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परिदृश्य: पश्चिम एशिया का संकट और शांति बहाली की कोशिश, अहम हो सकती है भारत की भूमिका

Thu, 26 Oct 2023 08:06 AM IST
Anil Trigunayat अनिल त्रिगुणायत
Updated Thu, 26 Oct 2023 08:06 AM IST
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सार
इस्राइल-हमास युद्ध में कुछ देश इस्राइल के साथ, तो कुछ फलस्तीन के साथ सहानुभूति जता रहे हैं। जरूरी यह है कि इन सहानुभूतियों को शांति बहाली के प्रयासों की ओर मोड़ा जाए, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ भारत की भी भूमिका है।
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Israel Hamas War India can play important role in efforts to restore peace in West Asia
पीएम नरेंद्र मोदी और फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस्राइल और हमास में चले रहे युद्ध को पूरे पश्चिम एशिया के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जहां की शांति, सुरक्षा व स्थायित्व, भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत करीब 70 फीसदी तेल और गैस यहीं से आयात करता है। पश्चिम एशियाई देशों में 90 लाख से भी ज्यादा भारतीय रहते हैं, जो करोड़ो डॉलर भारत भेजते हैं। ज्यादातर वैश्विक व्यापार और समुद्री मार्ग पश्चिम एशिया से ही गुजरते हैं। इसलिए, भारत यही चाहेगा कि इस्राइल-हमास युद्ध वैश्विक लड़ाई में तब्दील न होने पाए।



दूसरी बात, युद्ध अभी तीसरे हफ्ते में पहुंचा है और तेल की कीमतें बढ़ने लगी हैं। चूंकि, भारत ज्यादातर तेल का आयात करता है, इसलिए इससे भारत के खर्चे बढ़ेंगे, जिससे महंगाई बढ़ेगी, जो सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी।


तीसरी बात, हमें यह समझना होगा कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) दरअसल ट्रांजिट बिंदु है। वहां हमारी छह-सात हजार कंपनियां हैं, जो भारत में निवेश कर रही हैं। सऊदी अरब भी भारत में निवेश बढ़ाने की कोशिश में है। क्षेत्र में अशांति से ये निवेश निश्चित ही प्रभावित होंगे। चौथी बात, ईरान के साथ हमारे संबंध भी जटिल हो सकते हैं। ईरान के साथ संबंधों में चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर परियोजनाएं महत्वपूर्ण हैं, जिन पर प्रभाव पड़ सकता है।

पांचवीं बात, नई दिल्ली में आयोजित हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में जिस भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारे (आइमेक) की स्थापना पर, जिसे चीन की बेल्ट ऐंड रोड पहल (बीआरआई) का जवाब माना जा रहा है, जो स्वीकृति बनी थी, उस पर भी संकट मंडराने लगे हैं।

भारत बेशक यह कह रहा है कि इस युद्ध से आपसी व्यापार में कोई समस्या नहीं आएगी। यूएई और सऊदी अरब हमारे क्रमश: तीसरे और चौथे सबसे बड़े व्यापारिक सहयोगी हैं और इन देशों के साथ भारत के सीधे व्यापार में वाकई कोई भी मुश्किल नहीं है। लेकिन, अगर आइमेक कॉरिडोर की बात करें, तो यह मार्ग सऊदी अरब से जॉर्डन होते हुए इस्राइल जाता है। यह दरअसल रेल और बंदरगाहों को जोड़ने का प्रोजेक्ट है। बंदरगाह तो पहले से जुड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी महाराष्ट्र, गुजरात व दूसरी जगहों पर कुछ नए बंदरगाह निर्मित किए जाने की भी बात कर चुके हैं, इसलिए इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है।

लेकिन फिलहाल समस्या यह है कि इस्राइल को लेकर अरब देशों में आक्रोश भरा है। एक बार मान लें कि वहां के राजनेता यदि संबंधों को बहाल करने के लिए राजी भी हो जाते हैं, तो वहां की जनता का क्या, जो इस्राइल के बिल्कुल विरोध में है। यह देखते हुए कि सऊदी अरब के महज दो फीसदी लोग इस्राइल के साथ संबंधों को बहाल करने के पक्ष में हैं, निश्चित ही कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य होने में समय लगेगा। जाहिर है कि इससे कॉरिडोर के बनने में विलंब ही होगा, जिसका नुकसान भारत को भी उठाना होगा।

इसके अलावा जिन क्षेत्रीय परियोजनाओं पर बात चल रही थी, वे भी संकट में पड़ सकती हैं। छठी बात, इस्राइल-हमास युद्ध पूरी दुनिया की तरह भारत के मुस्लिम समुदाय को भी प्रभावित कर सकता है। खासकर गाजा में जो स्थितियां हैं, जिस तरह वहां के नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है, उन्हें देखकर भारत के मुस्लिम समुदाय में भी आक्रोश भड़क सकता है। हालांकि, भारत के लिए अच्छी बात यह है कि यहां के ज्यादातर मुसलमान आतंकवाद में भरोसा नहीं करते हैं और यही उनकी भारतीयता है।

इस्राइल पर हमास के हमले के बाद पूरी दुनिया दरअसल, बंटी हुई दिखती है। कुछ आतंकी हमले में मारे गए हजारों इस्राइलियों के साथ सहानुभूति रखते हैं, तो कुछ वर्षों से जुल्म सह रहे फलस्तीनियों के साथ खड़े दिखते हैं। भारत में भी यही हालत है। लेकिन जरूरी यह है कि इस सहानुभूति को शांति और युद्ध विराम के प्रयासों की तरफ मोड़ा जाए। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का होना जरूरी है। भारत जैसे देशों को आगे आना चाहिए। मेरा मानना है कि इस्राइल-हमास युद्ध में शांति बहाली के प्रयासों की अगुआई भारत को करनी चाहिए। हम इसके लिए एक प्रतिनिधि मंडल बना सकते हैं। पड़ोस के जो देश साथ देना चाहें, उनके साथ मिलकर युद्ध को रोकने की किसी योजना पर काम कर सकते हैं। हम नई दिल्ली के जी-20 सम्मेलन में भी देख चुके हैं कि आज पूरी दुनिया भारत का सम्मान करती है। पश्चिम एशियाई देश भी चाहते हैं कि भारत आगे आए। आज उसकी साख है। भारत जब कहता है, तो दुनिया सुनती है, क्योंकि वह सिद्धांतों की बात करता है।

भारत की स्वतंत्रता से पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि जैसे इंग्लैंड अंग्रेजों के लिए और फ्रांस फ्रेंच लोगों के लिए है, उसी तरह फलस्तीन फलस्तीनियों के लिए है। 1948 में जब पहली बार वोट हुआ, तब भारत ने फलस्तीन को बांटने के प्रस्ताव के विरोध में मत दिया था। 1950 में भारत ने आधिकारिक तौर पर इस्राइल राज्य को मान्यता दी, लेकिन आधिकारिक राजनयिक संबंध 1992 में जाकर स्थापित किए। दोनों देशों को लेकर फिलहाल भारत का पक्ष दो-राज्य समाधान और शांतिपूर्ण ढंग से दोनों देशों के लिए आत्मनिर्णय के अधिकार के साथ डी-हाईफनेशन की नीति की ओर बढ़ गया है। जब इस्राइल पर हमला हुआ, तो प्रधानमंत्री मोदी ने इस्राइल के लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाई। फिर विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया कि भारत  दो-राज्य सिद्धांत का हिमायती है। फिर जब गाजा के अस्पताल पर हमला हुआ, जिसमें 500 लोग मारे गए थे, तब प्रधानमंत्री मोदी ने फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से भी बात की थी।

भारत दरअसल, बिल्कुल संतुलित रवैया रखते हुए चाहता है कि वहां शांति की स्थापना हो और कोई रास्ता निकले। दोहा, कतर, तुर्किये और मिस्र जैसे देश शांति बहाली के लिए वार्ताएं कर रहे हैं, लेकिन अगर इस्राइल जमीनी लड़ाई पर उतरता है, और जिस तरह से हिजबुल्ला, लेबनान की तरफ से दबाव बनाए हुए है, उससे तो युद्ध का लंबा खिंचना तय लगता है।

रूस-यूक्रेन और अब इस्राइल-हमास के बीच युद्धों ने वैश्विक व्यवस्था को बदलने का काम किया है और इनके नतीजे ही बताएंगे कि दुनिया किस तरफ जाएगी। मुमकिन है कि शीतयुद्ध 2.0 जैसी स्थिति हो, जिसमें रूस, चीन व कुछ देश एक तरफ और अमरिका व यूरोपीय देश दूसरी तरफ हों। तीसरे पक्ष की भूमिका अगर कोई निभा सकता है, तो वह भारत है, जो रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाते हुए उन तमाम देशों को जोड़ सकता है, जो किसी भी गुट में शामिल न होना चाहें।

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