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जगमोहन: जम्मू-कश्मीर के सच्चे हितैषी
Fri, 07 May 2021 05:28 AM IST
प्रो. रसाल सिंह
रसाल सिंह
रसाल सिंह
Published by: प्रो. रसाल सिंह
Updated Fri, 07 May 2021 05:28 AM IST
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Jagmohan Malhotra
जगमोहन (मल्होत्रा) जी का एक ईमानदार राजनेता और कुशल प्रशासक के रूप में स्वातंत्र्योत्तर भारत के सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 94 साल की तमाम उपलब्धियों वाली जिंदगी जीने वाले जगमोहन की छवि सख्त और दूरदर्शी फैसले लेने और उनका सुचारु और समयबद्ध कार्यान्वयन कराने वाले कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति की रही है। 25 सितंबर, 1927 को अविभाजित पंजाब के हाफिजाबाद में जन्मे जगमोहन ने भारत विभाजन के दर्दनाक दृश्य अपनी आंखों से देखे थे। भारत-विभाजन और उससे पैदा होने वाले विस्थापन ने न सिर्फ उन्हें सेक्युलरिज्म के खोल में भारत में पनपी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के प्रति सजग किया, बल्कि इसके खिलाफ मुखर होने का साहस और इसके संतुलन के लिए काम करने की समझ भी दी।
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प्रतिष्ठित भारतीय प्रशासनिक सेवा से अपने शानदार करिअर की शुरुआत करने वाले जगमोहन ने सातवें दशक में दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के रूप में अपनी कार्यशैली से प्रभावित किया। बहुत जल्द वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लाड़ले बेटे संजय गांधी के निकट आ गए। आपातकाल के दौरान वह दिल्ली के उपराज्यपाल थे। उस समय दिल्ली में झुग्गी बस्तियों को हटाने और 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों और गुट-निरपेक्ष सम्मेलन के शानदार आयोजन का श्रेय जगमोहन को जाता है। दिल्ली के सौंदर्यीकरण के दौरान उन्हें अवैध रूप से बसाई गई झुग्गी बस्तियों को हटाने में भारी विरोध का भी सामना करना पड़ा था।
जब नौवें दशक में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद पनप रहा था, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें राज्यपाल बनाकर जम्मू-कश्मीर भेजा, उन्होंने आतंकवाद को अपरोक्ष रूप से शह दे रही अलगाववादी शक्तियों की नकेल कसना शुरू किया। वह जम्मू-कश्मीर आते ही इस बात को समझ गए थे कि आतंकवाद और अलगाववाद की जड़ वहां सक्रिय क्षेत्रीय दल हैं। उन्होंने इस गठजोड़ को काफी हद तक तोड़ डाला था। प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी उन्हें दुबारा जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया। हालांकि, उनका यह कार्यकाल अल्पकालीन ही रहा, क्योंकि तत्कालीन रामो-वामो की कमजोर गठबंधन की सरकार थी। 26 जनवरी 1990 को श्रीनगर में आजादी मनाने के अलगाववादियों-आतंकवादियों के मंसूबों को विफल करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। उन्होंने जम्मू और लद्दाख संभाग के साथ होने वाले भेदभाव और जम्मू-कश्मीर की राजनीति में कश्मीरियों और मुसलमानों के वर्चस्व को संतुलित करने की कोशिश की।
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में उन्होंने श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की स्थापना करके श्रद्धालुओं के चढ़ावे के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित की। उन्होंने वैष्णो देवी यात्रा और अमरनाथ यात्रा को विकसित, व्यवस्थित और सुविधाजनक भी बनाया। जगमोहन का दृढ़ विश्वास था कि अनुच्छेद 370 राष्ट्रीय एकीकरण की सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने इसे 'अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधान' मानते हुए जल्द-से-जल्द समाप्त करने की बात खुलकर की। भारत सरकार ने पांच अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 और 35 ए की समाप्ति करके जगमोहन के विचारों की पुष्टि कर दी और भारत के एकीकरण की परियोजना को पूरा कर दिया।
वह कम-से-कम चार प्रधानमंत्रियों के पसंदीदा ‘टफ टास्क मास्टर’ थे। उनकी कार्यशैली ने उनके जितने विरोधी तैयार किए, उससे कहीं ज्यादा प्रशंसक भी बनाए। संघ के आग्रह पर वह भाजपा में शामिल हो गए और नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से तीन बार (1996,98,99) निर्वाचित हुए। इससे पहले वह 1990 में राज्यसभा के लिए चुने गए थे। वाजपेयी सरकार में वह शहरी विकास, संचार और पर्यटन मंत्री रहे। ईमानदार राजनेताओं और कुशल और कर्तव्यनिष्ठ प्रशासकों की इस अकाल-बेला में ‘काम को ही पूजा’ मानने वाले जगमोहन युवा पीढ़ी के आदर्श बने रहेंगे।
- जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता, छात्र कल्याण हैं