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यह देश है वीर जवानों का
राजेंद्र शर्मा
Updated Tue, 26 Nov 2013 07:25 PM IST
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सम्मान पर भी आपत्ति! भाई यह तो हद है। बताइए, किसी का सम्मान भी कोई विरोध करने की चीज है? लेकिन, सिर्फ इसलिए कि दो माननीय विधायकों और दर्जन भर दूसरे केसरिया नेताओं का पिछले दिनों मोदी जी रैली में अभिनंदन किया गया, भाई लोग सम्मान का भी बुरा मान गए हैं।
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टेलीविजन चैनलों पर भाई के विरोधी खींच-खींचकर इन बेचारों के सम्मान में पब्लिक से लेकर डेमोक्रेसी तक का अपमान निकाल लाए हैं। वे कह रहे हैं कि यह तो दंगावीरों का सम्मान है! दंगावीर हुए, तो क्या हुआ, हैं तो बहादुर ही। वीर आखिर वीर होता है, फिर चाहे वह किसी भी क्षेत्र में वीरता का प्रदर्शन क्यों न करे।
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सचिन तेंदुलकर को हम महानतम क्रिकेटवीर और खास तौर पर बल्लावीर मानते हैं या नहीं। अमिताभ जी को अभिनयवीर कहते हैं कि नहीं। हमारे यहां एक से एक भाषणवीर भी हुए हैं और दानवीर भी। फिर बेचारे दंगावीरों ने ही किसी का क्या बिगाड़ा है, जो उनका सम्मान न करें! आपत्ति जताकर ऐसे 'साहसी' लोगों की मान्यता देने से कहीं इन्कार तो नहीं किया जा रहा!
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समझना चाहिए कि यह वीरता के एक नए क्षेत्र का मामला है। इसकी परंपरा बहुत प्राचीन न सही, लेकिन एकदम नई भी नहीं है। उसके बाद से तो अब वीरता के और भी कई नए मैदान खुल चुके हैं। मसलन, सुना है कि मध्य प्रदेश के शिवराज बाबू ने घोषणावीर बनकर नाम कमाया है और उनके एक मंत्री ने उद्घाटनवीर बनकर। यानी वीरता के मामले में हमारा देश लगातार अपनी विविधता का परिचय दे रहा है। फिर दंगावीरों को मान्यता देने के मामले में कंजूसी क्यों बरती जाए?
हमारा तो मानना है कि किसिम-किसिम की वीरताओं में यही सच्ची वीरता है। ध्यान से देखें, तो यह वीरता की सबसे पुरानी परिभाषा के सबसे नजदीक पड़ती है। युद्ध या लड़ाई-भिड़ाई की वीरता की तरह यह एक प्रकार के युद्ध की ही वीरता है।
हां! इस युद्ध का मैदान जरा अलग होता और लड़ाई का तरीका भी। इस युद्ध के पाले अपनी ही पब्लिक के बीच खींचे जाते हैं और योद्धा खुद लड़ने के बजाय पब्लिक को लड़ाते हैं, और बन पड़े, तो बाद में उसी की पीठ पर चढ़कर, डेमोक्रेसी में सत्ता की कुर्सी तक भी जा पहुंचते हैं। यानी चुनाव में जनता भी इन वीरों के उपकार का बदला चुका देती है।
ऐसे वीरों का अभिनंदन इस देश में नहीं होगा, तो क्या सिर्फ पाकिस्तान और बांग्लादेश में ही होगा!