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यह विचित्र भारती है

Mon, 18 Feb 2013 11:35 PM IST
दिलीप गुप्ते
दिलीप गुप्ते Updated Mon, 18 Feb 2013 11:35 PM IST
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It is different bharti

मेरा कंप्यूटर एकदम मूक युग में चला गया। नेट पर रेडियो सिलोन पर गाने सुनने के इस रोगी को अब रेडियो का ही सहारा था। विविध भारती लगाया। सुबह अच्छा संगीत सुनने से दिन अच्छा जाता है। गाना अच्छा खासा बज रहा था कि एकदम 'टन्न' की आवाज आई। पहले तो मैं समझा कि रसोईघर में रोज की ही तरह कोई बर्तन गिरा होगा। मगर इतनी जल्दी तो रसोई बनती नहीं।

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विचार बैलगाड़ी की तरह चल रहे थे कि विविध भारती ने जेट की तरह झपट्टा मारते हुए विज्ञापन ठोक दिया। फिर गाना शुरू हो गया, लेकिन बीच का हिस्सा विज्ञापन ने कुतर लिया। फिर निवेदक ने सोती हुई आवाज में कुछ कहा और गाना शुरू किया। मैंने सोचा कि अब पूरा गाना सुनूंगा, लेकिन विविध भारती तो विचित्र भारती बन गई।
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कुहू कुहू बोले कोयलिया गाना चल ही रहा था कि फिर 'टन्न' ने तलवार मार दी। पूरी रफ्तार से चलने वाली रेल की जंजीर भी अगर खींची जाए, तो वह कुछ दूर चल कर रुकती है। प्याला जमीन पर गिरने में भी समय लेता है, पर यहां तो गाना एकदम से काट दिया जाता है। जैसे गाने को हार्ट अटैक आया हो और विज्ञापन के बाद सांस फिर लौट आई हो।
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कोई बताए कि विविध भारती संगीत की इतनी बड़ी शत्रु क्यों है? विज्ञापन गानों के बीच में ही क्यों आते हैं? यह ठीक है कि विज्ञापन के पैसे मिलते हैं और गाने की रॉयल्टी देनी पड़ती है, लेकिन रसभंग का यह तरीका समझ में नहीं आता। रेडियो सिलोन की तरफ देखें।

बेचारा विज्ञापनों के लिए मरा जा रहा है और उसे विज्ञापन नहीं मिल रहे। फिर भी वह सुनने वालों को खुश रखे हुए है। गाने काट तो नहीं रहा। क्या विविध भारती के पास इतनी समझ नहीं है कि विज्ञापनों के आगे बिछ जाने की मजबूरी के चलते एक गाना भले ही कम सुनवाए, पर पूरा तो सुनवाए। सुबह के समाचारों के बाद तो यह स्टेशन सुनना ही सजा है। जितने सुहाने गाने पौने आठ बजे तक आते हैं, उतने ही तीखे और कड़वे गाने सवा आठ बजे आते हैं।

 
विविध भारती के पास वैसे भी कोई नए कार्यक्रम नहीं हैं। पुराने कार्यक्रमों के टेप ही सुनवाए जा रहे हैं। जिन्हें नया कहा जाता है, वे भी पुराने ढर्रे के हैं। एफएम रेडियो से मात खाने के बाद भी उद्घोषकों का तौर तरीका नहीं बदला है। वही थकेला। यह भी सही है कि जब उद्योगपति, अधिकारी, नेता और मंत्री ही देश को कुतर कर खा रहे हैं, तो विविध भारती ने ही कौन-सा अपराध किया है। वह तो सिर्फ गाने ही कुतर रही है।

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