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बढ़ते दबाव में पिछड़ती एक योजना
Updated Wed, 13 Mar 2013 10:43 PM IST
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देश में मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के उद्देश्य से 2005 में जननी सुरक्षा जैसी महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कुछ वर्ष पहले हुए सर्वेक्षण बताते हैं कि इस योजना से मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी आई है।
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चूंकि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में प्रसव कराने पर सहायता राशि मिलती है, इस कारण निजी अस्पतालों में प्रसव के मामले भी बहुत घटे हैं। इस योजना का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पैसे के कारण ही सही, लेकिन समाज के निम्न वर्ग में भी सुरक्षित प्रसव कराने के मामले में जागरूकता फैली है। पहले गरीब तबके के बच्चे गांवों में दाइयों के भरोसे पैदा होते थे, अब यह स्थिति बदल रही है।
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लेकिन इसका दुष्प्रभाव यह है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में दबाव बढ़ रहा है, नतीजतन सुविधा और सुरक्षा के साथ समझौता किया जा रहा है। बढ़ती जरूरतों के अनुकूल चिकित्सा सुविधाओं तथा डॉक्टरों व नर्सों की संख्या में वृद्धि नहीं हो सकी है।
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सरकारी प्रचार-प्रसार और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रयासों से बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाएं बच्चों के जन्म के लिए वहां पहुंचने तो लगी हैं, पर समुचित सुविधाएं न होने के कारण उन्हें सही चिकित्सा नहीं मिल पा रही। कभी-कभी एक ही बेड पर दो महिलाओं को रहने को कहा जा रहा है।
कई बार बच्चे के जन्म के समय थोड़ी-बहुत जटिलता उत्पन्न होने पर स्वास्थ्य केंद्र में जरूरी उपचार उपलब्ध नहीं होते। अतः अफरातफरी में उसे जिला अस्पताल या शहर के अस्पताल में ले जाने के लिए कहा जाता है। पर सड़क व यातायात की हालत देखते हुए इस स्थिति में गर्भवती महिला को आगे वहां ले जाना ही कठिन हो जाता है, विशेषकर यदि वह निर्धन परिवार से हो।
हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए विशेष एंबुलेंस की व्यवस्था की है, लेकिन योजना में कुछ व्यावहारिक कमियों के कारण इस सुविधा का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा।
स्थान और सुविधाओं के अभाव में प्रसव के बाद शीघ्र ही जच्चे-बच्चे को डिस्चार्ज कर दिया जाता है, जबकि वैसी स्थिति में 24 से 48 घंटे तक अस्पताल में डॉक्टर की लगातार निगरानी में रहना जरूरी है। साफ शौचालय जैसी जरूरी सुविधा तक उपलब्ध न होने के कारण परिवार वाले भी शीघ्र मां-बच्चे को वापस घर ले जाने की जल्दी में होते हैं।
आनन-फानन में दूर के गांव में ले जाने के बाद रक्तस्राव जैसी समस्या मां को उत्पन्न होती है, तो उसका जीवन बचाना कठिन हो जाता है। आरंभिक देख-रेख की कमी से बच्चे का जीवन भी खतरे में पड़ सकता है।
आंगनवाड़ी के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को कुपोषण से बचाने का प्रयास तो चल रहा है, लेकिन अधिकांश स्थानों पर आंगनवाड़ी ठीक से न चलने के कारण निर्धन गर्भवती महिलाओं में पोषण की कमी रह जाती है। हाल ही में नियुक्त आशा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने कम साधनों में अनेक स्थानों पर अच्छा कार्य किया है, पर उनके प्रति न्यायसंगत व्यवहार न होने के कारण वे भी अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहीं।
स्वास्थ्य केंद्रों में शिशु जन्म के बाद आर्थिक प्रोत्साहन राशि मिलती है, पर इसका एक बड़ा भाग किसी न किसी बहाने परिवार से वापस ले लिया जाता है, जो अनुचित है।
इन तमाम कमियों को दूर किया जाए और जननी सुरक्षा योजना में व्यापक जन भागीदारी हो, तो बेहतर परिणाम मिलेंगे। विशेषकर प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और अन्य सहूलियतें उपलब्ध करवाना बहुत जरूरी है।
हाल ही में कानपुर देहात के रसूलाबाद ब्लॉक में क्रियान्वित एक सफल परियोजना में यह संभावना भी उत्पन्न हुई है कि यदि आशा कार्यकर्ताओं को बच्चे के जन्म के बाद के समय में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं की गंभीरता को समय पर पहचानने और संभालने का प्रशिक्षण बेहतर ढंग से मिल जाए, तो इलाज के लिए मां-बच्चे को समय पर स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में लाया जा सकता है।
पर इसके लिए जरूरी है कि व्यापक तौर पर कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जाए। जिस विराट उद्देश्य के साथ यह योजना शुरू हुई थी, उसे उसके सफल अंजाम तक पहुंचाने के लिए ईमानदारी और पारदर्शिता बहुत जरूरी है।