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मुद्दा: मानसून और मच्छर... मौन मृत्यु दूत हमारे बीच पनप रहा है; सतर्कता ही बचाव

Wed, 02 Jul 2025 05:47 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 02 Jul 2025 05:47 AM IST
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सार
मानसून का स्वागत करते हुए हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि इसी मौसम में एक मौन मृत्यु दूत हमारे बीच पनप रहा है।
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Issue of mosquitoes during Monsoon silent messenger of death is growing vigilance precaution only protection
मानसून के समय मच्छरों से बचाव जरूरी (सांकेतिक) - फोटो : ANI

विस्तार

मानसून भारत में जितना स्वागत योग्य होता है, उतना ही कई बार विनाशकारी भी साबित होता है। बारिश के बाद ठहरे पानी में एक ऐसा जीव जन्म लेता है, जो मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। यह जीव है, मच्छर! यह आकार में भले ही बेहद छोटा हो, परंतु इसके कारण हर साल लाखों लोगों की मौत होती है। 



विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मच्छर की वजह से दुनिया में हर साल औसतन सात लाख लोगों की मौत होती है। विडंबना यह कि मच्छर से मृत्यु न तो खबर बनती है, न एजेंडा। आंकड़े बताते हैं कि मानव हंताओं की इस सूची में दूसरे नंबर पर स्वयं मनुष्य आता है, जिससे लगभग चार लाख लोगों की मृत्यु होती है, फिर सांप (एक लाख), कुत्ते (25,000), बिच्छू (3,000-5,000) आिद शामिल हैं।


मच्छर किसी को सीधे तौर पर नहीं मारता, बल्कि मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जीका वायरस और पीला बुखार जैसी बीमारियां इसके जरिये फैलती हैं। इन रोगों से ग्रस्त लोगों की संख्या करोड़ों में है और लाखों की जान चली जाती है। भारत जैसे घनी आबादी और उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले देश में मानसून का मौसम मच्छरों के लिए अनुकूल होता है। जल-जमाव, नालियों की सफाई में लापरवाही, खुले गमले, कूलर और जलाशयों में जमा पानी मच्छरों के लिए प्रजनन स्थल बन जाते हैं।

भारत में मलेरिया और डेंगू सबसे अधिक जानलेवा साबित हो रहे हैं। 2023 में अकेले डेंगू के दो लाख से अधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें से सैकड़ों की मौत हुई। वहीं मलेरिया के भी हजारों मामले सामने आते हैं। शहरीकरण, अनियंत्रित विकास और जलवायु परिवर्तन के चलते अब पहाड़ी और ठंडे इलाकों में भी डेंगू जैसे रोग फैलने लगे हैं। हाल ही में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में डेंगू के केस सामने आए।

मानसून के समय नगर निकायों और स्वास्थ्य विभाग द्वारा मच्छरनाशक छिड़काव, फॉगिंग, और जनजागरूकता अभियान की घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इनका कार्यान्वयन बहुत सीमित और असमान होता है। बड़े शहरों में भी कई क्षेत्रों में फॉगिंग नहीं की जाती या फिर कम गुणवत्ता वाली दवाएं छिड़की जाती हैं। इसके कारण झुग्गी-झोपड़ी और निम्न आय वर्ग के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। साफ है कि मच्छरजनित रोग अब केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता का भी संकेत बन गए हैं।

स्वास्थ्य के साथ-साथ मच्छरों का आर्थिक प्रभाव भी व्यापक है। एक अनुमान के अनुसार, औसत भारतीय परिवार को डेंगू या मलेरिया से पीड़ित सदस्य के इलाज पर 10,000 से 30,000 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। यह खर्च निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए अत्यधिक बोझ बन जाता है। सरकार द्वारा दी जाने वाली चिकित्सा सेवाएं कई बार पर्याप्त नहीं होतीं या बहुत दूर होती हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों की कमी और दवाओं की अनुपलब्धता के कारण स्थिति और भी विकट हो जाती है। सरकारी अस्पतालों में बेड की कमी, प्लेटलेट्स की अनुपलब्धता और समय पर जांच न हो पाना भी इस समस्या को बढ़ाता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि जलवायु परिवर्तन के चलते मच्छरों के व्यवहार और प्रजनन के तरीके बदल रहे हैं। पहले जिन क्षेत्रों में तापमान कम होने के कारण मच्छर नहीं पनपते थे, अब वहां भी इनका प्रसार हो रहा है। चिकित्सक और महामारी विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को मच्छरजनित रोगों से निपटने के लिए केवल मौसमी अभियान नहीं, बल्कि एक सतत और दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी। इसमें नगर निकायों की जवाबदेही, स्वास्थ्य बजट में वृद्धि, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती और जनसहभागिता को बढ़ावा देना शामिल है। स्कूलों, कॉलेजों और पंचायत स्तर पर मच्छरों के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाना अनिवार्य होना चाहिए। साथ ही आधुनिक तकनीक, जैसे कि जीआईएस आधारित मच्छर मानचित्रण और मोबाइल एप के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और निगरानी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

यह विचार भी गंभीरता से किया जाना चाहिए कि क्या हर साल होने वाले मच्छरजनित रोगों के प्रकोप को एक ‘मौसमी आपदा’ घोषित किया जाए। जैसे बाढ़, भूकंप और सूखा के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण विशेष योजनाएं बनाता है, वैसे ही डेंगू और मलेरिया जैसे रोगों के लिए भी विशेष राहत और बचाव योजना बनाई जानी चाहिए। मानसून का स्वागत करते हुए हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि इसी मौसम में एक मौन मृत्यु दूत हमारे घरों, स्कूलों, अस्पतालों और गलियों में पनप रहा है। यह हमारी नीतियों, हमारी तैयारियों व हमारी चेतना की सबसे बड़ी परीक्षा है। धरती का सबसे खतरनाक जीव हमारे बीच है और इसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा में अब देर नहीं होनी चाहिए। 

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