इस्राइल की इस जिद का मतलब

भारत डोगरा Updated Fri, 07 Dec 2012 12:20 AM IST
israel insistence means
अंतरराष्ट्रीय मंचों में किसी मुद्दे पर इतना बहुमत जुटाना बहुत कठिन होता है, जितना कि राज्य के रूप में फलस्तीन को मान्यता मिलने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में प्राप्त हुआ। इस मान्यता के पक्ष में 138 देशों ने वोट दिया, जबकि विपक्ष में मात्र नौ वोट पड़े। इस मतदान के बारे में यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह वोट न केवल इस्राइल के विरुद्ध था, बल्कि अंत तक इस्राइल को समर्थन दे रहे अमेरिका के विरुद्ध भी था।

ऐसे अनेक छोटे देशों ने भी फलस्तीन के पक्ष में मतदान किया, जिन्हें अमेरिका का विरोध करने से भारी हानि हो सकती है। जिन देशों ने विदेश नीति मामलों में हमेशा अमेरिका का समर्थन किया है, (जैसे ऑस्ट्रेलिया व सिंगापुर ने) उन्होंने भी इस्राइल के खिलाफ वोट दिया। अमेरिका के अधिकांश यूरोपीय सहयोगी फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, नार्वे जैसे देशों ने भी फलस्तीन का साथ दिया, तो इससे स्वाभाविक तौर पर विश्व कूटनीति के विशेषज्ञ चौंक गए।

हालांकि तकनीकी तौर पर यह सच है कि पूरी तरह स्वतंत्र राज्य या संयुक्त राष्ट्र में पूरी सदस्यता का दरजा अभी फलस्तीन को नहीं मिला है, पर हाल के मतदान को इस दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। अब आगे बड़ा सवाल यह है कि इस्राइल और अमेरिका इतने स्पष्ट रूप से व्यक्त किए गए विश्व मत का सम्मान करेंगे, या बौखलाकर और आक्रामक हो जाएंगे। हाल की इस्राइली प्रतिक्रिया तो काफी उग्र किस्म की रही है। मतदान के बाद के समाचारों के अनुसार, इस्राइल ने हजारों नए आवास बनाने की योजना पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम के लिए स्वीकृत की है, जिससे भविष्य में किसी फलस्तीनी राज्य के लिए व्यावहारिक तौर पर कार्य करना ही कठिन हो जाएगा।

आज इस्राइल को गंभीरता से सोचना चाहिए कि अभी तक की उग्र नीतियों से आखिर उसे क्या हासिल हुआ है? आक्रमक नीतियों के कारण गाजा पट्टी में उसके प्रति उग्र नीति अपनाने वाले हमास संगठन को लड़ाकू तत्वों का समर्थन मिलता रहता है। इस्राइल ने गाजा पट्टी क्षेत्र की जैसी नाकाबंदी कर रखी है, उससे वहां रह रहे फलस्तीनी एक तंग क्षेत्र में जैसे कैद होकर रह गए हैं। ऐसी नीतियों के कारण फलस्तीनियों में ऐसा नेतृत्व नहीं उभर सकता है, जो दो राज्यों के सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आगे बढ़े।

हालांकि सभी अमनपसंद लोग यह कहते रहे हैं कि अंत में दो राज्यों के सह-अस्तित्व में ही समाधान मिलेगा, पर फलस्तीनियों को साफ नजर आ रहा है कि जिस तरह इस्राइल अपने अतिक्रमण का क्षेत्र बढ़ाता जा रहा है, उससे उन्हें अपना राज्य मिला भी, तो वह जगह-जगह से इतना अतिक्रमण प्रभावित होगा कि एक गांव के लोग दूसरे गांव में भी नहीं जा सकेंगे। जिमी कार्टर उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति थे, जब कैंप डेविड में समझौता वार्ता हुई थी।

उन्होंने हाल ही में क्षेत्र के दौरे के बाद लिखा कि पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम क्षेत्र में इस्राइली आबादी की वृद्धि चौंकाने वाली है। अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर अब पांच लाख से अधिक इस्राइल निवासी ग्रीन लाइन से आगे बस चुके हैं। उनकी संख्या ओस्लो समझौते के बाद दोगुनी बढ़ गई है। तिस पर भी यह प्रक्रिया थम नहीं रही है और इस्राइली आवास बनते जा रहे हैं। दूसरी ओर फलस्तीनियों का उजड़ना जारी है।

वैसे इस क्षेत्र में अनेक पेचीदगियां हैं और फलस्तीनियों में आपसी एकता भी अभी बहुत दूर है। फलस्तीन अथॉरिटी के राष्ट्रपति महमूद अब्बास का कार्यकाल समाप्त हुए चार वर्ष हो गए हैं, पर अभी तक चुनाव टलते जा रहे हैं। यदि समाधान की ओर बढ़ना है, तो इस्राइल को अपनी बस्तियों के निरंतर प्रसार को रोकना होगा और गाजा पट्टी की नाकेबंदी हटानी होगी।

हमास को भी चाहिए कि वह इस्राइल द्वारा सुलह का कदम उठाने पर उस पर हमले रोक दे। चूंकि फलस्तीनियों ने पहले ही बहुत सहा है, अतः अमन की ओर बढ़ने की पहल इस्राइल को करनी चाहिए, और यदि ऐसी पहल ईमानदारी से होती है, तो विभिन्न फलस्तीनी समूहों को इसका उत्तर अमन की भाषा मेंे ही देना चाहिए। यही संयुक्त राष्ट्र में अभिव्यक्त विश्व मत का उचित सम्मान होगा।

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