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मुद्दा: भीड़ प्रबंधन के मोर्चे पर एआई बनाम देशज... महाकुंभ जैसे सांस्कृतिक आयोजनों में देसी तरीके ही बेहतर
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प्रयागराज महाकुंभ 2025 की टैग लाइन ‘दिव्य, भव्य व डिजिटल महाकुंभ'
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अमर उजाला
विस्तार
प्रयागराज महाकुंभ 2025 की टैग लाइन ‘दिव्य, भव्य व डिजिटल महाकुंभ' की भव्य शुरुआत में आस्था का सैलाब, श्रद्धालुओं की अपार भीड़ इस आयोजन की सफलता का आगाज कर रही थी। आस्था का यह महापर्व दिव्य व भव्य तो रहता ही है, साथ ही प्रशासनिक हस्तक्षेप इस भव्यता को समावेशी व सुगम बनाने के प्रयास कर रहे थे। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए विशेष साइबर सुरक्षा व्यवस्था शुरू की गई, जिनमें साइबर गश्त हेतु 56 समर्पित साइबर योद्धाओं एवं विशेषज्ञों की तैनाती की गई। धोखाधड़ी वाली वेबसाइटों, सोशल मीडिया घोटालों और फर्जी लिंक जैसे साइबर खतरों का मुकाबला करने के लिए महाकुंभ साइबर पुलिस स्टेशन की स्थापना हुई। साइबर खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मेला क्षेत्र में 40 वैरिएबल मैसेजिंग डिस्प्ले (वीएमडी) स्थापित किए गए। ये सब सुरक्षित कुंभ की जरूरत थे।लेकिन सवाल है कि प्रौद्योगिकी और स्थानीय व देशी तरीके में से कौन बेहतर भीड़ प्रबंधन कर सकता है। इसका उत्तर काफी हद तक संदर्भ, भीड़ प्रबंधन के लक्ष्यों और भीड़ की विशिष्ट आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। कैलाश गौतम की ‘अमौसा का मेला' कविता एहु हाथे झोरा, उहौ हाथे झोरा, कान्हे पर बोरी कपारे पर बोरा भीड़ का चित्रण करती है। इस भीड़ की अलग तरह की आवश्यकता पर गंभीर चिंतन जरूरी है।
प्रौद्योगिकी ऐसे उपकरण प्रदान करती है, जो वास्तविक समय में भीड़ की निगरानी और प्रबंधन को सक्षम बनाती है। ड्रोन, सीसीटीवी निगरानी और उन्नत डाटा एनालिटिक्स (एआई सहित) जैसी आधुनिक तकनीकें भीड़ घनत्व, पैटर्न और व्यवहार को ट्रैक कर सकती हैं।
उन्नत सॉफ्टवेयर उपकरण भीड़ और पिछले डाटा का विश्लेषण करके संभावित जोखिम बिंदुओं की भविष्यवाणी कर सकते हैं। लेकिन मौनी अमावस्या के अमृत स्नान के समय दुर्भाग्यपूर्ण भगदड़ ने पूरी व्यवस्था को हिला दिया। दरअसल कुंभ की आस्था और श्रद्धालुओं के जीवनवृत को समझने वालों के लिए यह ‘डिजिटल प्रबंधन' शुरू से असहज करने वाला था। वह भीड़, जिसमें समूह के किसी एक व्यक्ति के पास ही मोबाइल होता है, या एक भी मोबाइल नहीं होता, एक डंडे में किसी विशेष चिह्न को लगाकर समूह को निर्देश दिया जाता है, उन्हें डिजिटल उपाय क्या सुविधा दे पाएगा? आपदा के समय स्थानीय लोगों, छात्रों ने ही मोर्चा संभाला। तकनीक के फेल होने पर सेवा-भाव ही काम आया, जो भारतीय समाज का मूल तत्व है।
इस भीड़ में एक बुजुर्ग महिला अपने परिजनों से बिछड़कर झूंसी में भटक रही थीं। रात बारह बजे गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के गेट पर वह बदहवास हालत में पहुंचीं। वह तत्काल कुछ बताने की स्थिति में भी नहीं थीं। उनके हाथ पर गोदना गुदा था, जिस पर उनके पति का नाम लिखा था। थोड़ी देर बाद जब वह सामान्य हुईं, तो उन्होंने अपना पता बताया। फिर उनके गांव में संपर्क करने पर उनके बेटे का फोन नंबर मिला और उन्हें सूचना दी गई और वह उन्हें ले गए। इस तरह एक पुरातन पहचान के चिह्न गोदना ने एआई के जमाने में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी।
सांस्कृतिक संवेदनशीलता और समुदाय-आधारित दृष्टिकोण से लैस भीड़ प्रबंधन के स्वदेशी तरीके अक्सर सामाजिक एकजुटता, सामुदायिक भागीदारी और सांस्कृतिक सम्मान को प्राथमिकता देते हैं। ये तरीके स्थानीय परंपराओं में गहराई से अंतर्निहित हैं, जिसमें बुजुर्ग और समुदाय के नेता भीड़ का मार्गदर्शन और प्रबंधन करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। ये विधियां संदर्भ-संवेदनशील हैं और प्रत्येक समुदाय की अनूठी सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा करती हैं, अपनेपन और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देती हैं।
देसी तरीके अक्सर लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक बंधनों और समुदाय के भीतर विश्वास पर बनाए जाते हैं। भीड़ के सदस्यों और कार्यक्रम का प्रबंधन करने वालों के बीच का रिश्ता आम तौर पर आपसी सम्मान और समझ का होता है, जो सहयोग को बढ़ाता है। बेशक आधुनिक तकनीक की अपनी महत्ता है, लेकिन कुंभ, जहां की आस्था में सारे विभेद संगम की रेती में तिरोहित हो जाते हैं, वहां शायद देसी तरीके ही उत्तम हैं। स्वदेशी तरीके स्थानीय सामाजिक संरचनाओं में गहराई से अंतर्निहित हैं और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील हैं, सहयोग और सम्मान को बढ़ावा देते हैं। स्थानीय नेता और समुदाय के भरोसेमंद व्यक्ति, स्थानीय/क्षेत्रीय बोली बोलते हैं, जो अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं। प्रौद्योगिकी और स्वदेशी तरीके, दोनों के फायदे और सीमाएं हैं। इसलिए वास्तविक समय की निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना और मानव-केंद्रित, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील हस्तक्षेप के लिए स्वदेशी ज्ञान, भीड़ प्रबंधन के लिए सबसे प्रभावी समाधान प्रदान कर सकता है।
नोट-लेखिका जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में एसो. प्रोफेसर हैं