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गांवों से पलायन में निरंतर वृद्धि से बढ़ी सरकार की चिंता, चलाया ‘बैक टु विलेज’ कार्यक्रम

Wed, 28 Aug 2019 02:21 AM IST
गोविंद सिंह गोविंद सिंह
गोविंद सिंह Published by: गोविंद सिंह Updated Wed, 28 Aug 2019 02:21 AM IST
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Jammu and Kashmir: Let's go to the village
- फोटो : PTI

गांवों को हमने हमेशा भारत की सभ्यता-संस्कृति का केंद्र समझा। इसमें कोई दो राय नहीं कि वे आज भी भारतीय संस्कृति के वाहक हैं। लेकिन आजादी के बाद उनकी लगातार उपेक्षा होती रही है। शहर की तुलना में गांवों की सुख-सुविधाएं लगातार कम होती रहीं। नतीजा यह रहा कि आज गांव खाली हो रहे हैं। पूरे देश के रुझान बताते हैं कि गांवों से पलायन में निरंतर वृद्धि हो रही है। जबकि शहरों को संभालना दुष्कर होता जा रहा है।


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इसी समस्या के मद्देनजर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने जून के अंतिम सप्ताह में ‘बैक टु विलेज’ यानी एक बार फिर गांव की ओर नाम से एक नायाब कार्यक्रम चलाया। ऐसा नहीं कि इस तरह के कार्यक्रम पहले कहीं नहीं हुए। उत्तराखंड में कुछ साल पहले ‘हिटो पहाड़’ नाम से ऐसा ही कार्यक्रम चलाया गया था। चौधरी देवीलाल ने ‘पचास प्रतिशत बजट गांवों को’ नाम से अभियान चलाया था। चौधरी चरण सिंह ने भी अपने जमाने में उत्तर प्रदेश में कुछ योजनाएं गांवों को मजबूत करने के लिए चलाई थीं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इसे भाषणों से बाहर निकाल कर सचमुच अंजाम देने की कवायद हुई।

20-27 जून के बीच राज्य की 4,500 पंचायतों ने एक अभूतपूर्व दृश्य देखा। हर पंचायत में सरकार के नुमाइंदे के तौर पर एक वरिष्ठ अधिकारी (उप निदेशक से लेकर प्रमुख सचिव तक) ने न सिर्फ दस्तक दी, अपितु तीन दिन दो रातें वहां बिता कर महसूस किया कि गांव की समस्याएं वास्तव में हैं क्या? इस दौरान प्रत्येक अफसर को एक बुकलेट दी गई, जिसमें उनकी दिनचर्या थी, उन्हें एक सर्वे करने को कहा गया कि गांव की क्या-क्या मुश्किलें हैं, उनकी तात्कालिक और स्थायी जरूरतें क्या हैं। उन्हें ग्रामीणों के साथ बैठकें करनी थीं।

सरकारी परियोजनाओं की साइट पर जाकर तस्दीक करनी थी। स्कूलों का दौरा करना था। इस बीच वहां कुछ क्रीड़ा प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं। आतंकवाद पीड़ित गांवों में जाकर ऐसे परिवारों का हाल जाना गया, जिनके बच्चे किसी न किसी कारण से मारे गए थे।

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