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मुद्दा: ‘अंक-उद्योग’ के भ्रमजाल में शिक्षा... विषय की गहराई में जाकर उसकी वास्तविक समझ विकसित करना बहुत जरूरी

Thu, 15 May 2025 07:13 AM IST
ज्योति भास्कर शिवेश प्रताप
शिवेश प्रताप Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 15 May 2025 07:13 AM IST
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सार
शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन, सृजनशीलता और व्यक्तित्व विकास होना चाहिए था, लेकिन बीते कुछ दशकों में यह एक ‘अंक-उद्योग’ में बदल गया है।
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Issue Indian Education confusion of number industry vital to have deep and real understanding of subjects
परीक्षा को लेकर तनाव और अंकों का दबाव (प्रतीकात्मक) - फोटो : फ्री पिक

विस्तार

सीबीएसई का रिजल्ट घोषित होते ही हर तरफ सोशल मीडिया पर 90-95 प्रतिशत प्राप्त करने वाले बच्चों की बधाइयां दिख रही हैं। लेकिन यही सही समय है कि हम इन अंकों के पीछे छिपे शिक्षा के व्यावसायीकरण, वस्तुनिष्ठता एवं सरलीकरण से उपजी कृत्रिम प्रसन्नता के कुचक्र के उस पार देखने का प्रयास करें। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन, सृजनशीलता और व्यक्तित्व विकास होना चाहिए था, लेकिन बीते कुछ दशकों में यह एक ‘अंक-उद्योग’ में बदल गया है। विशेषकर, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) और उससे संबद्ध पब्लिक स्कूलों के गठजोड़ ने ऐसा माहौल बनाया है, जिसमें 85-90 फीसदी अंक लाना औसत माना जाने लगा है।



छात्र 98 से 100 फीसदी तक अंक प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन देश की सबसे कठिन व प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा में टॉपर्स महज 50-55 फीसदी अंक ही प्राप्त कर पाते हैं। 2015 में टीना डाबी 52.49, तो इस वर्ष शक्ति दुबे 51.47 फीसदी अंक प्राप्त कर टॉपर बनीं। सीबीएसई व अन्य बोर्डों में मिलने वाले ज्यादा अंक छात्रों को जेईई व नीट जैसी परीक्षाओं की ओर धकेलते हैं। यहां भी यूपीएससी की तरह विषय की गहराई, विश्लेषणात्मक क्षमता, तार्किकता आदि की जरूरत होती है, जब बच्चे इनमें सफल नहीं हो पाते, तो अवसाद में चले जाते हैं। यहां तक कि खुदकुशी जैसे कदम उठा लेते हैं। दरअसल, यहां रटे-रटाए या टेम्पलेट आधारित उत्तर काम नहीं आते और अच्छे-अच्छे नंबरों वाले बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं से निराश होकर लौटते हैं। यह विरोधाभास इस बात का संकेत है कि हमारी स्कूली मूल्यांकन प्रणाली और वास्तविक ज्ञान के बीच एक बड़ा अंतर आ चुका है।


क्या इस व्यवस्था से भारत को हम अनुसंधान और नवाचार का वैश्विक नेता बना सकेंगे? सीबीएसई और निजी पब्लिक स्कूलों ने मिलकर एक ऐसी परीक्षा प्रणाली विकसित की है, जिसमें छात्रों को प्रश्नों के उत्तर रटवाए जाते हैं। उत्तर पुस्तिकाओं में ‘की-वर्ड्स’ पर अंक दिए जाते हैं। अध्यापक भी उत्तर की गहराई, तार्किक प्रवाह या विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण को महत्व नहीं देते। उदाहरण के लिए, प्रश्न पूछा जाए कि दशरथ के कितने पुत्र थे? तो उत्तर में चार लिखकर भी आप संपूर्ण अंक प्राप्त करने की अहर्ता रखते हैं, चाहे राम के सभी भाइयों का नाम न भी लिखें। इसने छात्रों को विश्लेषणात्मक, रचनात्मक लेखन, वर्तनी की शुद्धता, सुलेख आदि से दूर कर दिया है।

पहले जहां उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के बोर्ड, सरस्वती शिशु मंदिर की शिक्षा प्रणाली में 60 फीसदी अंक भी उत्कृष्ट माने जाते थे, वहीं आज सीबीएसई में 90 फीसदी अंक सामान्य हो गए हैं। डेढ़ दशक पहले तक, यूपी बोर्ड में 75 फीसदी अंक वाले विद्यार्थी राज्य स्तर पर मेरिट में आ जाते थे, क्योंकि उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन अत्यंत कठोर होता था और लेखन में गहराई की अपेक्षा की जाती थी। सीबीएसई ने ‘लर्निंग आउटकम’ के नाम पर ऑब्जेक्टिव और संक्षिप्त उत्तरों को बढ़ावा दिया, जिससे छात्रों में गहराई से सोचने, संदर्भों का विश्लेषण करने व विषय पर व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की क्षमता का ह्रास हुआ। छात्र निबंधात्मक उत्तरों से कतराने लगे व ‘टेम्पलेट आधारित’ उत्तर लिखना सीख गए। इससे निबंध लेखन, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र जैसे विषयों में विचारशीलता घटने लगी, जबकि ये विषय यूपीएससी जैसी परीक्षाओं का मूल हैं।

सीबीएसई की वेबसाइट के अनुसार, 2019 में भारत में कुल मान्यता प्राप्त 22,030 स्कूल थे, जिनमें 1,138 केंद्रीय विद्यालय, 2,727 सरकारी, 598 जवाहर नवोदय तथा 14 केंद्रीय तिब्बती विद्यालयों के अलावा 17,553 निजी स्कूलों को मान्यता मिली थी। कुल मान्यता प्राप्त स्कूलों में लगभग 80 फीसदी निजी स्कूल हैं, जो स्पष्ट करता है कि सीबीएसई का कितना बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के प्रभाव में है। सरकार को इस केंद्रीकरण के विरुद्ध कार्य कर इस प्रकार की शक्ति के केंद्रीकरण को खत्म करने की जरूरत है, क्योंकि अब यह एक सिंडिकेट के रूप में कार्य कर रहा है, जिसमें फीस वृद्धि, महंगी किताबें और शिक्षा के व्यावसायीकरण के नीचे दबते परिवारों की हालत और खराब हो रही है। फीस वृद्धि अभी बड़े शहरों की समस्या है, लेकिन जल्द ही देश की राजनीति में यह बड़ा मुद्दा होगा।

आज जब भारत को हम विश्व के अनुसंधान और नवाचार का केंद्र बनाने की सोच रहे हैं, तो यहां की शिक्षा प्रणाली में यह आवश्यक है कि हम अंकों की होड़ से हटकर वास्तविक ज्ञान, समझ और विश्लेषणात्मक क्षमताओं को महत्व दें। स्कूलों में मूल्यांकन प्रणाली को इस प्रकार ढालना चाहिए कि छात्र न केवल उच्च अंक प्राप्त करें, बल्कि विषय की गहराई में जाकर उसकी वास्तविक समझ भी विकसित करें। केवल तभी हम जेईई एडवांस, नीट और यूपीएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अधिक सफल और सक्षम उम्मीदवार तैयार कर पाएंगे। साथ ही अनुसंधान के लिए जिस सृजनशील मेधा की आवश्यकता है, उसका निर्माण हो सकेगा।

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