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संकट सिर्फ भारत का नहीं है
पॉल क्रुगमैन
Updated Fri, 23 Aug 2013 08:14 PM IST
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एक और ब्रिक देश मुसीबत में है। वैसे ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) की पूरी धारणा ही मुझे कभी पसंद नहीं आई। रूस मूल रूप से एक पेट्रो अर्थव्यवस्था है, जो दूसरे ब्रिक देशों से बिल्कुल अलग है। इस संगठन के बाकी तीन अन्य सदस्यों में भी भारी फर्क है। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत, ब्राजील और कई दूसरे देश इस समय एक जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
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आखिर हो क्या रहा है? यह किसी पुरानी कहानी के नए संस्करण जैसा ही कुछ है। निवेशक इन अर्थव्यवस्थाओं को काफी तवज्जो देते रहे हैं, लेकिन इस समय वे अपने पुराने प्यार की तरफ रुख कर चुके हैं। कुछ साल पहले पश्चिमी निवेशकों ने अमेरिका और यूरोप के गैर-संकटग्रस्त देशों में निवेश के मामूली रिटर्न से निराश होकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर रुख किया था। पर अब इसका उल्टा हो रहा है। नतीजतन इंडोनेशिया के रुपिया, दक्षिण अफ्रीका के रैंड, तुर्की के लीरा के साथ-साथ भारत का रुपया और ब्राजील के रिआल सहित कई अन्य देशों की मुद्रा में भारी गिरावट दिख रही है। तो क्या भाग्य के इस बदलाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है?
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मैं ऐसा नहीं सोचता। यह सही है कि निवेशकों के भरोसे में कमी और मुद्रा में गिरावट के कारण 1997-98 के दौरान एशिया में गंभीर आर्थिक संकट आया था। लेकिन उसकी एक बड़ी वजह थी कि संकटग्रस्त देशों में ज्यादातर कारोबारियों ने डॉलर में कर्ज ले रखा था, इसलिए मुद्रा में गिरावट से उनके कर्ज की रकम बढ़ गई थी, जिससे बड़ा वित्तीय संकट पैदा हुआ था।
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इस समय भी यह समस्या है, लेकिन तब की तरह गंभीर नहीं है। खतरा यह है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में इस संकट की प्रतिक्रिया जरूरत से ज्यादा हो सकती है; मसलन, उनके केंद्रीय बैंक अपनी मुद्रा को सहारा देने के लिए ब्याज दरों में तेजी से इजाफा करेंगे, जिसकी इस समय न तो उन्हें और न ही बाकी दुनिया को जरूरत है।
अभी भले ही भारत और किसी दूसरे देशों से बेहतर आर्थिक संभावनाओं वाली खबरें नहीं आ रहीं, लेकिन जब विश्व की संपन्न अर्थव्यवस्थाएं मंदी की चपेट में हैं, तब ऐसी खबर की उम्मीद शायद ही कोई कर रहा हो। परंतु इस हालिया वित्तीय उथल-पुथल से यह सवाल तो पैदा होता ही है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में इतने बुलबुले आखिर क्यों दिखाई देते हैं, जिनके फूटते ही तस्वीर अचानक बदल जाती है।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पैसे इतनी तेजी से आए कि ब्राजील की मुद्रा में करीब 40 फीसदी का इजाफा हुआ, पर वह बुलबुला फूट चुका है। यह हाउसिंग क्षेत्र का बुलबुला था। याद कीजिए, उससे पहले डॉट.कॉम और उससे भी पहले 1990 के दशक के मध्य का एशियाई बुलबुला था। 1980 के दशक में वाणिज्यिक रियल इस्टेट का बुलबुला था। लेकिन इसमें शक नहीं कि हाउसिंग क्षेत्र के बुलबुले ने करदाताओं पर सर्वाधिक बोझ डाला, क्योंकि विफल बचत और ऋण संस्थाओं को उबारने के लिए बेल आउट पैकेज के तहत खर्च की गई रकम उन्हीं की जेब से निकली।
लेकिन स्थिति हमेशा ऐसी नहीं थी। 50, 60 और यहां तक कि 70 के कठिन दशक में भी बुलबुले का ऐसा खतरा नहीं था। तो फिर इन बुलबुलों की वजह क्या है?
आप चाहें, तो मौजूदा स्थिति के लिए दूसरे लोगों की तरह अमेरिकी केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व, को कोस सकते हैं। यह सही है कि पिछले कुछ वर्षों में फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को नीचे लाने के लिए जबरदस्त प्रयास करता रहा है। इसके लिए उसने परंपरागत तरीकों के साथ-साथ लंबी अवधि के बांड खरीदने जैसे तरीकों का भी सहारा लिया है। कम ब्याज दरों के कारण निवेशकों को निवेश के लिए उभरती अर्थव्यवस्थाओं जैसे दूसरे बाजार तलाशने पड़े।
पर यह समझना चाहिए कि फेडरल रिजर्व बस अपना काम कर रहा है। जब महंगाई कम हो और अर्थव्यवस्था मंदी में हो, तब ब्याज दरों को नीचे लाने का काम उसे करना ही है। और उन कई पुराने बुलबुलों का क्या, जो इस समय एक पीढ़ी पीछे छूट चुके हैं?
कुछ लोग यह कहेंगे कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को नीचे रखने के साथ ही काफी मात्रा में मुद्रा भी बाजार में छोड़ रहा है। लेकिन 80 और 90 के दशक में ब्याज दरें ऐतिहासिक तौर पर ऊंची थीं। यहां तक कि हाउसिंग क्षेत्र के बुलबुले के दौर में भी ब्याज दरें ऐतिहासिक ऊंचाई पर थीं। पर क्या करेंसी की अत्यधिक छपाई मुद्रास्फीति नहीं बढ़ातीं? हमने यह भी देखा है कि हर बुलबुले के शुरुआती दौर में मुद्रास्फीति आनुपातिक रूप से कम थी।
मौजूदा आर्थिक संकट का एक बड़ा कारण वित्तीय विनियंत्रण भी है। केवल अमेरिका नहीं, पूरी दुनिया भर में पूंजी की आवाजाही पर नियंत्रण हटा लिया गया है। भूलना नहीं चाहिए कि 1980 के वाणिज्यिक रियल इस्टेट बुलबुले और 2007 के हाउसिंग क्षेत्र के बुलबुले के दौर में बैंक कर्ज देने के मामले में उदार हो गए थे। सीमा पार पूंजी का आवागमन केवल 1997-98 के एशियाई संकट का ही नहीं, बल्कि यूरो जोन और अब उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संकट का भी कारण है।
अर्थव्यवस्था के बुलबुले फूटने के इस दौर का भारत, ब्राजील और दूसरे देशों के लिए बड़ा सबक यह है कि जब वित्तीय संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल हो जाती हैं, तब अर्थव्यवस्थाओं का एक के बाद दूसरे संकट में घिर जाना तय है।