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नजरिया: युद्ध के नियमों की किसे परवाह...और न अतीत के विवादों से सीखने को कोई तैयार

Sun, 29 Oct 2023 07:02 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 29 Oct 2023 07:02 AM IST
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सार
युद्ध के बुनियादी नियमों को ताक पर रख कर किए जा रहे आज के युद्धों के मूल में जमीन पर कब्जे की मंशा दिखती है। लेकिन अतीत से जुड़े पुराने विवाद युद्धों से नहीं, बातचीत से ही हल हो सकते हैं।
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Israel Hamas War no one care war rules intention to capture land, old disputes can be resolved only dialogue
Israel Hamas War - फोटो : Social Media

विस्तार

मनुष्य की उत्पत्ति के बाद कई सहस्राब्दियों से ये दावे किए जाते रहे हैं कि होमो सैपियंस इस ग्रह के सबसे उन्नत और समझदार प्राणी हैं। मुझे अलबत्ता यह डर है कि हममें और मूल निएंडरथल में ज्यादा फर्क नहीं है। जैसे वे बगैर किसी नियम के लड़ाइयां करते थे, हम भी नियम-कानूनों को ताक पर रखकर युद्ध करते रहते हैं। सवाल यह है कि क्या मनुष्यता के इतिहास में कभी युद्धों के नियम थे। नेट्टिमय्यार ने करीब 200 ईस्वी पूर्व में रचित अपनी एक कविता में तमिल राजाओं के बीच होने वाले युद्धों के बुनियादी नियम बताए थे। इन नियमों के अनुसार युद्ध छेड़ने की मंशा रखने वाला राजा पहले एक चेतावनी जारी करेगा, जिसका तमिल से हिंदी में तर्जुमा कुछ इस तरह होगा:



गाएं, सज्जन धार्मिक पुजारी,
महिलाएं, मरीज और जिनका
अंतिम संस्कार करने वाला कोई न हो,
सुन लें,
हमारे तीर तेजी से आपकी ओर बढ़ रहे हैं,
इसलिए सुरक्षित ठिकानों की ओर बढ़ें।

युद्ध के मैदान में सैनिकों के बीच सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक युद्ध लड़े जाते थे। सूर्योदय से फिर युद्ध शुरू होता था। तमिल में रामायण लिखने वाले महाकवि कंबन के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि राम ने थके हुए और पराजित रावण से कहा था, ‘आज तुम जा सकते हो और कल युद्ध करने आ सकते हो।’


जमीन के लिए निर्मम हत्याएं
अगर युद्धों में सभ्यता को ढूंढा जाए, तो आधुनिक युद्धों की तुलना में, प्राचीन युद्ध निस्संदेह सभ्य की श्रेणी में आएंगे, जिनमें नियमों की परवाह दिखती थी। आज रूस और यूक्रेन तथा इस्राइल व हमास के बीच जो दो युद्ध लड़े जा रहे हैं, वे निर्मम युद्ध हैं। अंधाधुंध बमबारी से यूक्रेन और गाजा में शहर, कस्बे, अस्पताल और स्कूल मलबे में तब्दील हो चुके हैं। बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और मरीजों सहित हजारों लोग मारे जा चुके हैं। विस्थापितों को ऐसे शिविरों में रखा जा रहा है, जहां बुनियादी सुविधाओं बिल्कुल भी नहीं हैं। हजारों बेघर पड़ोसी देशों में पलायन के लिए मजबूर हैं। पीने को पानी नहीं, बिजली नहीं, भोजन नहीं, दवाएं नहीं, मदद ले जा रहे ट्रकों तक को रोक दिया गया है। आखिर इन युद्धों की वजह क्या है? रूस और यूक्रेन में मुद्दा है प्रभुत्व। 1922 से 1991 के बीच यूक्रेन सोवियत संघ का हिस्सा था।

रूसी नस्ल के हजारों लोग यूक्रेन के कुछ हिस्सों में बसे थे और वहां के प्रमुख समूह भी बन गए थे। आजादी के बाद यूक्रेन नाटो देशों व रूस के बीच एक बफर क्षेत्र बना हुआ था। रूस को डर है कि यूक्रेन नाटो में शामिल होकर उसकी सेनाओं को रूसी सीमाओं तक ले आएगा। इसी वजह से रूस चाहता है कि यूक्रेन एक तटस्थ राज्य हो। वह यूक्रेन के उन हिस्सों पर भी फिर से कब्जा करना चाहता है, जहां कभी रूसी नस्ल के लोग बसे थे। जाहिर है कि यह युद्ध जमीन के एक हिस्से पर कब्जा करने के लिए है।

इस्राइल और हमास युद्ध भी जमीन को लेकर है। सभी फलस्तीनी, जिनमें से कुछ का प्रतिनिधित्व हमास करता है, मानते हैं कि यहूदी लोगों ने उनकी जमीन हड़प ली है। यह क्षेत्र दरअसल फलस्तीन कहलाता था और इस पर अरबों, यहूदियों और ईसाइयों का कब्जा था। इस्राइल को संयुक्त राष्ट के प्रस्ताव के जरिये बनाया गया था और 1948 में अपने गठन के बाद से ही यहूदी लोग इस भूमि पर बसे हुए हैं। वर्तमान में इस्राइल एक शक्तिशाली देश बन गया है, जो अपने दुश्मन पड़ोसियों से निपटना जानता है। इस्राइल इस क्षेत्र की एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न शक्ति है। इतिहास बेशक फलस्तीनियों के पक्ष में हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इस्राइल को इस जमीन से अलग करना नामुमकिन है।

असहाय संयुक्त राष्ट्र
संयुक्त राष्ट्र एक कमजोर संस्था है। यह ऊंचे लक्ष्यों वाले संयुक्त राष्ट्र चार्टर को भी लागू नहीं कर सकता, जो कहता है, ‘संयुक्त राष्ट्र आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के संकट से बचाने के लिए दृढ़ संकल्पित है, जिसने हमारे जीवन काल में दो बार मानव जाति को अकथनीय पीड़ा दी है और...यह सुनिश्चित करने के लिए...सामान्य हित को छोड़कर सशस्त्र बलों का उपयोग नहीं किया जाएगा।’

संयुक्त राष्ट्र पीढ़ियों को युद्ध के संकट से बचाने और सशस्त्र बलों के उपयोग को रोकने के अपने लक्ष्यों में आश्चर्यजनक से विफल रहा है। युद्ध की प्रकृति भी अब बदल गई है। अब लड़ाई मनुष्य और मनुष्य की न रहकर, मशीनों और ड्रोन मिसाइलों की हो गई है। अगर दुनिया जमीन के विवादों को हल नहीं कर पाती, तो युद्ध रोके नहीं जा सकते। भारत और पाकिस्तान के बीच भी जमीन को लेकर विवाद है। दक्षिणपंथियों को इस संघर्ष को हिंदू भारत और इस्लामी पाकिस्तान के रूप में प्रदर्शित करना ज्यादा सुविधाजनक लगता है। हालांकि यह एक शरारत से ज्यादा कुछ नहीं है।

सच यह है कि दोनों देशों ने विभाजन और दो स्वतंत्रता अधिनियमों को स्वीकारा था और विवाद उस जमीन को लेकर है, जिस पर पाकिस्तान कब्जा चाहता है। इसकी तुलना में चीन और भारत के बीच का जमीन विवाद ज्यादा जटिल है, क्योंकि सीमा के एक बड़े हिस्से का सीमांकन हुआ ही नहीं है। इन समस्याओं का समाधान बातचीत ही है, युद्ध नहीं, जैसा कि प्रधानमंत्री भी कह चुके हैं, ‘यह युद्धों का दौर नहीं है।’

न्यायाधिकरण का होना जरूरी
पोप फ्रांसिस ने रूस, यूक्रेन, इस्राइल और हमास से लगातार शांति की अपील की है, लेकिन उन्हें अनसुना कर दिया गया। उनके पूर्ववर्तियों के साथ भी यही हुआ था। युद्धों ने इस ग्रह को नुकसान ही पहुंचाया है। समुद्री कानूनों पर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन (1982) को 150 से ज्यादा देशों ने अनुमोदित किया है। इसके तहत बने अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने कई नौसैनिक विवादों का समाधान किया है। जमीन संबंधी विवादों के लिए भी एक ऐसे ही अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण की स्थापना जरूरी है। इसके बगैर युद्ध, मौतें और विनाश रोकना संभव नहीं होगा।

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