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हालात: पश्चिम एशिया में शांति की राह में खड़े हैं अधिकारों से जुड़े कई सवाल
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Israel ground offensive in Gaza
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सोशल मीडिया
विस्तार
यदि कोई हमारे किसी प्रियजन की हत्या कर देता है, तो हमें सदमा लगता है। हम दुखी व क्रोधित होते हैं और हमलावर को सजा देना चाहते हैं। यह स्वाभाविक और समझ में आने वाली मानवीय प्रतिक्रिया है। राष्ट्रीय नेताओं के बारे में भी यही सच है। जब बाहरी लोग किसी राष्ट्र के नागरिकों की हत्या करते हैं, तो उनके नेता हैरान और क्रोधित होकर अपराधियों को दंडित करने की कसम खाते हैं।
अल कायदा ने जब 11 सितंबर, 2001 को अभूतपूर्व आतंकी हमले में न्यूयॉर्क के ट्विन टावर को उड़ा दिया था, तो अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने आतंक के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की थी। अल कायदा के आतंकवादी हमलों के लिए बड़े पैमाने पर मुसलमानों को सामूहिक रूप से दंडित करना एक बड़ी भूल होती। आक्रामक उकसावों के बाद शांत रहना और तार्किक ढंग से विचार करके नपे-तुले और परिपक्व तरीके से जवाब देना आसान नहीं होता, लेकिन महान नेता इन्हीं गुणों से बनते हैं।
विगत सात अक्तूबर को जिस तरह से हमास ने इस्राइल पर जमीनी, समुद्री और हवाई हमला किया और सैकड़ों लोगों को मारकर बहुत से लोगों को बंधक बनाया, जिसमें महिलाएं एवं बच्चे भी शामिल थे, वह एक जघन्य अपराध था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमास ने इस्राइलियों के खिलाफ कितने दशकों का गुस्सा, कड़वाहट और हताशा अपने अंदर पाल रखी होगी। यह एक अक्षम्य आतंकवादी कार्रवाई थी, जिसकी सभी को निंदा करनी चाहिए। अपराधियों को दंडित करने के इस्राइल के अधिकार पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। उन इस्राइली माताओं का दर्द, दुख और पीड़ा समझ में आती है, जिनके मासूम बच्चे हमास के हमलों में मारे या बंधक बना लिए गए हैं। शोक और निंदा का कोई भी शब्द उनके नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।
लेकिन क्या अपराधों, हत्या और मानवीय नुकसान को धर्म, राजनीतिक विचारधारा और स्थान के चश्मे से देखा जाना चाहिए? तर्क के इस युग में ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन लगता है कि हम अवसाद, कड़वाहट और निराशा के शिकार हो गए हैं और ठीक वैसा ही व्यवहार कर रहे हैं। बेशक हमास ने अक्षम्य अपराध किया है, लेकिन प्रतिक्रिया में इस्राइल भी तो वही कर रहा है। यदि ऐसा नहीं है, तो इस्राइली जवाबी हमले में 2,800 फलस्तीनियों, जिनमें 700 से ज्यादा बच्चे थे, की जान कैसे चली गई? यह एक तथ्य है, जिसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
पश्चिमी मीडिया और उसका समर्थन करने वाले देश गाजा में जानमाल के नुकसान की पूरी खबर नहीं देते, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वहां कुछ हुआ नहीं है। गाजा की एक फलस्तीनी मां का दुख-दर्द इस्राइल की एक मां के दुख-दर्द से कम महत्वपूर्ण क्यों होना चाहिए?
जो लोग शांति और सामान्य स्थिति की वापसी चाहते हैं, उन्हें दोनों पक्षों के तथ्यों और आख्यानों को बिना किसी पूर्वाग्रह के अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बताना चाहिए। इस्राइली नेतृत्व को यह समझना चाहिए कि उनके हवाई हमले में मारे गए हरेक निर्दोष फलस्तीनी भविष्य में दस आतंकवादियों को जन्म देगा, क्योंकि परिवारों का गुस्सा, कड़वाहट और नफरत अगली पीढ़ी तक चली जाती है। विडंबना यह है कि जो लोग खुद को शांति निर्माता के रूप में पेश कर रहे हैं, उन्होंने निर्दोष नागरिकों के खिलाफ बहुत अधिक गंभीर अपराध किए हैं, जो उनकी नजर में केवल 'कोलेटरल डैमेज' था।
फरवरी, 2003 में सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के विदेश मंत्री के रूप में कार्यरत एक फाइव स्टार जनरल ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि सद्दाम हुसैन ने ढेर सारे सामूहिक नरसंहार के हथियार जमा कर लिए हैं, वह अल कायदा के संपर्क में था। उन्होंने दावा किया कि इससे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आसन्न खतरा पैदा हो गया है, जिसके कारण मार्च, 2003 में इराक पर अमेरिकी हमला शुरू हो गया, हालांकि बाद में ये सभी दावे झूठे निकले। उस युद्ध में महिलाओं और बच्चों सहित हजारों नागरिकों की मौत हुई, पर आज तक किसी ने उस युद्ध में मरने वाले लोगों का आधिकारिक आंकड़ा नहीं दिया है! अरब जगत के सबसे विकसित मुल्कों में से एक को मलबे में तब्दील कर दिया गया, जिससे आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट का जन्म हुआ।
सबसे ज्यादा परमाणु हथियार रखने वाले एक दूसरे देश के नेता ने, जिसके वैचारिक साम्राज्य का कभी आधी दुनिया पर प्रभाव था, पिछले साल अपने पड़ोसी यूक्रेन पर हमला किया, उसकी संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का घोर उल्लंघन करते हुए 90 लाख लोगों को शरणार्थी बनने पर मजबूर कर दिया। सैकड़ों शहरों को मलबे में तब्दील कर दिया, बुचा में युद्ध अपराध को अंजाम दिया, खाद्यान्न, उर्वरक और ऊर्जा की कमी पैदा की और यूक्रेनी क्षेत्र के पांचवें हिस्से पर कब्जा कर लिया। अब वह इस्राइल एवं हमास के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश कर रहे हैं! ऐसे में इस्राइल और हमास के बीच किस तरह की शांति स्थापित की जा सकेगी?
यदि वे गंभीर थे, तो अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करते समय अरब नेताओं को फलस्तीनी प्राधिकरण के साथ बातचीत शुरू करने के लिए इस्राइल पर दबाव डालना चाहिए था और एक स्वतंत्र और संप्रभु फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए था, जिस पर ओस्लो समझौते में सहमति व्यक्त की गई है और जिसे विभिन्न अरब शिखर सम्मेलनों में मंजूरी दी गई है।
रोजाना हजारों फलस्तीनियों के साथ अपमानजनक व्यवहार और कब्जे वाले इलाकों पर बस्तियों के विस्तार के खात्मे से हमास निष्प्रभावी हो गया होता और फलस्तीनी प्राधिकरण की वैधता और स्थिति मजबूत हुई होती। पर पश्चिम एशिया के नेता फलस्तीनी प्राधिकरण के लोकतांत्रिक तरीकों को लेकर बहुत सहज नहीं हैं, उन्हें डर है कि यह उनके अपने शासन को खत्म कर देगा। इसलिए वे फलस्तीनी राष्ट्र के लिए दबाव बनाने के बजाय सिर्फ दिखावा करने तक ही सीमित रहते हैं।
पश्चिमी नेता एकजुटता दिखाने के लिए इस्राइल जा रहे हैं। वह ठीक है। लेकिन वे गाजा में फलस्तीनियों के प्रति अपनी करुणा और दयालुता क्यों नहीं दिखा सकते, जहां इस्राइल ने अब जमीनी हमला शुरू कर दिया है? क्या वे इंसान नहीं हैं? उनके दुख और कष्ट कोई मायने नहीं रखते?