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उत्तर और दक्षिण में अलग होंगे मुद्दे

Mon, 03 Mar 2014 07:31 PM IST
मनीषा प्रियम
मनीषा प्रियम Updated Mon, 03 Mar 2014 07:31 PM IST
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issuee will be changed in north and south india

लोकसभा चुनाव की रणभेरी बस बजने को है। सत्ता की इस जंग में उतरने से पहले जुबानी हमले तीखे होते जा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप चरम पर है। बावजूद इसके 2014 का चुनाव एक नए भारत का चुनाव माना जा सकता है। बेशक कानून एवं संविधान की नजर में संघीय ढांचे को भारत की संस्कारगत नींव कहा जा सकता है, लेकिन इस बार संभवतः यह पहला मौका होगा, जब राष्ट्रीय चुनावों का स्थानीयकरण होगा। कांग्रेस विरोध राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है, मगर चुनावों में स्थानीय मुद्दे भी छाए रहेंगे।

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आगामी लोकसभा चुनाव देश के उत्तर और दक्षिण में दो तरीकों से लड़ा जाएगा। मसलन, उत्तर के राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से मिलने वाला खाद्यान्न चुनावी मुद्दा बन सकता है, लेकिन तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में इस पर वोट नहीं मांगा जाएगा, क्योंकि वहां मध्याह्न भोजन जैसी व्यवस्था पिछली सदी के 60-70 दशक में ही सुचारू रूप से व्यवस्थित की जा चुकी है।
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इसी तरह, बेहतर विकास, गरीबी उन्मूलन, जाति व्यवस्था और सुशासन की कमी जैसे मुद्दे भले ही बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के लिए महत्वपूर्ण हों, लेकिन दक्षिण के राज्यों में ये मुद्दे नेताओं की जुबान पर शायद ही चढ़ें। देखा जाए, तो दक्षिण के राज्यों में राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ने का दम किसी बड़े दल में नहीं है। तेलंगाना के मुद्दे पर ही देश की दोनों प्रमुख पार्टियां- कांग्रेस और भाजपा, एक साथ हैं, तो फिर भला वे ऐसे मुद्दों पर क्यों टकराएंगी? इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि राष्ट्रीय समीकरण स्थानीय/छोटी लड़ाइयों के आधार पर बनेंगे। हालांकि जिस तरह के मुद्दे तमिलनाडु में मतदाता की भावनाओं को भड़का सकते हैं, उनका असर बिहार या असम में होने की संभावना बहुत कम है। इसका सीधा प्रदर्शन मुख्यमंत्री जयललिता ने राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने का आदेश देने के साथ किया था। इस फैसले पर अभी सर्वोच्च अदालत ने रोक लगा दी है, लेकिन यह साफ हो गया है कि अम्मा अपने मतदाताओं के अंदर छिपी तमिल भावना को कांग्रेस विरोध से जोड़ना चाहती थीं।
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राष्ट्रपति ने तेलंगाना के गठन को मंजूरी दे दी है। औपचारिक रूप से आंध्र प्रदेश का विभाजन जब भी हो, लेकिन सीमांध्र के हिस्से में कांग्रेस विरोध देखा जा सकता है। मगर यहां भी बहुदलीय संघर्ष हावी रहेगा और तेलुगू देशम, वाईएसआर-कांग्रेस जैसे दल प्रमुखता से उभरेंगे। एकीकृत आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित) में जिस कांग्रेस को 15वीं लोकसभा में 33 सीटें मिली थीं। मगर पुनर्गठन के बाद सीमांध्र वाले हिस्से में कांग्रेस को भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस एकीकृत आंध्र प्रदेश में नेहरू-पटेल की संयुक्त रणनीति से नए भारत का निर्माण हुआ था, वहीं इस बार एक खंडित भारत का सृजन होने वाला है।

कर्नाटक में मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प होगा, क्योंकि जनता दल (सेक्यूलर) स्थानीय मुद्दों को लेकर मैदान में उतरने को तैयार है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस पार्टी और नवगठित तीसरे मोर्चे के दिग्गज नेता एचडी देवगौड़ा यहीं के हैं, और वह  भविष्य में पुराने लोहियावादी, वामपंथी और क्षेत्रीय दलों से सद्भाव रखनेवाले नेताओं के साथ गठजोड़ कर सकते हैं।

दक्षिण के बरक्स उत्तर भारत के चुनावी समीकरण स्पष्ट हैं। यहां के मुद्दों की पड़ताल पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों से की जा सकती है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह का 'मामा' बनना भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। मामा इसलिए, क्योंकि लाडली-लक्ष्मी जैसी महिला कल्याणकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन का सेहरा उन्हीं के सिर बंधा है। ऐसी योजनाएं वहां अब भी मुद्दा हैं। इसी तरह, छत्तीसगढ़ में दरभा घाटी जैसी दुखद नक्सली घटना जरूर हुई, लेकिन लोकसभा चुनावों में इसका प्रभाव शायद ही दिखे। विधानसभा चुनाव में ही यह मुद्दा नहीं बन सकी थी, जबकि इस घटना में कांग्रेस के स्थानीय शीर्ष नेताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इसके बनिस्बत यहां जनवितरण प्रणाली से मिलने वाला खाद्यान्न बड़ा मुद्दा बन सकता है, क्योंकि यह राष्ट्रीय पीडीएस से बेहतर है। राजस्थान में किस तरह के मुद्दे हावी रहेंगे, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी है, लेकिन इतना तय है कि यहां की जनता को कल्याणकारी योजनाओं के जरिये नहीं लुभाया जा सकता। विधानसभा चुनाव से पहले जनता को तेल रिफाइनरी की सौगात देने, मुफ्त दवाई मुहैया कराने जैसे तमाम लुभावने प्रयास किए जाने के बावजूद गहलोत सरकार की विदाई हुई ही है।

इन सबकी तुलना में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, और बिहार से राष्ट्रीय पार्टियों को ज्यादा उम्मीदें हैं। दिल्ली में गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे हावी हो सकते हैं, क्योंकि आम आदमी पार्टी ने दिखा दिया है कि स्थानीय मुद्दों पर लड़कर कैसे सत्ता तक पहुंचा जा सकता है। संभव है, अन्य पार्टियां भी इसी फॉर्मूले को अपनाने का प्रयास करें। देखना दिलचस्प होगा कि यहां की जनता स्थानीयकरण की मूर्ति को कैसे स्वरूप देगी, और विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में वह अंतर कर पाएगी या नहीं।


हालांकि बिहार में अभी विशेष राज्य को लेकर पार्टियां जरूर आंदोलन कर रही हैं, लेकिन चुनावी समर में उन्हें इसका फायदा नहीं होगा। वहां अनुबंध आधारित शिक्षकों की खराब दशा, महादलित में पासवान जाति को नहीं शामिल करना जैसे मुद्दे जनता के करीब हैं। बाहुबली नेताओं को सत्ता से बाहर करना भी जनभावना भड़का सकता है। इन सबके बनिस्बत उत्तर प्रदेश में मुकाबला इसलिए दिलचस्प होगा, क्योंकि यहां दंगा जरूर चुनावी फिजा में गूंजेगा, पर सांप्रदायिकता के नाम पर मतदाता किसी दल को वोट देगा, इसकी उम्मीद बेमानी है।

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