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जब पंगत की रंगत थी...

Thu, 16 May 2013 09:14 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 16 May 2013 09:14 PM IST
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jab pangat ki rangat thi

वाह! क्या सीन हुआ करते थे कभी पंगत के। पंगत में ऐसे भी लोग होते थे, जो उठने का नाम ही नहीं लेते थे, और परोसने वाले भी ऐसे होते थे, जिन्हें बैठकर खाते शायद ही किसी ने देखा हो। इनकी जुगलबंदी ही मनोरंजन का सबसे कारगर कार्यक्रम होती थी। शादी-ब्याह को कोई मौका हो, यह बात गौण हो जाती थी।

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पंगत उजाड़ने वाले जब रणभूमि में प्रवेश करते थे, तब कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि डेढ़ पसली और सोलह दांत वाला शरमाया-सकुचाया-सा यह शख्स क्या तूफान खड़ा करने वाला है। वह आते ही भिड़ता नहीं था, बल्कि ‘नहीं-नहीं’ की रणभेरी भी सबसे पहले उसी की तरफ से बजती थी।
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जब वह दो-चार हाथ से भी ज्यादा जोर से जुबान हिलाकर नहीं-नहीं उच्चारता, तो पंगत समझ जाती थी कि सतवास वाले कुंवर साब अब मूड में आ रहे हैं। इस दौरान ये लोग उतना तो भर ही लेते थे, जितना अगले दिन तक जिंदा रहने के लिए जरूरी हो।
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इसमें एक अदा तो यह होती थी कि खाते-खाते ‘नहीं-नहीं’ उगला और आधा हाथ पीछे खिसक कर बैठ गए। बस, यहीं से ये महारथी पंगत की निगाह में चढ़ जाते। खाने वाले भी हबड़-हबड़ खाने लगते थे कि सारे परोसगार अब उस एक शख्स की सेवा में लगने वाले हैं। पंगत के अज्ञानी इस चक्कर में भूखे भी रह जाते थे या फिर ‘गुलाब जामुन मिले ही नहीं’, ‘जलेबी चखी भी नहीं’ कहते थे। ऐसे लोगों का भी अलग ही संप्रदाय होता था, जो खाता कम और रोता ज्यादा है।


‘क्या कंवर साब अभी से पीछे हट लिए...! इतना खाना क्या बेकार करोगे...।’
‘गुलाब जामुन तो खाए ही नहीं...दस-पंद्रह से क्या होता है।’
‘क्या खाना जमा नहीं?’ ऐसा पूछने वाले जानते हैं कि कच्चा-पक्का भी दे दो, तो ये सूत डालें।

‘गुलाब जामुन खाओ आप तो...मेरी कसम...।’ किसी ने उकसाया और वह उकस गए। शर्त यह थी कि सिर्फ गुलाब जामुन ही खाएंगे। अब कटोरे के कटोरे खाली हो रहे हैं, मगर इस पाताल कोट पर असर ही नहीं हो रहा। पूरी पंगत हल्दीघाटी का रणक्षेत्र बन जाती है। गुलाब जामुन आते तो नजर आते हैं, मगर जाते किधर हैं, पता ही नहीं चलता। ...और अंत में आता है, वह महान दृश्य कि घराती अपनी पगड़ी कंवर साब के कदमों में रख देता है और वह विजयी उम्मीदवार फिर नाड़ा बांधता सकुचा जाता है। पंगत का एक और सुनहरा पन्ना लिख जाता है।

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