ज्यादा चालाक। आजाद भारत के इतिहास में इतना भटका, बिखरा और संदेहों से भरा कोई आंदोलन नहीं हुआ है।
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इस आंदोलन का दुखद पहलू है, इसका कोई असली नेतृत्व न होना। लगातार पैदा हो रहे नेता आंदोलन की ताकत बांट रहे हैं। पर्दे के पीछे चल रहीं दुरभिसंधियां आंदोलन की रीढ़ पर सतत वार कर रही हैं।
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जाट आरक्षण की मांग को लेकर ढेरों नेता मैदान में हैं। दो-तीन बड़े संगठनों जैसे अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति (पार्ट वन और पार्ट टू) और संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में ढेरों जाट संगठन उग आए हैं।
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हद तो यह है कि हाल में ही दिल्ली स्थित मावलंकर हॉल में अखिल भारतीय जाट महासम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के अलावा हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी शिरकत की।
हरियाणा और पंजाब के कई पूर्व और मौजूदा मंत्री सम्मेलन में मौजूद थे। इस दौरान समुदाय के नेताओं ने आरक्षण की लड़ाई को धार देने के लिए आंदोलन की कमान तेज-तर्रार नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय सिंह को सौंपने का निर्णय लिया। यानी आरक्षण के मुद्दे पर एक और जाट नेता का उदय।
दरअसल जाट आरक्षण आंदोलन की बासी-सी हो चली कढ़ी में एक बार फिर उबाल लाने की कोशिश की जा रही है। इस आंदोनल का स्वरूप शुरू से ही उग्र रहा है। कभी दिल्ली को पानी की सप्लाई रोककर, तो कभी निषेध को तोड़कर कांग्रेस अध्यक्ष के आवास की तरफ कूच कर जाट नेता लगातार आक्रामक तेवर दिखाते रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं जाट एक जुझारू कौम है।
देश के लिए उनकी सेवाएं, बलिदान और शौर्य गाथाओं का जब-तब जिक्र भी होता है, लेकिन जब बात हक-हिस्से की आती है, तो इन धरती पुत्रों को हाशिये पर डाल दिया जाता है। आजादी के बाद से लगातार ऐसा हो रहा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति लाने की जिम्मेदारी हो या हरियाणा में हरियाली का वाहक बनने का दायित्व, इस कौम ने जान लड़ा दी। राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जहां-जहां ये बिरादरी आबाद है, देश और समाज को अपना सर्वोच्च दे रही है। जाट पिछले कई वर्षों से आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं।
ओबीसी कोटे के तहत वे सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं, लेकिन उनकी इस जायज मांग को केंद्र और राज्यों की सरकारें बड़ी चालाकी से टालती आ रही हैं।
दरअसल देखा जाए, तो जाटों की इस मांग का राजनीतिक दलों ने इस्तेमाल ही किया है। पिछले साल विधानसभा चुनाव से ऐन पहले बसपा प्रमुख मायावती में जाटों का दर्द जागा और उन्होंने केंद्र से जाटों को आरक्षण देने की मांग कर डाली।
चुनाव हुआ और उनकी पार्टी सत्ता से बेदखल हो गई। अब भला क्यों मायावती जाटों की बात करेंगी! यही हाल दीगर पार्टियों का है। दूसरी बड़ी बात यह है कि जाटों के पास इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए कोई स्वाभाविक नेता नहीं है। बड़े जाट नेता हमेशा आरक्षण के मुद्दे से खुद को अलग रखते रहे हैं।
दिवंगत महेंद्र सिंह टिकैत की पूरी राजनीति किसान और गन्ने तक सिमटी रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता चौधरी अजित सिंह खुद को जाट नेता कहलाने के बजाय राष्ट्रीय नेता के रूप में देखना ज्यादा पसंद करते हैं।
सच्चाई तो यह है कि एकता को दरकिनार कर जाट वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। कई जाट नेताओं की मंशा आरक्षण पाने की चाह कम और आंदोलन लंबा खींचने की ज्यादा दिख रही है। मिसाल के तौर पर, अब मुस्लिम जाटों को आरक्षण देने पर भी जोर दिया जा रहा है, जबकि सर्वविदित है कि सरकार ऐसा करके मधुमक्खी के छत्ते छेड़ने जैसा काम कतई नहीं करेगी।
दरअसल जाट नेताओं को लग रहा है मिशन-2014 के तहत केंद्र जाटों के लिए आरक्षण का ऐलान कर सकता है। जाट नेतृत्व में मौजूदा अफरा-तफरी इसी गफलत का नतीजा है। कुल मिलाकर जाट आंदोलन तारीखों, चेतावनियों, अल्टीमेटमों और आश्वासनों के भंवर में घूम रहा है। निर्रथक और दिशाहीन।